भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २०१

षष्टिवर्षसहस्राणां राज्यं तव शिवार्पितम् ॥५३ तस्मादप्यधिकं वीर गतमासीदनेकंशः । अशक्यप्रतिकार्योऽयं यः कालश्शिवचोदितः ॥५४ अशक्यप्रतिकार्योऽयं तदभ्यर्चनतो विना । काले तु भोगः कर्त्तव्यो दुःखस्य च सुखस्य वा ॥५५ अथाह भीमकर्माख्यो नोपेक्ष्योऽरिर्यथाबलम् । क्रियाविघ्ने कृतेऽस्माभिर्विजयस्ते भविष्यति ॥५६

जब आप मोहित हो गये हैं तो ऐसी अवस्था में आपको देखकर छिद्रों की खोज में परायण इन्द्र आपके ऊपर विजय प्राप्त करने के लिये महान् तप कर रहा है ।५०। यदि जगत् की धात्री देवी प्रसन्न हो गयी तो फिर उसी की विजय होगी। इसलिए इस मायामयी को छोड़कर मन्त्रियों के साथ अन्य है मवन्त पर्वत पर जाओ और उन देवों के तप में विघ्न पैदा करो ।५१। श्री गुरुदेव के द्वारा जब इस रीति से कहा गया था तब दैत्येन्द्र ने अपना उत्तम पर्यंक त्याग दिया था और वृद्ध मन्त्रियों को बुलाकर जो भी वृत्त था वह सब कह सुनाया था ।५२। इसका श्रवण करके श्रुतवर्मा ने विचार करके राजा से कहा था। आपका राज्य शासन साठ हजार वर्षों तक ही शिव ने आपको प्रदान किया था ।५३। हे वीर ! अब तो उतने समय से भी अधिक समय व्यतीत हो चुका है और अनेकों वर्ष निकल गये हैं। यह समय तो भगवान् शिव के द्वारा ही दिया गया था। अब इसका कोई भी प्रतीकार नहीं किया जा सकता है ।५४। अब उनके ही अभ्यर्चना के बिना यह राज्य का रहना असम्भव है और इसका कोई भी प्रतिकार नहीं हो सकता है। यह तो काल है इसमें तो सुख और दुःख का भोग करना होगा ।५५। इसके अनन्तर जो भीमकर्मा नाम वाला मन्त्री था उसने कहा— जहाँ तक बल है शत्रु की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हम लोगों के द्वारा जब क्रिया का विघ्न किया जायेगा तो ऐसा करने पर आपका ही विजय होगा ।५६।

तव युद्धे महाराज परार्थं बलहारिणी । दत्ता विद्या शिवेनैव तस्मात्ते विजयः सदा ॥५७ अनुमेने च तद्वाक्यं भण्डो दानवनायकः ।