संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
भण्डासुर प्रादुर्भाव वर्णन ] | १८६
हिमाचलतले रम्ये वर्तते मुनिभिर्वृतः ॥१६ तं नियोजय गौर्यां तु जनिष्यति च तत्सुतः । ईषत्कार्यमिदं कृत्वा त्रायस्वास्मान्महाबल ॥२० एवमभ्यर्थितो देवैः स्तूयमानो मुहुर्मुहुः । जगामात्मविनाशाय यतो हिमवतस्तटम् ॥२१
आपका बलवीर्य तो अमोघ है और आपका पराक्रम भी मोघ नहीं है ।१५। आपके अस्त्र भी कुसुम परम सुकुमार है तथा वे सदा ही अमोघ हैं। अब यह तारक नाम का दानव ब्रह्माजी के ही द्वारा वरदान प्राप्त कर लेने वाला है ।१६। यह समस्त लोकों को बाधा दे रहा है और हमको तो विशेष रूप से सता रहा है। इसको भगवान् शिव के पुत्र के विना अन्य किसी से भी कुछ भय नहीं है अर्थात् इसका वध शिव का ही पुत्र कर सकता है ।१७। यह एक महान् कार्य है। आपके बिना कोई भी अन्य इसको नहीं कर सकता है चाहे किसी से भी कहा जावे। यह तो आपके ही अपने कर से होगा और अन्य किसी से भी कभी नहीं हो सकता है ।१८। आत्मा की एकता के ध्यान में निरत भगवान् शिव इस समय में है और गौरी भी वहाँ पर विद्यमान हैं ये परम रम्य हिमाचल के तल में है और मुनिगण से घिरे हैं ।१६। हे महान् बलवाले ! आप उन शिव को गौरी में नियोजित कर दो। उस का सुत जन्म धारण करेगा। यह एक छोटा सा हमारा कार्य है। इस को आप करके हमारी सुरक्षा कीजिए ।२०। इस तरह से देवों के द्वारा कामदेव से बार-बार प्रार्थना की गयी थी और बहुत स्तवन भी उसका किया गया था। तब वह अपनी आत्मा के विनाश के लिए वहाँ से कामदेव हिमवान् के तट पर गया था ।२१।
किमप्याराधयंतं तु ध्यानसंमीलितेक्षणम् । ददर्शेशानमासीनं कुसुमेषुरुदायुधः ॥२२ एतस्मिन्नन्तरे तत्र हिमवत्तनया शिवम् । आरिराधयिषुश्चागाद्विभ्राणा रूपमद्भुतम् ॥२३ समेत्य शम्भुं गिरिजां गंधपुष्पोपहारकैः । शुश्रूषणपरां तत्र ददर्शातिबलः स्मरः ॥२४
१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अदृश्यः सर्वभूतानान्नातिदूरेऽस्य संस्थितः । सुमनोमार्गणेरग्र्यै स्स विव्याध महेश्वरम् ॥२५
विस्मृत्य स हि कार्याणि वाणविद्धोऽन्तिके स्थिताम् । गौरीं विलोकयामास मन्मथाविष्टचेतनः ॥२६
धृतिमालंब्य तु पुनः किमेतदिति चिंतयन् । ददर्शाग्रे तु सन्नद्धं मन्मथं कुसुमायुधम् ॥२७
तं दृष्ट्वा कुपितः शूली त्रैलोक्यदहनक्षमः । तार्तीयं चक्षुरुन्मील्य ददाह मकरध्वजम् ॥२८
कुसुमों के वाणों वाले आयुध लिये हुए कामदेव ने वहाँ पर भगवान् शिव को देखा था जो कुछ काल समाराधना करके ध्यान में नेत्रों को बन्द किये हुए समाधिस्थ संस्थित थे ।२२। इसी बीच में यह भी उसने देखा था कि हिमवान् की पुत्री पार्वती भी भगवान् शिव की आराधना की इच्छा वाली वहाँ पर आ गयी थी जो अत्यद्भुत स्वरूप से सुसम्पन्न थी ।२३। अति बलवान् मदन ने वहाँ देखा था कि यह पार्वती शम्भु के समीप में पहुँच कर गन्ध-पुष्प और उपहारों के द्वारा शिव की शुश्रूषा में संलग्न थी ।२४। वह मदन समस्त प्राणियों के द्वारा अदृश्य था और उनके समीप में ही संस्थित होकर उसने अत्युत्तम पुष्पों के वाणों से महेश्वर के हृदय को बेधा था ।२५। मन्मथ के द्वारा आविष्ट चेतना वाले उस भगवान् शिव ने समस्त ध्यान करने के कार्यों को भुलाकर काम के बाणों से विद्ध होकर समीप में स्थित गौरी की ओर देखा था ।२६। फिर उन्होंने धैर्य का समाश्रय ग्रहण किया था और मन में चिन्तन कर रहे थे कि यह विकार क्यों और कैसे हो रहा है । उसी समय में उन्होंने देखा था कि कामदेव कुसुमों के आयुध वाला आगे सन्नद्ध है ।२७। उसको देखकर त्रिशूली प्रभु बहुत ही क्रुद्ध हो गये थे जो कि तीनों लोकों को दग्ध कर देने में समर्थ थे । उन्होंने अपना मस्तक में स्थित तीसरा नेत्र खोल दिया था और उसी क्षण में मकरध्वज को भस्मसात् कर दिया था ।२८।
शिवेनेवमवज्ञाता दुःखिता शैलकन्यका । अनुज्ञया ततः पित्रोस्तपः कर्तुं मगाद्वनम् ॥२९
तद्भस्मना तु पुरुषं चित्राकारं चकार सः ॥३० तं विचित्रतनुं रुद्रो ददर्शाग्रे तु पूरुषम् । तत्क्षणाज्जात जीवोऽभून्मूर्तिमानिव मन्मथः । महाबलोऽतितेजस्वी मध्याह्नार्कसमप्रभः ॥३१ तं चित्रकर्मा बाहुभ्यां समालिङ्ग्य मुदान्वितः । स्तुहि बाल महादेवं स तु सर्वार्थसिद्धिदः ॥३२ इत्युक्त्वा शतरुद्रीयमुपादिशदमेयधीः । ननाम शतशो रुद्रं शतरुद्रियमजपन् ॥३३ ततः प्रसन्नो भगवान्महादेवो वृषध्वजः । वरेण च्छंदयामास वरं वव्रे स बालकः ॥३४ प्रतिद्वन्द्विबलाथं तु मद्बलेनोपयोक्ष्यति । तदस्त्रमुख्यानि वृथा कुर्वन्तु नो मम ॥३५
