भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६६

जिसको आप धन्य बनाना चाहते हैं ।३७। आपके शुभ आगमन का कारण भविष्य को परम शुभ बताने वाला होता है। हे मुनीश्वर ! श्रवणों को परमानन्द उपजाने वाले आपके मुख से निःसृत वाक्य को सुनकर मैं समस्त दुःखों को पार करके परम कृतार्थ होऊँगा ।३८। श्री नारदजी ने कहा—दैत्यों का स्वामी भण्ड विष्णु की माया से सम्मोहित हो गया है। उसके द्वारा विमुक्त हुआ वह तीनों लोकों को दूसरी अग्नि के ही समान दहन करता है ।३९। वह तेजों से-अस्त्रों से और मायाके बलसे आपसे भी अधिक है। उस अत्यधिक बलवान् के तेज का अपहरण अवश्य ही करना चाहिए ।४०। हे इन्द्र ! पराशक्ति देवी की आराधना के बिना किसी भी अन्य तप से सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी उसके अति बल का अपहरण नहीं हो सकता है ।४१। हे मूर्खो ! उदीयमान शत्रु के पूर्व में ही आराधना करो अर्थात् शत्रु जैसे ही बढ़ रहा हो उसी समय में पहिले ही आराधना करनी चाहिए। आराधना की हुई वह भगवती तुम्हारा श्रेय कर देगी ।४२।

एवं संबोधितस्तेन शक्रो देवगणेश्वरः ।
तं मुनिं पूजयामास सर्वदेवैः समन्वितः ।
तपसे कृतसन्नाहो ययौ हैमवतं तटम् ॥४३
तत्र भागीरथीतीरे सर्वर्तुं कुसुमोज्ज्वले ।
पराशक्तेर्महापूजां चक्रेऽखिलसुरैः समम् ।
इन्द्रप्रस्थमभून्नाम्ना तदाद्यखिलसिद्धिदम् ॥४४
ब्रह्मात्मजोपदिष्टेन कुर्वतां विधिना पराम् ।
देव्यास्तु महतीं पूजां जपध्यानरतात्मनाम् ॥४५
उग्रे तपसि संस्थानामनन्यार्पितचेतसाम् ।
दशवर्षसहस्राणि दशाहानि च संययुः ॥४६
मोहितानथ तान्दृष्ट्वा भृगुपुत्रो महामतिः ।
भंडासुरं समभ्येत्य निजगाद पुरोहितः ॥४७
त्वामेवाश्रित्य राजेंद्र सदा दानवसत्तमाः ।
निर्भयास्त्रिषु लोकेषु चरंतीच्छाविहारिणः ॥४८