भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पुरोहित थे उनका भी अपमान करके उन्हें छोड़ दिया था। उनके सहस्रों वर्ष एक मुहूर्त्त के ही समान व्यतीत हो गये थे ।३३। उन समस्त दैत्यों के विमोहित हो जाने पर इन्द्रदेव के सहित सब देवगण हे ब्रह्मन् ! विमुक्त उपद्रव वाले होकर परम आनन्द को प्राप्त हो गये थे ।३४। इसके अनन्तर किसी समय में देवेन्द्र को अपने सिंहासन पर विराजमान देखकर जो कि समस्त देवों से घिरा हुआ अवस्थित था नारद मुनि वहाँ पर समागत हो गये थे ।३५।

प्रणम्य मुनिशार्दूलं ज्वलन्तमिव पावकम् ।
कृतांजलिपुटो भूत्वा देवेशो वाक्यमब्रवीत् ॥३६
भगवन्सर्वधर्मज्ञ परापरविदां वर ।
तत्रैव गमनं ते स्याद्यं धन्यं कर्तुमिच्छसि ॥३७
भविष्यच्छोभनाकारं तवागमनकारणम् ।
त्वद्वाक्यामृतमाकर्ण्य श्रवणानंदनिर्भरम् ।
अशेषदुःखान्युत्तीर्य कृतार्थः स्याः मुनीश्वर ॥३८

नारद उवाच-
अथ संमोहितो भंडो दैत्येंद्रो विष्णुमायया ।
तया विमुक्तो लोकांस्त्रीन्दहेताग्निरिवापरः ॥३६
अधिकस्तव तेजोभिरस्त्रैर्मयाबलेन च ।
तस्य तेजोऽपहारस्तु कर्तव्योऽतिबलस्य तु ॥४०
विनाराधनतो देव्याः पराशक्तेस्तु वासव ।
अशक्योऽन्येन तपसा कल्पकोटिशतैरपि ॥४१
पुरैवोदयतः शत्रोराराधयत बालिशाः ।
आराधिता भगवती सा वः श्रेयो विधास्यति ॥४२

जाज्वल्यमान अग्नि के समान परम तेजस्वी मुनि शार्दूल को प्रणाम करके अपने दोनों हाथों को जोड़ कर देवेन्द्र ने यह वाक्य कहा था ।३६। हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञान रखने वाले हैं और आप परावर के ज्ञाताओं में भी परम श्रेष्ठ हैं। आपका गमन तो वहाँ पर हुआ करता है