संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जातिमात्रं हि भवतो हंति सर्वान्सदा हरिः ।
तेनैव निर्मिता माया यया संमोहितो भवान् ॥४६
उस महामुनि के द्वारा इस प्रकार से जब देवगणों के स्वामी को सम्बोधित किया गया था तो उस इन्द्र ने सब देवों के सहित मुनि का पूजन किया था और तपश्चर्या करने के लिये तैयारी करने वाला वह हैमवान् के तट पर चला गया था ।४३। वहाँ पर सब ऋतुओं के कुसुमों से समुज्ज्वल भागीरथी गंगा के तीर पर समस्त सुरगणों के साथ उस इन्द्र ने उस परा शक्ति की महा पूजा की थी । उस समय से ही लेकर अखिल सिद्धियों का प्रदान करने वाला वह स्थल इन्द्रप्रस्थ नाम वाला हो गया था ।४४। ब्रह्माजी के पुत्र नारदजी के द्वारा उपदेश की गयी विधि से जप और ध्यान में निरत आत्मा वालों की उस देवी की महती परा पूजा करने वालों को बहुत समय व्यतीत हो गया था ।४५। वे सभी परम उग्र तप में संस्थित थे तथा अन्य किसी में भी उनका चित्त न लगकर उसी में निरत था । ऐसे उनको करते हुए दश सहस्र वर्ष और दश दिन बीत गये थे ।४६। इधर महामति भृगु के ने उन समस्त दैत्यों को मोहित देखकर वह भण्डासुर के समीप में पहुँचे थे और उससे पुरोहित जी ने कहा था ।४७। हे राजेन्द्र ! आपका ही समाश्रय लेकर सदा ही सब दानव गण निर्भय होकर तीनों लोकों में चरण किया करते हैं और अपनी इच्छा से ही विहार करते हैं ।४८। हरि भगवान् तो आपकी पूर्ण जाति का ही हनन किया करते हैं और सदा सबका विनाश करते हैं । उन्हीं के द्वारा इस माया की रचना की गयी है जिसके द्वारा आप संमोहित हो गये हैं ।४६।
भवंतं मोहितं दृष्ट्वा रंध्रान्वेषणतत्परः ।
भवतां विजयार्थाय करोतींद्रो महत्तपः ॥५०
यदि तुष्टा जगद्धात्री तस्यैव विजयो भवेत् ।
इमां मायामयीं त्यक्त्वा मंत्रिभिः सहितो भवान् ।
गत्वा हैमवतं शैलं परेषां विघ्नमाचर ॥५१
एवमुक्तस्तु गुरुणा हित्वा पर्यंकमुत्तमम् ।
मंत्रिवृद्धानुपाहूय यथावृत्तांतमाह सः ॥५२
तच्छ्रुत्वा नृपतिं प्राह श्रुतवर्मा विमृश्य च ।