संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतद्भस्मना तु पुरुषं चित्राकारं चकार सः ॥३० तं विचित्रतनुं रुद्रो ददर्शाग्रे तु पूरुषम् । तत्क्षणाज्जात जीवोऽभून्मूर्तिमानिव मन्मथः । महाबलोऽतितेजस्वी मध्याह्नार्कसमप्रभः ॥३१ तं चित्रकर्मा बाहुभ्यां समालिङ्ग्य मुदान्वितः । स्तुहि बाल महादेवं स तु सर्वार्थसिद्धिदः ॥३२ इत्युक्त्वा शतरुद्रीयमुपादिशदमेयधीः । ननाम शतशो रुद्रं शतरुद्रियमजपन् ॥३३ ततः प्रसन्नो भगवान्महादेवो वृषध्वजः । वरेण च्छंदयामास वरं वव्रे स बालकः ॥३४ प्रतिद्वन्द्विबलाथं तु मद्बलेनोपयोक्ष्यति । तदस्त्रमुख्यानि वृथा कुर्वन्तु नो मम ॥३५
शिव के द्वारा अवज्ञात हुई शैल कन्या बहुत ही दुःखित हुई थी । फिर माता-पिता की आज्ञा से वह तपश्चर्या करने के लिए वन में चली गयी थी । इसके उपरान्त उस कामदेव की भस्म को देखकर गणेश्वर चित्रकर्मा उस भस्म से चित्र के आकार वाला पुरुष कर दिया था ।३०। भगवान् रुद्र ने विचित्र शरीर वाले पुरुष को अपने आगे देखा था । उसी क्षण में समुत्पन्न जीव वाला होगया था और ऐसा सुन्दर था । वह उसी क्षण में समुत्पन्न जीव वाला होगया था और ऐसा सुन्दर था मूर्तिमान् साक्षात् मन्मथ ही होंगे । वह महान् बलवाला और अत्यन्त मध्याह्न के सूर्य की सी प्रभा वाला तेजस्वी था ।३१। चित्रकर्मा ने उसका अपनी बाहुओं से आलिङ्गन किया था और बहुत प्रसन्न हुआ था । चित्रकर्मा ने उससे कहा था हे बाल ! भगवान् शिव की स्तुति करो क्योंकि वे समस्त अर्थों की सिद्धि के दाता है ।३२। यह कहकर उस अमेय बुद्धि वाले ने उसको शत रुद्रीय का उपदेश दे दिया था उसने शतरुद्रिय का जाप करते हुए सौ बार भगवान् रुद्र को प्रणाम किया था ।३३। इसके अनन्तर वृषध्वज महादेव जी परम प्रसन्न हुए थे । उन्होंने वरमाँगने की आज्ञा दी थी और उस बालक ने यह वरदान माँगा