संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उस तेज के पुञ्ज के मध्य से एक चक्र के समान आकार का पदार्थ समुत्पन्न हुआ था और उसके मध्य में समुदित सूर्य के सदृश प्रभा से समन्वित देवी प्रकट हुई थी ।७०।
जगदुज्जीवनकरीं ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ।
सौन्दर्यसारसीमां तामानन्दरससागराम् ॥७१
जपाकुसुमसंकाशां दाडिमीकुसुमांबराम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तां शृङ्गारैकरसालयाम् ॥७२
कृपातरंगितापांगनयनालोककौमुदीम् ।
पाशांकु शेक्षुकोदण्डपंच बाणलसत्कारम् ॥७३
तां विलोक्य महादेवी देवाः सर्वे सवासवाः ।
प्रणेमुर्मुदितात्मानो भूयोभूयोऽखिलात्मिकाम् ॥७४
तया विलोकिताः सद्यस्ते सर्वे विगतज्वराः ।
सम्पूर्णांगा दृढतरा वज्रदेहा महाबलाः ।
तुष्टुवुश्च महादेवीमंबिकामखिलार्थदाम् ॥७५
अब उस महादेवी के स्वरूप का वर्णन किया जाता है—वह देवी इस जगत् के उज्जीवन करने वाली थी और ब्रह्मा—विष्णु और शिव के स्वरूप वाली थी । उसका स्वरूप सौन्दर्य के सार की सीमा ही था । और वह आनन्द के रस का सागर थी ।७१। उसका कलेवर जपा के पुष्पों के सदृश था और उसके वस्त्र दाड़िमी के कुसुमों के समान वर्ण वाले थे । वह सभी आभरणों से भूषित थी तथा शृङ्गार रस का एक स्थल स्वरूप वह थी ।७२। कृपा से तरंगित अपांगों वाले नेत्रों से प्रकाश करने वाली वह कौमुदी थी । उसके करों में पाश-अंकुश-इक्षु-को दण्ड और पांच बाण थे जिससे वह परम सुशोभित थी ।७३। उस महादेवी का दर्शन करके इन्द्र के सहित समस्त देवगणों ने बारम्बार प्रसन्न मनों वाले होकर उस अखिलात्मिका के चरणोंमें प्रणाम किया था ।७४। उसके द्वारा अवलोकित होकर सभी देवगण दुःख रहित हो गये थे । उनके सब अंग पूर्ण हो गये थे और बहुत अधिक सुदृढ़—वज्र के समान देहों वाले तथा महान् बल से सम्पन्न हो गये थे । सब कुछ देने वाली उस अम्बिका महादेवी का उन्होंने स्तवन किया था ।७५।
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