संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
निर्गत्य सह सेनाभिर्ययौ हैमवतं तटम् ॥५८ तपोविघ्नकरान्दृष्ट्वा दानवाञ्जगदंबिका । अलंघ्यमकरोदग्रे महाप्राकारमुज्ज्वलम् ॥५९ तं दृष्ट्वा दानवेंद्रोऽपि किमेतदिति विस्मितः । संक्रुद्धो दानवास्त्रेण बंभजातिबलेन तु ॥६० पुनरेव तदग्रेऽभूदलंघ्यः सर्वदानवैः । वायव्यास्त्रेण तं धीरो वभंज च ननाद च ॥६१ पौनः पुन्येन तद्भस्म प्राभूत्पुनरुपस्थितम् । एतद्दृष्ट्वा तु दैत्येंद्रो विषण्णः स्वपुरं ययौ ॥६२ तां च दृष्ट्वा जगद्धात्रीं दृष्ट्वा प्राकारमुज्ज्वलम् । भयाद्विव्यथिरे देवा विमुक्तसकलक्रियाः ॥६३
हे महाराज ! आपके युद्ध में परों के बल के हरण करने वाली विद्या भगवान् शिव ने ही प्रदान की है इसलिए आपकी सदा ही विजय होगी ।५७। दानवों के नायक भण्ड ने उसके वाक्य को मान लिया था और सेनाओं के साथ वह निकल कर हैमवत के तट पर चला गया था ।५८। जगम्बिका ने तपश्चर्या के अन्दर विघ्न डालने वालों को देखा था उसने आगे उज्ज्वल जो महा प्रकार था उसको न लांघने के योग्य बना दिया था ।५९। उसको देखकर वह दानवेन्द्र भी यह क्या है—इस बात से अत्यधिक विस्मित हो गया था । वह अधिक क्रुद्ध होगया था और उसने दानवास्त्र के द्वारा उसको भंग करना चाहा था ।६०। वह फिर भी उसके आगे गया था किन्तु वह सभी दानवों के द्वारा न लांघने के योग्य हो गया था । और उस धीर ने दानवास्त्र के द्वारा उसका भंग किया था और बड़ी गजना भी की थी ।६१। बारम्बार भी ऐसा करने से वह भस्म फिर समुत्पन्न हो गयी थी और उपस्थित हो गयी थी । यह देखकर वह दानवेन्द्र परम विषाद से युक्त होकर अपने पुर को चला गया था ।६२। देवों ने उस जगत् की धात्री का दर्शन किया था और उस उज्ज्वल प्राकार को भी देखा था । देवगण भय से बहुत ही व्यथित हो गये थे और उन्होंने समस्त क्रियाओं को छोड़ दिया था ।६३।