शिव के द्वारा अवज्ञात हुई शैल कन्या बहुत ही दुःखित हुई थी । फिर माता-पिता की आज्ञा से वह तपश्चर्या करने के लिए वन में चली गयी थी । इसके उपरान्त उस कामदेव की भस्म को देखकर गणेश्वर चित्रकर्मा उस भस्म से चित्र के आकार वाला पुरुष कर दिया था ।३०। भगवान् रुद्र ने विचित्र शरीर वाले पुरुष को अपने आगे देखा था । उसी क्षण में समुत्पन्न जीव वाला होगया था और ऐसा सुन्दर था । वह उसी क्षण में समुत्पन्न जीव वाला होगया था और ऐसा सुन्दर था मूर्तिमान् साक्षात् मन्मथ ही होंगे । वह महान् बलवाला और अत्यन्त मध्याह्न के सूर्य की सी प्रभा वाला तेजस्वी था ।३१। चित्रकर्मा ने उसका अपनी बाहुओं से आलिङ्गन किया था और बहुत प्रसन्न हुआ था । चित्रकर्मा ने उससे कहा था हे बाल ! भगवान् शिव की स्तुति करो क्योंकि वे समस्त अर्थों की सिद्धि के दाता है ।३२। यह कहकर उस अमेय बुद्धि वाले ने उसको शत रुद्रीय का उपदेश दे दिया था उसने शतरुद्रिय का जाप करते हुए सौ बार भगवान् रुद्र को प्रणाम किया था ।३३। इसके अनन्तर वृषध्वज महादेव जी परम प्रसन्न हुए थे । उन्होंने वरमाँगने की आज्ञा दी थी और उस बालक ने यह वरदान माँगा
१६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
था। ३४। मेरे प्रतिद्वन्द्वी के बल के लिए मेरे बल से योजित करेंगे और उस मेरे प्रतिद्वन्द्वी के जो भी अस्त्र-शस्त्र होंगे वे व्यर्थ हो जायेंगे और मेरे नहीं होंगे। ३५।
तथेति तत्प्रतिश्रुत्य विचार्य किमपि प्रभुः । षष्टिवर्षसहस्राणि राज्यमस्मै ददौ पुनः ॥३६ एतद्दृष्ट्वा तु चरितं धाता भंडिति भंडिति । यदुवाच ततो नाम्ना भंडो लोकेषु कथ्यते ॥३७ इति दत्त्वा वरं सर्वैर्मुनिगणैर्वृतः । दत्त्वाऽस्त्राणि च शस्त्राणि तत्रैवांतरधाच्च सः ॥३८
ऐसा ही सब होगा—यह कहकर फिर प्रभु ने कुछ विचार करके साठ सहस्र वर्ष तक इसको राज्य भी दे दिया था। ३६। इस चरित को देखकर धाता ने भण्डिति-भण्डिति—यह कहा था इसीलिये वह लोक में भण्ड—इस नाम से ही कहा जाया करता है। ३७। यह वरदान उस को देकर मुनिगणों से समावृत वह अस्त्र देकर वहाँ पर ही तिरोहित हो गये थे। ३८।
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन
रुद्रकोपानलाज्जातो यतो भण्डो महाबलः । तस्माद्रौद्रस्वभावो हि दानवश्चाभवत्ततः ॥१ अथागच्छन्महातेजाः शुक्रो दैत्यपुरोहितः । समायाताश्च शतशो दैतेयाः सुमहाबलाः ॥२ अथाहूय मयं भंडो दैत्यवंश्यादिशिल्पिनम् । नियुक्तो भृगुपुत्रेण निजगादार्थं वद्वचः ॥३ यत्र स्थित्वा तु दैत्येन्द्रैस्त्रैलोक्यं शासितं पुरा । तद्गत्वा शोणितपुरं कुरुष्व त्वं यथापुरम् ॥४ तच्छ्रुत्वा वचनं शिल्पी स गत्वाथ पुरं महत् । चक्रेऽमरपुरप्रख्यं मनसैवेक्षणेन तु ॥५ अथाभिषिक्तः शुक्रेण दैतेयैश्च महाबलैः । शुशुभे परया लक्ष्म्या तेजसा च समन्वितः ॥६
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६३
हिरण्याय तु यद्दत्तं किरीटं ब्रह्मणा पुरा ।
सजीवमविनाश्यं च दैत्येन्द्रै रपि भूषितम् ।
दधौ भृगुसुतोत्सृष्टं भंडो बालार्कसन्निभम् ॥७
क्योंकि भण्ड भगवान् रुद्र की कोपाग्नि से समुत्पन्न हुआ था अत एव वह महा बलवान् था और उसका स्वभाव भी परम रौद्र हुआ था । ऐसा ही यह दानव था ।१। इसके पश्चात् महा तेजस्वी दैत्यों के पुरोहित शुक्राचार्य वहाँ पर आये थे और सैकड़ों महाबली दैतेय भी समागत हुए थे ।२। इसके उपरान्त भण्ड ने दैत्यों के वंश में होने वाले आदि शिल्पी मय को बुलाया था । भृगु के पुत्र के द्वारा नियुक्त होते हुए उसने उस शिल्पी से अर्थ युक्त वचन कहा था ।३। जहाँ पर स्थित होकर पहिले दैत्यों के स्वामी ने त्रैलोक्य का शासन किया था वहाँ पर जाकर जैसा भी पुर होता है वैसा शोणित पुर का निर्माण करो ।४। यह वचन श्रवण करके उस शिल्पी ने जाकर एक महान पुर की रचना की थी । वह पुर मन से ही ईक्षण के द्वारा अमरपुर के समान था ।५। इसके अनन्तर शुक्राचार्य के द्वारा तथा महाबली दैत्यों के साथ अभिषेक किया गया था । वह परोत्कृष्ट लक्ष्मी से शोभित हुआ था तथा तेज से भी समन्वित था ।६। पहिले हिरण्य के लिए जो किरीट ब्रह्माजी ने प्रदान किया था वह सजीव और विनाशन होने के योग्य था तथा दैत्येन्द्रों के भी द्वारा भूषित था । उसको भृगु सुत के द्वारा उत्सृष्ट जो था भण्ड ने धारण किया था । यह किरीट बाल सूर्य के ही सदृश था । इसके उपरान्त वह सिंहासन पर समासीन हुआ था और सभी आभरणों से विभूषित हुआ था ।७।
चामरे चन्द्रसंकाशे सजीवे ब्रह्मनिर्मिते ।
न रोगो न च दुःखानि संदधौ यन्निषेवणात् ॥८
तस्यातपत्रं प्रददौ ब्रह्मणैव पुरा कृतम् ।
यस्य च्छायानिषण्णास्तु बाध्यंते नास्त्रकोटिभिः ॥६
धनुश्च विजयं नाम शंखं च रिपुघातिनम् ।
अन्याम्यपि महार्हाणि भूषणानि प्रदत्तवान् ॥१०
तस्य सिंहासनं प्रादादक्षयं सूर्यसन्निभम् ।
ततः सिंहासनासीनः सर्वाभरणभूषितः ।
