भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

था। ३४। मेरे प्रतिद्वन्द्वी के बल के लिए मेरे बल से योजित करेंगे और उस मेरे प्रतिद्वन्द्वी के जो भी अस्त्र-शस्त्र होंगे वे व्यर्थ हो जायेंगे और मेरे नहीं होंगे। ३५।

तथेति तत्प्रतिश्रुत्य विचार्य किमपि प्रभुः । षष्टिवर्षसहस्राणि राज्यमस्मै ददौ पुनः ॥३६ एतद्दृष्ट्वा तु चरितं धाता भंडिति भंडिति । यदुवाच ततो नाम्ना भंडो लोकेषु कथ्यते ॥३७ इति दत्त्वा वरं सर्वैर्मुनिगणैर्वृतः । दत्त्वाऽस्त्राणि च शस्त्राणि तत्रैवांतरधाच्च सः ॥३८

ऐसा ही सब होगा—यह कहकर फिर प्रभु ने कुछ विचार करके साठ सहस्र वर्ष तक इसको राज्य भी दे दिया था। ३६। इस चरित को देखकर धाता ने भण्डिति-भण्डिति—यह कहा था इसीलिये वह लोक में भण्ड—इस नाम से ही कहा जाया करता है। ३७। यह वरदान उस को देकर मुनिगणों से समावृत वह अस्त्र देकर वहाँ पर ही तिरोहित हो गये थे। ३८।

ललिता प्रादुर्भाव वर्णन

रुद्रकोपानलाज्जातो यतो भण्डो महाबलः । तस्माद्रौद्रस्वभावो हि दानवश्चाभवत्ततः ॥१ अथागच्छन्महातेजाः शुक्रो दैत्यपुरोहितः । समायाताश्च शतशो दैतेयाः सुमहाबलाः ॥२ अथाहूय मयं भंडो दैत्यवंश्यादिशिल्पिनम् । नियुक्तो भृगुपुत्रेण निजगादार्थं वद्वचः ॥३ यत्र स्थित्वा तु दैत्येन्द्रैस्त्रैलोक्यं शासितं पुरा । तद्गत्वा शोणितपुरं कुरुष्व त्वं यथापुरम् ॥४ तच्छ्रुत्वा वचनं शिल्पी स गत्वाथ पुरं महत् । चक्रेऽमरपुरप्रख्यं मनसैवेक्षणेन तु ॥५ अथाभिषिक्तः शुक्रेण दैतेयैश्च महाबलैः । शुशुभे परया लक्ष्म्या तेजसा च समन्वितः ॥६