संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हैं। तीनों जगतों की पालन करने वाली उन आपके लिए हमारा सबका नमस्कार है ।५। कला-काष्ठा-मुहूर्त्त-दिन-मास-ऋतु और वर्षों के स्वरूप वाली आप हैं। सहस्र शीर्ष-मुख और लोचनों वाली आपके लिए हमारा प्रणाम है ।६। आप सहस्र हाथ-चरण कमलों से परम शोभित हैं। आप अणु तथा महान् से भी अधिक महान् से भो अधिक महान् है। हे देवि ! आपके लिए हमारा नमस्कार है ।७।
परात्परतरे मातस्तेजस्तेजीयसामपि । अतलं तु भवेत्पादौ वितलं जानुनी तव ॥८ रसातलं कटीदेशः कुक्षिस्ते धरणी भवेत् । हृदयं तु भुवर्लोकः स्वस्ते मुखमुदाहृतम् ॥९ दृशश्चन्द्रार्कदहना दिशस्ते बाहवोंबिके । मरुतस्तु तवोच्छ्वासा वाचस्ते श्रुतयोऽखिलाः ॥१० क्रीडा ते लोकरचना सखा ते चिन्मयः शिवः । आहारस्ते सदानन्दो वासस्ते हृदये सताम् ॥११ दृश्यादृश्यरूपाणि स्वरूपराणि भुवनानि ते । शिरोरुहा घनास्ते तु तारकाः कुसुमानि ते ॥१२ धर्माद्या बाहवस्ते स्युरधर्माद्यायुधानि ते । यमाश्च नियमाश्चैव करपादरुहास्तथा ॥१३ स्तनौ स्वाहास्वधाकरौ लोकोज्जीवनकारकौ । प्राणायामस्तु ते नासा रसना ते सरस्वती ॥१४
हे माता ! आप पर से भी पर हैं और जो भी तेज धारण करने वाले हैं उनका भी तेज आप ही हैं। यह अतल लोक आपके दोनों चरण हैं और वितल लोक आपके दोनों जानु हैं ।८। रसातल आपका कटिभाग है और यह धरणी आपकी कुक्षि हैं। आपका मुख स्वर्लोक है तथा भुवर्लोक आपका हृदय है ।९। चन्द्र-सूर्य और अग्नि आपके नेत्र हैं। वायु आपके अच्छ्वास हैं और श्रुति (कान) आपकी वाणी है ।१०। यह समस्त लोकों की रचना आपकी क्रीड़ा है और ज्ञान से परिपूर्ण भगवान् शिव ही आपके सखा हैं। सर्वदा आनन्द का रहना ही आपका आहार हैं तथा आपका