बभूवातीव तेजस्वी रत्नमुत्तेजितं यथा ॥११
१६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
बभूवुरथ दैतेयास्तयाष्टौ तु महाबलाः । इन्द्रशत्रु रमित्रघ्नो विद्युन्माली विभीषणः । उग्रकर्माग्रधन्वा च विजयश्रुतिपारगः ॥१२ सुमोहिनी कुमुदिनी चित्रांगी सुन्दरी तथा । चतस्रो वनितास्तस्य बभूवुः प्रियदर्शनाः ॥१३ तमसेवंत कालज्ञा देवाः सर्वे सवासवाः । स्यंदनास्तुरगा नागाः पादाताश्च सहस्रशः ॥१४
दो चमर भी चन्द्रमा के समान थे जो सजीव थे और ब्रह्माजी के ही द्वारा निर्मित हुए थे । इसके निषेवण करने का यह प्रभाव था कि सेवन करने वाले कोई भी रोग और दुःख नहीं हुआ करता था । उनको भी इसने धारण किया था ।८। उसका जो आतपत्र (छत्र) भी पहिले ही निर्मित किया हुआ ब्रह्माजी ने ही प्रदान किया था जिसकी छाया में जो भी उपविष्ट होते हैं उनको करोड़ों अस्त्र भी कुछ बाधा नहीं दिया करते हैं ।६। विजय नामक धनुष और रिपुओं का घात करने वाला शंख था । उनके अतिरिक्त अन्य-अन्य भी बहुत कीमती भूषण प्रदान किये थे ।१०। उसको जो सिंहासन प्रदान किया था वह अक्षय था और सूर्य के समान था उस पर वह बैठकर उत्तेजित रत्न के ही सदृश अतीव तेजस्वी हो गया था ।११। उसके आठ दैतेय महा बलवान हुए थे—उनके नाम ये थे—इन्द्र शत्रु—अमित्रघ्न—विद्युन्माली—विभीषण—उग्र कर्मा—उग्रधन्वा—विजय—श्रुतिपारग ।१२। उसकी चार प्रिय दर्शन वाली पत्नियां थी जिनके नाम ये हैं—सुमोहिनी—कुमुदिनी—चित्रांगी और सुन्दरी ।१३। काल के ज्ञान रखने वाले इन्द्र के सहित सभी देवगणों ने उसकी सेवा की थी । उसके पास सहस्रों ही रथ—अश्व—गज और पदाति सैनिक थे ।१४।
संबभूवुर्महाकाया महांतो जितकाशिनः । बभूबुर्दानवाः सर्वे भृगुपुत्रमतानुगाः ॥१५ अर्चयंतो महादेवमास्थिताः शिवशासने । बभूवुर्दानवास्तत्र पुत्रपौत्रधनान्विताः । गृहे गृहे च यज्ञाश्च संबभूवुः समंततः ॥१६
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६५
ऋचो यजूंषि सामानि मीमांसान्यायकादयः ।
प्रवर्तन्ते स्म दैत्यानां भूयः प्रतिगृहं तदा ॥१७
यथाश्रमेषु मुख्येषु मुनीनां च द्विजन्मनाम् ।
तथा यज्ञेषु दैत्यानां बुभुजुर्हव्यभोजिनः ॥१८
एवं कृतवतोऽप्यस्य भंडस्य जितकाशिनः ।
षष्टिवर्षसहस्राणि व्यतीतानि क्षणार्धवत् ॥१९
वर्धमानमथो दैत्यं तपसा च बलेन च ।
हीयमानबलं चेन्द्रं संप्रेक्ष्य कमलापतिः ॥२०
ससर्ज गहसा कांचिन्मायां लोकविमोहिनीम् ।
तामुवाच ततो मायां देवदेवो जनार्दनः ॥२१
उसके सभी दानव भृगुपुत्र के मत का अनुगमन करने वाले थे और इन सबके कलेवर बहुत विशाल थे और ये जितकाशी थे ।१५। ये सबके सब महादेवजी का अर्चन किया करते थे और सर्वदा शिव के ही शासन में समास्थित रहते थे। वहाँ पर जो भी दानव गण थे वे सब पुत्रों-पौत्रों और धन से सम्पन्न थे और घर-घर में चारों ओर यज्ञ हुआ करते थे ।१६। ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद-मीमांसा और न्याय शास्त्र आदि समस्त वेद और शास्त्र उस समय में प्रत्येक घर में पुनः प्रवृत्त हो गये थे ।१७। मुनियों के और द्विजों के मुख्य आश्रमों में तथा यज्ञों में जो कि दैत्यों के थे हव्य के भोजन करने वाले भोजन किया करते थे ।१८। इस रीति से करने वाले जित काशी भंड के सहस्र वर्ष आधे क्षण के ही समान व्यतीत हो गये थे ।१९। तप से और बल के द्वारा बढ़ते हुए इस भण्ड दैत्य को और क्षीण होने वाले बल से मुक्त इन्द्र को देखकर कमलापति ने माया के रचना करने का विचार किया था ।२०। और तुरन्त ही लोकों का विमोहन करने वाली कोई एक माया का सृजन किया था । फिर देवों के भी देव जनार्दन प्रभु ने उस माया से कहा था ।२१।
त्वं हि सर्वाणि भूतानी मोहयंती निजौजसा ।
विचरस्व यथाकामं त्वां न ज्ञास्यति कश्चन ॥२२
त्वं तु शीघ्रमितो गत्वा भंडं दैत्यनायकम् ।
१६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
मोहयित्वाचिरेणैव विषयानुपभोक्ष्यसे ॥२३ एवं लब्ध्वा वरं माया तं प्रणम्य जनार्दनम् । ययाचेऽप्सरसो मुख्याः साहय्यार्थं काश्चन ॥२४ तया संप्राथितो भूयः प्रेषयामास काश्चन । ताभिर्विश्वाचिमुख्याभिः सहिता सा मृगेक्षणा । प्रययौ मानसस्याग्र्यं तटमुज्ज्वलभूरुहम् ॥२५ यत्र क्रीडति दैत्येन्द्रो निजनारीभिरन्वितः । तत्र सा मृगशावाक्षी मूले चंपकशाखिनः । निवासमकरोद्रम्यं गायन्ती मधुरस्वरम् ॥२६ अथागतस्तु दैत्येन्द्रो बलिभिर्मंत्रिभिर्वृतः । श्रुत्वा तु वीणानिनादं ददर्श च वरांगनाम् ॥२७ तां दृष्ट्वा चारुसर्वांगीं विद्युल्ले खामिवापराम् । मायामये महागर्ते पतितो मदनांभिधे ॥२८
