भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २०३

तानुवाच ततः शक्रो दैत्येन्द्रोऽयमिहागतः ।
अशक्यः समरे योद्धुमस्माभिरखिलैरपि ॥६४
पलायितानामपि नो गतिरन्या न कुत्रचित् ।
कुण्डं योजनविस्तारं सम्यक्कृत्वा तु शोभनम् ॥६५
महायागविधानेन प्रणिधाय हुताशनम् ।
यजामः परमां शक्तिं महामांसैर्वयं सुराः ॥६६
ब्रह्मभूता भविष्यामो भोक्ष्यामो वा त्रिविष्टपम् ।
एवमुक्तास्तु ते सर्वे देवाः सेन्द्रपुरोगमाः ॥६७
विधिवज्जुहुवुर्मांसा न्युत्कृत्योत्कृत्य मंत्रतः ।
हुतेषु सर्वांगेषु पादेषु च करेषु च ॥६८
होतुमिच्छत्सु देवेषु कलेवरमशेषतः ।
प्रादुर्बभूव परमन्तेजः पुंजो ह्यनुत्तमः ॥६६
तन्मध्यतः समुद्भूच्चक्राकारमनुत्तमम् ।
तन्मध्ये तु महादेवीमुदयार्कसमप्रभाम् ॥७०

इसके पश्चात् इन्द्र देव ने उन देवगणों से कहा था कि यह दैत्येन्द्र यहाँ पर आ गया है और इसको इन सभी लोग भी जीतने में युद्ध में असमर्थ है ।६४। अगर हम सब लोग यहाँ से भागते भी हैं तो भी हमारी कहीं पर भी अन्य कोई गति नहीं है। एक योजनके विस्तार वाला कुण्ड बनाकर जो बहुत ही अच्छा और सुन्दर हो हम सब यज्ञ का कार्य सम्पन्न करें ।६५। महायाग का जो भी विधान है उसी से हुताशन का प्रणिधान करें। हम सब सुरगण महा मांसो से इस परमा शक्ति का ही इस समय में यजन करें ।६६। हम सब लोग ऐसा करने से ब्रह्मभूत हो जायेंगे अथवा स्वर्ग लोक का भोग करेंगे। इस प्रकार से जब सब देवों से कहा गया था तो इन्द्र ही जिनमें अग्रणी था वे सभी देवगण प्रस्तुत हो गये थे ।६७। फिर उन्होंने मन्त्रों के द्वारा काट-काट कर विधि पूर्वक मांसों से हवन किया था। शरीरों के समस्त मांस का हवन करने पर तथा चरणों और करों का भी होम करने पर जब उन्होंने अपना सम्पूर्ण शरीर ही हवन कर देने की इच्छा की थी तो उसी समय एक परम उत्तम तेज का पुञ्ज प्रादुर्भूत हुआ था ।६८-६६।