संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललिता स्तवराज-वर्णन ] [ २०७
निवास स्थल सत्पुरुषों का हृदय है ॥११॥ ये समस्त भुवन ही आपके देखने के योग्य और अदृश्य रूप हैं । ये घन ही आपके केश हैं तथा तारागण आपके केशों में लगे हुए पुष्प हैं ।१२। ये धर्म आदि सब आपकी भुजाएँ हैं और अधर्म आदि सब आपके आयुध हैं । समस्त यम और नियम आपके कर और पाद के ।१३। स्वाहा और स्वधा के आकार वाले ही आपके दो स्तन हैं जो लोकों के उज्ज्ीवन करने वाले हैं । प्राणायाम ही आपकी नासिका है तथा सरस्वती देवी ही आपकी रचना है ।१४।
प्रत्याहारस्त्विन्द्रियाणि ध्यानं ते धीस्तु सत्तमा । मनस्ते धारणाशक्तिर्हृदयं ते समाधिकः ॥१५॥ महीरुहास्त्वंगरुहाः प्रभातं वसनं तव । भूतं भव्यं भविष्यच्च नित्यं च तव विग्रहः ॥१६॥ यज्ञरूपा जगद्धात्री विश्वरूपा च पावनी । आदौ या तु दयाभूता ससर्ज निखिलाः प्रजाः ॥१७॥ हृदयस्थापि लोकानामदृश्या मोहनात्मिका ॥१८॥ नामरूपविभागं च या करोति स्वलीलया । तान्यधिष्ठाय तिष्ठन्ती तेष्वसक्तार्थकामदा । नमस्तस्यै महादेव्यै सर्वशक्त्यर्थं नमोनमः ॥१९॥ यदाज्ञया प्रवर्तंते वह्निन्सूर्येन्दुमारुताः । पृथिव्यादीनि भूतानि तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२०॥ या ससर्जादिधातारं सर्गादावादिभूरिदम् । दधार स्वयमेवैका तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२१॥
आपका प्रत्याहार ही इन्द्रियाँ हैं और ध्यान ही परम श्रेष्ठ बुद्धि है । आपकी धारणा शक्ति ही मन है और आपका हृदय समाधिक है ।१५। पर्वत ही आपके अङ्गरुह हैं और प्रभात आपका वसन है । भूत-भव्य-भविष्य और नित्य आपका विग्रह है ।१६। जगत् की धात्री आप यज्ञ स्वरूप वाली हैं और परम पावनी विश्व के रूप वाली हैं । जिसने आदि काल में दया के स्वरूप वाली होकर इन समस्त प्रजाओं का सृजन किया था ।१७। आप सबके हृदयों में स्थित भी रहती हुई मोहन स्वरूप वाली लोकों के लिए