तू तो अतीव अद्भुत प्रभाव वाली है। तू अपने ही ओज से समस्त प्राणियों का मोहन किया करती है। अब तू अपनी ही इच्छा के अनुसार विचरण कर और तुमको कोई भी नहीं जान सकेगा ।२२। अब तू यहाँ से शीघ्र ही जाकर दैत्यों के नायक भण्ड के समीप में पहुँच जा। और तुरन्त ही उसको मोहित कर दे कि विषयों को उपयोग करेगा ।२३। इस प्रकार का वरदान प्राप्त करके उस माया ने जनार्दन प्रभु को प्रणाम किया था। फिर उस माया ने भगवान् से सहायता करने के लिए कुछ प्रमुख अप्सराओं के प्राप्त करने की याचना की थी ।२४। जब माया के द्वारा प्रार्थना की गयी थी तो प्रभु ने कुछ अप्सराएं भेजी थीं उन अप्सराओं में विश्वाची आदि प्रमुख थीं। उस सबके साथ वह मृगेक्षणा माया वहाँ से प्रस्थान कर गयी थी। वह मानसरोवर के उत्तम तट पर गयी थी जहाँ पर उत्तम द्रुम लगे हुए थे ।२५। वह ऐसा सुरम्य स्थल था कि वह दैत्यराज वहाँ पर अपनी नारियों से युक्त होकर विहार की क्रीड़ा किया करता था। उसी स्थल में वह मृग के शावक के समान नेत्रों वाली माया एक चम्पक वृक्ष के मूल में निवास करने लगी थी और परम सुरम्य मधुर स्वर के कुछ गाया करती
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६७
थी ।२६। इसके अनन्तर वह दैत्यराज अपने मन्त्रियों के सहित वहाँ पर आ गया था । उसने वीणा की परम मधुर ध्वनि का श्रवण किया था और फिर उस वराङ्गना को भी देखा था ।२७। उस सुन्दर अंगों वाली को देख कर दूसरी विद्युत् की लेखा के ही समान थी वह मदन नामक माया से परिपूर्ण महान् गत्तं में गिर गया था ।२८।
अथास्य मंत्रिणोऽभूवन्हृदये स्मरतापिताः ॥२६
तेन दैतेयनाथेन चिरं संप्राथिता सती ।
तैश्च संप्राथितास्ताश्च प्रतिशुश्रुवुरंजसा ॥३०
यास्त्वलभ्या महायज्ञैरश्वमेधादिकैरपि ।
ता लब्ध्वा मोहिनीमुख्या निर्वृतिं परमां ययुः ॥३१
विसस्मरुस्तदा वेदांस्तथा देवमुमापतिम् ।
विजहुस्ते तथा यज्ञक्रियाश्चान्याः शुभावहाः ॥३२
अवमानहतश्चासीत्तेषामपि पुरोहितः ।
मुहूर्त मिव तेषां तु ययावब्दायुतं तदा ॥३३
मोहितेष्वथ दैत्येषु सर्वे देवाः सवासवाः ।
विमुक्तोपद्रवा ब्रह्मन्नामोदं परमं ययुः ॥३४
कदाचिदथ देवेंद्रं वीक्ष्य सिंहासने स्थितम् ।
सर्वदेवैः परिवृतं नारदो मुनिराययौ ॥३५
इसके अनन्तर उसके मन्त्रीगण भी उनका स्मरण करने वाले के साथ ही थे ।२६। उस दैत्यों के स्वामी ने बहुत समय तक उस सती से प्रार्थना की थी । उनके द्वारा जब भली भाँति उनसे प्रार्थना की गयी थी तो उन्होंने भी तुरन्त ही प्रति श्रवण किया था ।३०। जो बड़े-बड़े यज्ञों के द्वारा जैसे अश्व मेधादिक यज्ञ हैं इनके द्वारा भी अलभ्य होती हैं उनको जिनमें मोहिनी मुख्य थी प्राप्त करके उनको बहुत ही अधिक आनन्द प्राप्त हुआ था ।३१। फिर तो उन सबने उस समय में भोग विलास के आनन्द में निमग्न होकर वेदों को भुला दिया था और उमापति देव का जो अर्चन था वह भी छोड़ दिया था । यज्ञादिक की जो भी अन्य परम शुभ के देने वाली क्रियाएं थी उनका भी परित्याग कर दिया था ।३२। फिर तो उनके जो
१६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पुरोहित थे उनका भी अपमान करके उन्हें छोड़ दिया था। उनके सहस्रों वर्ष एक मुहूर्त्त के ही समान व्यतीत हो गये थे ।३३। उन समस्त दैत्यों के विमोहित हो जाने पर इन्द्रदेव के सहित सब देवगण हे ब्रह्मन् ! विमुक्त उपद्रव वाले होकर परम आनन्द को प्राप्त हो गये थे ।३४। इसके अनन्तर किसी समय में देवेन्द्र को अपने सिंहासन पर विराजमान देखकर जो कि समस्त देवों से घिरा हुआ अवस्थित था नारद मुनि वहाँ पर समागत हो गये थे ।३५।
प्रणम्य मुनिशार्दूलं ज्वलन्तमिव पावकम् ।
कृतांजलिपुटो भूत्वा देवेशो वाक्यमब्रवीत् ॥३६
भगवन्सर्वधर्मज्ञ परापरविदां वर ।
तत्रैव गमनं ते स्याद्यं धन्यं कर्तुमिच्छसि ॥३७
भविष्यच्छोभनाकारं तवागमनकारणम् ।
त्वद्वाक्यामृतमाकर्ण्य श्रवणानंदनिर्भरम् ।
अशेषदुःखान्युत्तीर्य कृतार्थः स्याः मुनीश्वर ॥३८
नारद उवाच-
अथ संमोहितो भंडो दैत्येंद्रो विष्णुमायया ।
तया विमुक्तो लोकांस्त्रीन्दहेताग्निरिवापरः ॥३६
अधिकस्तव तेजोभिरस्त्रैर्मयाबलेन च ।
तस्य तेजोऽपहारस्तु कर्तव्योऽतिबलस्य तु ॥४०
विनाराधनतो देव्याः पराशक्तेस्तु वासव ।
अशक्योऽन्येन तपसा कल्पकोटिशतैरपि ॥४१
पुरैवोदयतः शत्रोराराधयत बालिशाः ।
आराधिता भगवती सा वः श्रेयो विधास्यति ॥४२
जाज्वल्यमान अग्नि के समान परम तेजस्वी मुनि शार्दूल को प्रणाम करके अपने दोनों हाथों को जोड़ कर देवेन्द्र ने यह वाक्य कहा था ।३६। हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञान रखने वाले हैं और आप परावर के ज्ञाताओं में भी परम श्रेष्ठ हैं। आपका गमन तो वहाँ पर हुआ करता है
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६६
