संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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॥ ललिता स्तवराज वर्णन ॥
देवा ऊचुः-
जय देवि जगन्मातर्जय देवि परात्परे ।
जय कल्याणनिलये जय कामकलात्मिके ॥१
जयकारि च वामाक्षि जय कामाक्षि सुन्दरि ।
जयाखिलसुराराध्ये जय कामेशि मानदे ॥२
जय ब्रह्ममये देवि ब्रह्मात्मकरसात्मिके ।
जय नारायणि परे नन्दिताशेषविष्टपे ॥३
जय श्रीकण्ठदयिते जय श्रीललितेम्बिके ।
जय श्रीविजये देवि विजयश्रीसमृद्धिदे ॥४
जातस्य जायमानस्य इष्टापूर्तस्य हेतवे ।
नमस्तस्यै त्रिजगतां पालयित्र्यै परात्परे ॥५
कलामुहूर्तकाष्ठाहर्मासतुंशरदात्मने ।
नमः सहस्रशीर्षायै सहस्रमुखलोचने ॥६
नमः सहस्रहस्ताब्जपादपंकजशोभिते ।
अणोरणुतरे देवि महतोऽपि महीयसि ॥७
देवों ने कहा—हे परसे भी परे ! हे देवि ! आप तो इस समस्त जगत् की माता हैं, आपकी जय हो। आप तो सबके कल्याण करने का स्थल हैं और आप काम कला का स्वरूप वाली है, आपकी जय हो ।१। हे परम सुन्दर नेत्रों वाली ! हे कामाक्षि ! हे सुन्दरि ! आप जय करने वाली हैं । आप समस्त सुरों की आराधन करने के योग्य हैं। हे कामेशि ! आप मान देने वाली हैं आपकी जय हो-जय हो ।२। हे ब्रह्ममये ! हे देवि ! आप तो ब्रह्मात्मक रस के स्वरूप वाली हैं। हे नारायणि ! आप परा हैं जो सम्पूर्ण स्वर्ग वासियों के द्वारा वन्दित हैं ।३। आप श्री कण्ठ (शिव) की दायिता हैं आपकी जय हो। हे श्री ललिताम्बिके ! हे देवि ! आप श्री की विजय तथा श्री की समृद्धि का प्रदान करने वाली है ।४। हे पर से भी परे ! जो जन्म धारण कर चुका है और जन्म लेने वाला है आप उसके इष्टा पूत्त की हेतु