जिसको आप धन्य बनाना चाहते हैं ।३७। आपके शुभ आगमन का कारण भविष्य को परम शुभ बताने वाला होता है। हे मुनीश्वर ! श्रवणों को परमानन्द उपजाने वाले आपके मुख से निःसृत वाक्य को सुनकर मैं समस्त दुःखों को पार करके परम कृतार्थ होऊँगा ।३८। श्री नारदजी ने कहा—दैत्यों का स्वामी भण्ड विष्णु की माया से सम्मोहित हो गया है। उसके द्वारा विमुक्त हुआ वह तीनों लोकों को दूसरी अग्नि के ही समान दहन करता है ।३९। वह तेजों से-अस्त्रों से और मायाके बलसे आपसे भी अधिक है। उस अत्यधिक बलवान् के तेज का अपहरण अवश्य ही करना चाहिए ।४०। हे इन्द्र ! पराशक्ति देवी की आराधना के बिना किसी भी अन्य तप से सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी उसके अति बल का अपहरण नहीं हो सकता है ।४१। हे मूर्खो ! उदीयमान शत्रु के पूर्व में ही आराधना करो अर्थात् शत्रु जैसे ही बढ़ रहा हो उसी समय में पहिले ही आराधना करनी चाहिए। आराधना की हुई वह भगवती तुम्हारा श्रेय कर देगी ।४२।
एवं संबोधितस्तेन शक्रो देवगणेश्वरः ।
तं मुनिं पूजयामास सर्वदेवैः समन्वितः ।
तपसे कृतसन्नाहो ययौ हैमवतं तटम् ॥४३
तत्र भागीरथीतीरे सर्वर्तुं कुसुमोज्ज्वले ।
पराशक्तेर्महापूजां चक्रेऽखिलसुरैः समम् ।
इन्द्रप्रस्थमभून्नाम्ना तदाद्यखिलसिद्धिदम् ॥४४
ब्रह्मात्मजोपदिष्टेन कुर्वतां विधिना पराम् ।
देव्यास्तु महतीं पूजां जपध्यानरतात्मनाम् ॥४५
उग्रे तपसि संस्थानामनन्यार्पितचेतसाम् ।
दशवर्षसहस्राणि दशाहानि च संययुः ॥४६
मोहितानथ तान्दृष्ट्वा भृगुपुत्रो महामतिः ।
भंडासुरं समभ्येत्य निजगाद पुरोहितः ॥४७
त्वामेवाश्रित्य राजेंद्र सदा दानवसत्तमाः ।
निर्भयास्त्रिषु लोकेषु चरंतीच्छाविहारिणः ॥४८
२०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जातिमात्रं हि भवतो हंति सर्वान्सदा हरिः ।
तेनैव निर्मिता माया यया संमोहितो भवान् ॥४६
उस महामुनि के द्वारा इस प्रकार से जब देवगणों के स्वामी को सम्बोधित किया गया था तो उस इन्द्र ने सब देवों के सहित मुनि का पूजन किया था और तपश्चर्या करने के लिये तैयारी करने वाला वह हैमवान् के तट पर चला गया था ।४३। वहाँ पर सब ऋतुओं के कुसुमों से समुज्ज्वल भागीरथी गंगा के तीर पर समस्त सुरगणों के साथ उस इन्द्र ने उस परा शक्ति की महा पूजा की थी । उस समय से ही लेकर अखिल सिद्धियों का प्रदान करने वाला वह स्थल इन्द्रप्रस्थ नाम वाला हो गया था ।४४। ब्रह्माजी के पुत्र नारदजी के द्वारा उपदेश की गयी विधि से जप और ध्यान में निरत आत्मा वालों की उस देवी की महती परा पूजा करने वालों को बहुत समय व्यतीत हो गया था ।४५। वे सभी परम उग्र तप में संस्थित थे तथा अन्य किसी में भी उनका चित्त न लगकर उसी में निरत था । ऐसे उनको करते हुए दश सहस्र वर्ष और दश दिन बीत गये थे ।४६। इधर महामति भृगु के ने उन समस्त दैत्यों को मोहित देखकर वह भण्डासुर के समीप में पहुँचे थे और उससे पुरोहित जी ने कहा था ।४७। हे राजेन्द्र ! आपका ही समाश्रय लेकर सदा ही सब दानव गण निर्भय होकर तीनों लोकों में चरण किया करते हैं और अपनी इच्छा से ही विहार करते हैं ।४८। हरि भगवान् तो आपकी पूर्ण जाति का ही हनन किया करते हैं और सदा सबका विनाश करते हैं । उन्हीं के द्वारा इस माया की रचना की गयी है जिसके द्वारा आप संमोहित हो गये हैं ।४६।
भवंतं मोहितं दृष्ट्वा रंध्रान्वेषणतत्परः ।
भवतां विजयार्थाय करोतींद्रो महत्तपः ॥५०
यदि तुष्टा जगद्धात्री तस्यैव विजयो भवेत् ।
इमां मायामयीं त्यक्त्वा मंत्रिभिः सहितो भवान् ।
गत्वा हैमवतं शैलं परेषां विघ्नमाचर ॥५१
एवमुक्तस्तु गुरुणा हित्वा पर्यंकमुत्तमम् ।
मंत्रिवृद्धानुपाहूय यथावृत्तांतमाह सः ॥५२
तच्छ्रुत्वा नृपतिं प्राह श्रुतवर्मा विमृश्य च ।
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २०१
षष्टिवर्षसहस्राणां राज्यं तव शिवार्पितम् ॥५३ तस्मादप्यधिकं वीर गतमासीदनेकंशः । अशक्यप्रतिकार्योऽयं यः कालश्शिवचोदितः ॥५४ अशक्यप्रतिकार्योऽयं तदभ्यर्चनतो विना । काले तु भोगः कर्त्तव्यो दुःखस्य च सुखस्य वा ॥५५ अथाह भीमकर्माख्यो नोपेक्ष्योऽरिर्यथाबलम् । क्रियाविघ्ने कृतेऽस्माभिर्विजयस्ते भविष्यति ॥५६
जब आप मोहित हो गये हैं तो ऐसी अवस्था में आपको देखकर छिद्रों की खोज में परायण इन्द्र आपके ऊपर विजय प्राप्त करने के लिये महान् तप कर रहा है ।५०। यदि जगत् की धात्री देवी प्रसन्न हो गयी तो फिर उसी की विजय होगी। इसलिए इस मायामयी को छोड़कर मन्त्रियों के साथ अन्य है मवन्त पर्वत पर जाओ और उन देवों के तप में विघ्न पैदा करो ।५१। श्री गुरुदेव के द्वारा जब इस रीति से कहा गया था तब दैत्येन्द्र ने अपना उत्तम पर्यंक त्याग दिया था और वृद्ध मन्त्रियों को बुलाकर जो भी वृत्त था वह सब कह सुनाया था ।५२। इसका श्रवण करके श्रुतवर्मा ने विचार करके राजा से कहा था। आपका राज्य शासन साठ हजार वर्षों तक ही शिव ने आपको प्रदान किया था ।५३। हे वीर ! अब तो उतने समय से भी अधिक समय व्यतीत हो चुका है और अनेकों वर्ष निकल गये हैं। यह समय तो भगवान् शिव के द्वारा ही दिया गया था। अब इसका कोई भी प्रतीकार नहीं किया जा सकता है ।५४। अब उनके ही अभ्यर्चना के बिना यह राज्य का रहना असम्भव है और इसका कोई भी प्रतिकार नहीं हो सकता है। यह तो काल है इसमें तो सुख और दुःख का भोग करना होगा ।५५। इसके अनन्तर जो भीमकर्मा नाम वाला मन्त्री था उसने कहा— जहाँ तक बल है शत्रु की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हम लोगों के द्वारा जब क्रिया का विघ्न किया जायेगा तो ऐसा करने पर आपका ही विजय होगा ।५६।
तव युद्धे महाराज परार्थं बलहारिणी । दत्ता विद्या शिवेनैव तस्मात्ते विजयः सदा ॥५७ अनुमेने च तद्वाक्यं भण्डो दानवनायकः ।
२०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
निर्गत्य सह सेनाभिर्ययौ हैमवतं तटम् ॥५८ तपोविघ्नकरान्दृष्ट्वा दानवाञ्जगदंबिका । अलंघ्यमकरोदग्रे महाप्राकारमुज्ज्वलम् ॥५९ तं दृष्ट्वा दानवेंद्रोऽपि किमेतदिति विस्मितः । संक्रुद्धो दानवास्त्रेण बंभजातिबलेन तु ॥६० पुनरेव तदग्रेऽभूदलंघ्यः सर्वदानवैः । वायव्यास्त्रेण तं धीरो वभंज च ननाद च ॥६१ पौनः पुन्येन तद्भस्म प्राभूत्पुनरुपस्थितम् । एतद्दृष्ट्वा तु दैत्येंद्रो विषण्णः स्वपुरं ययौ ॥६२ तां च दृष्ट्वा जगद्धात्रीं दृष्ट्वा प्राकारमुज्ज्वलम् । भयाद्विव्यथिरे देवा विमुक्तसकलक्रियाः ॥६३
हे महाराज ! आपके युद्ध में परों के बल के हरण करने वाली विद्या भगवान् शिव ने ही प्रदान की है इसलिए आपकी सदा ही विजय होगी ।५७। दानवों के नायक भण्ड ने उसके वाक्य को मान लिया था और सेनाओं के साथ वह निकल कर हैमवत के तट पर चला गया था ।५८। जगम्बिका ने तपश्चर्या के अन्दर विघ्न डालने वालों को देखा था उसने आगे उज्ज्वल जो महा प्रकार था उसको न लांघने के योग्य बना दिया था ।५९। उसको देखकर वह दानवेन्द्र भी यह क्या है—इस बात से अत्यधिक विस्मित हो गया था । वह अधिक क्रुद्ध होगया था और उसने दानवास्त्र के द्वारा उसको भंग करना चाहा था ।६०। वह फिर भी उसके आगे गया था किन्तु वह सभी दानवों के द्वारा न लांघने के योग्य हो गया था । और उस धीर ने दानवास्त्र के द्वारा उसका भंग किया था और बड़ी गजना भी की थी ।६१। बारम्बार भी ऐसा करने से वह भस्म फिर समुत्पन्न हो गयी थी और उपस्थित हो गयी थी । यह देखकर वह दानवेन्द्र परम विषाद से युक्त होकर अपने पुर को चला गया था ।६२। देवों ने उस जगत् की धात्री का दर्शन किया था और उस उज्ज्वल प्राकार को भी देखा था । देवगण भय से बहुत ही व्यथित हो गये थे और उन्होंने समस्त क्रियाओं को छोड़ दिया था ।६३।
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २०३
तानुवाच ततः शक्रो दैत्येन्द्रोऽयमिहागतः ।
अशक्यः समरे योद्धुमस्माभिरखिलैरपि ॥६४
पलायितानामपि नो गतिरन्या न कुत्रचित् ।
कुण्डं योजनविस्तारं सम्यक्कृत्वा तु शोभनम् ॥६५
महायागविधानेन प्रणिधाय हुताशनम् ।
यजामः परमां शक्तिं महामांसैर्वयं सुराः ॥६६
ब्रह्मभूता भविष्यामो भोक्ष्यामो वा त्रिविष्टपम् ।
एवमुक्तास्तु ते सर्वे देवाः सेन्द्रपुरोगमाः ॥६७
विधिवज्जुहुवुर्मांसा न्युत्कृत्योत्कृत्य मंत्रतः ।
हुतेषु सर्वांगेषु पादेषु च करेषु च ॥६८
होतुमिच्छत्सु देवेषु कलेवरमशेषतः ।
प्रादुर्बभूव परमन्तेजः पुंजो ह्यनुत्तमः ॥६६
तन्मध्यतः समुद्भूच्चक्राकारमनुत्तमम् ।
तन्मध्ये तु महादेवीमुदयार्कसमप्रभाम् ॥७०
इसके पश्चात् इन्द्र देव ने उन देवगणों से कहा था कि यह दैत्येन्द्र यहाँ पर आ गया है और इसको इन सभी लोग भी जीतने में युद्ध में असमर्थ है ।६४। अगर हम सब लोग यहाँ से भागते भी हैं तो भी हमारी कहीं पर भी अन्य कोई गति नहीं है। एक योजनके विस्तार वाला कुण्ड बनाकर जो बहुत ही अच्छा और सुन्दर हो हम सब यज्ञ का कार्य सम्पन्न करें ।६५। महायाग का जो भी विधान है उसी से हुताशन का प्रणिधान करें। हम सब सुरगण महा मांसो से इस परमा शक्ति का ही इस समय में यजन करें ।६६। हम सब लोग ऐसा करने से ब्रह्मभूत हो जायेंगे अथवा स्वर्ग लोक का भोग करेंगे। इस प्रकार से जब सब देवों से कहा गया था तो इन्द्र ही जिनमें अग्रणी था वे सभी देवगण प्रस्तुत हो गये थे ।६७। फिर उन्होंने मन्त्रों के द्वारा काट-काट कर विधि पूर्वक मांसों से हवन किया था। शरीरों के समस्त मांस का हवन करने पर तथा चरणों और करों का भी होम करने पर जब उन्होंने अपना सम्पूर्ण शरीर ही हवन कर देने की इच्छा की थी तो उसी समय एक परम उत्तम तेज का पुञ्ज प्रादुर्भूत हुआ था ।६८-६६।
२०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उस तेज के पुञ्ज के मध्य से एक चक्र के समान आकार का पदार्थ समुत्पन्न हुआ था और उसके मध्य में समुदित सूर्य के सदृश प्रभा से समन्वित देवी प्रकट हुई थी ।७०।
जगदुज्जीवनकरीं ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ।
सौन्दर्यसारसीमां तामानन्दरससागराम् ॥७१
जपाकुसुमसंकाशां दाडिमीकुसुमांबराम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तां शृङ्गारैकरसालयाम् ॥७२
कृपातरंगितापांगनयनालोककौमुदीम् ।
पाशांकु शेक्षुकोदण्डपंच बाणलसत्कारम् ॥७३
तां विलोक्य महादेवी देवाः सर्वे सवासवाः ।
प्रणेमुर्मुदितात्मानो भूयोभूयोऽखिलात्मिकाम् ॥७४
तया विलोकिताः सद्यस्ते सर्वे विगतज्वराः ।
सम्पूर्णांगा दृढतरा वज्रदेहा महाबलाः ।
तुष्टुवुश्च महादेवीमंबिकामखिलार्थदाम् ॥७५
अब उस महादेवी के स्वरूप का वर्णन किया जाता है—वह देवी इस जगत् के उज्जीवन करने वाली थी और ब्रह्मा—विष्णु और शिव के स्वरूप वाली थी । उसका स्वरूप सौन्दर्य के सार की सीमा ही था । और वह आनन्द के रस का सागर थी ।७१। उसका कलेवर जपा के पुष्पों के सदृश था और उसके वस्त्र दाड़िमी के कुसुमों के समान वर्ण वाले थे । वह सभी आभरणों से भूषित थी तथा शृङ्गार रस का एक स्थल स्वरूप वह थी ।७२। कृपा से तरंगित अपांगों वाले नेत्रों से प्रकाश करने वाली वह कौमुदी थी । उसके करों में पाश-अंकुश-इक्षु-को दण्ड और पांच बाण थे जिससे वह परम सुशोभित थी ।७३। उस महादेवी का दर्शन करके इन्द्र के सहित समस्त देवगणों ने बारम्बार प्रसन्न मनों वाले होकर उस अखिलात्मिका के चरणोंमें प्रणाम किया था ।७४। उसके द्वारा अवलोकित होकर सभी देवगण दुःख रहित हो गये थे । उनके सब अंग पूर्ण हो गये थे और बहुत अधिक सुदृढ़—वज्र के समान देहों वाले तथा महान् बल से सम्पन्न हो गये थे । सब कुछ देने वाली उस अम्बिका महादेवी का उन्होंने स्तवन किया था ।७५।
—X—
ललिता स्तवराज वर्णन ] [ २०५
॥ ललिता स्तवराज वर्णन ॥
देवा ऊचुः-
जय देवि जगन्मातर्जय देवि परात्परे ।
जय कल्याणनिलये जय कामकलात्मिके ॥१
जयकारि च वामाक्षि जय कामाक्षि सुन्दरि ।
जयाखिलसुराराध्ये जय कामेशि मानदे ॥२
जय ब्रह्ममये देवि ब्रह्मात्मकरसात्मिके ।
जय नारायणि परे नन्दिताशेषविष्टपे ॥३
जय श्रीकण्ठदयिते जय श्रीललितेम्बिके ।
जय श्रीविजये देवि विजयश्रीसमृद्धिदे ॥४
जातस्य जायमानस्य इष्टापूर्तस्य हेतवे ।
नमस्तस्यै त्रिजगतां पालयित्र्यै परात्परे ॥५
कलामुहूर्तकाष्ठाहर्मासतुंशरदात्मने ।
नमः सहस्रशीर्षायै सहस्रमुखलोचने ॥६
नमः सहस्रहस्ताब्जपादपंकजशोभिते ।
अणोरणुतरे देवि महतोऽपि महीयसि ॥७
देवों ने कहा—हे परसे भी परे ! हे देवि ! आप तो इस समस्त जगत् की माता हैं, आपकी जय हो। आप तो सबके कल्याण करने का स्थल हैं और आप काम कला का स्वरूप वाली है, आपकी जय हो ।१। हे परम सुन्दर नेत्रों वाली ! हे कामाक्षि ! हे सुन्दरि ! आप जय करने वाली हैं । आप समस्त सुरों की आराधन करने के योग्य हैं। हे कामेशि ! आप मान देने वाली हैं आपकी जय हो-जय हो ।२। हे ब्रह्ममये ! हे देवि ! आप तो ब्रह्मात्मक रस के स्वरूप वाली हैं। हे नारायणि ! आप परा हैं जो सम्पूर्ण स्वर्ग वासियों के द्वारा वन्दित हैं ।३। आप श्री कण्ठ (शिव) की दायिता हैं आपकी जय हो। हे श्री ललिताम्बिके ! हे देवि ! आप श्री की विजय तथा श्री की समृद्धि का प्रदान करने वाली है ।४। हे पर से भी परे ! जो जन्म धारण कर चुका है और जन्म लेने वाला है आप उसके इष्टा पूत्त की हेतु
२०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
हैं। तीनों जगतों की पालन करने वाली उन आपके लिए हमारा सबका नमस्कार है ।५। कला-काष्ठा-मुहूर्त्त-दिन-मास-ऋतु और वर्षों के स्वरूप वाली आप हैं। सहस्र शीर्ष-मुख और लोचनों वाली आपके लिए हमारा प्रणाम है ।६। आप सहस्र हाथ-चरण कमलों से परम शोभित हैं। आप अणु तथा महान् से भी अधिक महान् से भो अधिक महान् है। हे देवि ! आपके लिए हमारा नमस्कार है ।७।
परात्परतरे मातस्तेजस्तेजीयसामपि । अतलं तु भवेत्पादौ वितलं जानुनी तव ॥८ रसातलं कटीदेशः कुक्षिस्ते धरणी भवेत् । हृदयं तु भुवर्लोकः स्वस्ते मुखमुदाहृतम् ॥९ दृशश्चन्द्रार्कदहना दिशस्ते बाहवोंबिके । मरुतस्तु तवोच्छ्वासा वाचस्ते श्रुतयोऽखिलाः ॥१० क्रीडा ते लोकरचना सखा ते चिन्मयः शिवः । आहारस्ते सदानन्दो वासस्ते हृदये सताम् ॥११ दृश्यादृश्यरूपाणि स्वरूपराणि भुवनानि ते । शिरोरुहा घनास्ते तु तारकाः कुसुमानि ते ॥१२ धर्माद्या बाहवस्ते स्युरधर्माद्यायुधानि ते । यमाश्च नियमाश्चैव करपादरुहास्तथा ॥१३ स्तनौ स्वाहास्वधाकरौ लोकोज्जीवनकारकौ । प्राणायामस्तु ते नासा रसना ते सरस्वती ॥१४
हे माता ! आप पर से भी पर हैं और जो भी तेज धारण करने वाले हैं उनका भी तेज आप ही हैं। यह अतल लोक आपके दोनों चरण हैं और वितल लोक आपके दोनों जानु हैं ।८। रसातल आपका कटिभाग है और यह धरणी आपकी कुक्षि हैं। आपका मुख स्वर्लोक है तथा भुवर्लोक आपका हृदय है ।९। चन्द्र-सूर्य और अग्नि आपके नेत्र हैं। वायु आपके अच्छ्वास हैं और श्रुति (कान) आपकी वाणी है ।१०। यह समस्त लोकों की रचना आपकी क्रीड़ा है और ज्ञान से परिपूर्ण भगवान् शिव ही आपके सखा हैं। सर्वदा आनन्द का रहना ही आपका आहार हैं तथा आपका
ललिता स्तवराज-वर्णन ] [ २०७
निवास स्थल सत्पुरुषों का हृदय है ॥११॥ ये समस्त भुवन ही आपके देखने के योग्य और अदृश्य रूप हैं । ये घन ही आपके केश हैं तथा तारागण आपके केशों में लगे हुए पुष्प हैं ।१२। ये धर्म आदि सब आपकी भुजाएँ हैं और अधर्म आदि सब आपके आयुध हैं । समस्त यम और नियम आपके कर और पाद के ।१३। स्वाहा और स्वधा के आकार वाले ही आपके दो स्तन हैं जो लोकों के उज्ज्ीवन करने वाले हैं । प्राणायाम ही आपकी नासिका है तथा सरस्वती देवी ही आपकी रचना है ।१४।
प्रत्याहारस्त्विन्द्रियाणि ध्यानं ते धीस्तु सत्तमा । मनस्ते धारणाशक्तिर्हृदयं ते समाधिकः ॥१५॥ महीरुहास्त्वंगरुहाः प्रभातं वसनं तव । भूतं भव्यं भविष्यच्च नित्यं च तव विग्रहः ॥१६॥ यज्ञरूपा जगद्धात्री विश्वरूपा च पावनी । आदौ या तु दयाभूता ससर्ज निखिलाः प्रजाः ॥१७॥ हृदयस्थापि लोकानामदृश्या मोहनात्मिका ॥१८॥ नामरूपविभागं च या करोति स्वलीलया । तान्यधिष्ठाय तिष्ठन्ती तेष्वसक्तार्थकामदा । नमस्तस्यै महादेव्यै सर्वशक्त्यर्थं नमोनमः ॥१९॥ यदाज्ञया प्रवर्तंते वह्निन्सूर्येन्दुमारुताः । पृथिव्यादीनि भूतानि तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२०॥ या ससर्जादिधातारं सर्गादावादिभूरिदम् । दधार स्वयमेवैका तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२१॥
आपका प्रत्याहार ही इन्द्रियाँ हैं और ध्यान ही परम श्रेष्ठ बुद्धि है । आपकी धारणा शक्ति ही मन है और आपका हृदय समाधिक है ।१५। पर्वत ही आपके अङ्गरुह हैं और प्रभात आपका वसन है । भूत-भव्य-भविष्य और नित्य आपका विग्रह है ।१६। जगत् की धात्री आप यज्ञ स्वरूप वाली हैं और परम पावनी विश्व के रूप वाली हैं । जिसने आदि काल में दया के स्वरूप वाली होकर इन समस्त प्रजाओं का सृजन किया था ।१७। आप सबके हृदयों में स्थित भी रहती हुई मोहन स्वरूप वाली लोकों के लिए
२०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अदृश्य हैं।१८। आप अपने नामों का और रूप का विभाग अपनी ही लीला से किया करती है। आप उनमें अधिष्ठित रहकर ही स्थित रहा करती है और उनमें जो असक्त हैं उनके अर्थ और कामनाओं के प्रदान करने वाली हैं। उन महादेवी के लिए बारम्बार नमस्कार है और सर्वशक्ति को बार-बार प्रणाम है।१९। जिसकी आज्ञा से ही ये अग्नि-सूर्य तथा चन्द्रमा अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त हुआ करते हैं और पृथिवी आदि ये भूत भी कार्यरत रहा करते हैं उस देवी के लिये बारम्बार प्रणाम है।२०। जिसने आदि धाता का सृजन किया था और जिसने सर्ग के आदि काल में आदि भू का रूप धारण किया था तथा इस सबको स्वयं एक ही ने धारण किया था उस देवी के लिए अनेक बार प्रणाम है।२१।
यया धृता तु धरणी ययाकाशममेयया ।
यस्यामुदेति सविता तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२२
यत्रोदेति जगत्कृत्स्नं यत्र तिष्ठति निर्भरम् ।
यत्रांतमेति काले तु तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२३
नमोनमस्ते रजसे भवायै नमोनमः सात्त्विकसंस्थितायै ।
नमोनमस्ते तमसे हरायै नमोनमो निर्गुणतः शिवायै ॥२४
नमोनमस्ते जगदेकमात्रे नमोनमस्ते जगदेकपित्रे ।
नमोनमस्तोऽखिलरूपतंत्रे नमोनमस्तोऽखिलयन्त्ररूपे ॥२५
नमोनमो लोकगुरुप्रधाने नमोनमस्तोऽखिलवाग्विभूत्यै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै जगदेकतुष्ट्यै नमोनमः
शांभवि सर्वशक्तये ॥२६
अनादिमध्यांतमपाञ्चभौतिकं ह्यवाङ्मनोगम्यमतर्क्यवैभवम्
अरूपमद्वंद्वमदृष्टिगोचरं प्रभावमग्र्यं कथमंब वर्णये ॥२७
प्रसीद विश्वेश्वरि विश्ववंदिते प्रसीद विद्येश्वरि वेदरूपिण
प्रसीद मायामयि मंत्रविग्रहे प्रसीद सर्वेश्वरि सर्वरूपिणि ॥२८
जिसने इस धरणी को धारण किया है और जिस अमेया ने इस आकाश को धारण किया है जिसमें सविता समुदित होता है उस महादेवी