संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अदृश्य हैं।१८। आप अपने नामों का और रूप का विभाग अपनी ही लीला से किया करती है। आप उनमें अधिष्ठित रहकर ही स्थित रहा करती है और उनमें जो असक्त हैं उनके अर्थ और कामनाओं के प्रदान करने वाली हैं। उन महादेवी के लिए बारम्बार नमस्कार है और सर्वशक्ति को बार-बार प्रणाम है।१९। जिसकी आज्ञा से ही ये अग्नि-सूर्य तथा चन्द्रमा अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त हुआ करते हैं और पृथिवी आदि ये भूत भी कार्यरत रहा करते हैं उस देवी के लिये बारम्बार प्रणाम है।२०। जिसने आदि धाता का सृजन किया था और जिसने सर्ग के आदि काल में आदि भू का रूप धारण किया था तथा इस सबको स्वयं एक ही ने धारण किया था उस देवी के लिए अनेक बार प्रणाम है।२१।
यया धृता तु धरणी ययाकाशममेयया ।
यस्यामुदेति सविता तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२२
यत्रोदेति जगत्कृत्स्नं यत्र तिष्ठति निर्भरम् ।
यत्रांतमेति काले तु तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२३
नमोनमस्ते रजसे भवायै नमोनमः सात्त्विकसंस्थितायै ।
नमोनमस्ते तमसे हरायै नमोनमो निर्गुणतः शिवायै ॥२४
नमोनमस्ते जगदेकमात्रे नमोनमस्ते जगदेकपित्रे ।
नमोनमस्तोऽखिलरूपतंत्रे नमोनमस्तोऽखिलयन्त्ररूपे ॥२५
नमोनमो लोकगुरुप्रधाने नमोनमस्तोऽखिलवाग्विभूत्यै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै जगदेकतुष्ट्यै नमोनमः
शांभवि सर्वशक्तये ॥२६
अनादिमध्यांतमपाञ्चभौतिकं ह्यवाङ्मनोगम्यमतर्क्यवैभवम्
अरूपमद्वंद्वमदृष्टिगोचरं प्रभावमग्र्यं कथमंब वर्णये ॥२७
प्रसीद विश्वेश्वरि विश्ववंदिते प्रसीद विद्येश्वरि वेदरूपिण
प्रसीद मायामयि मंत्रविग्रहे प्रसीद सर्वेश्वरि सर्वरूपिणि ॥२८
जिसने इस धरणी को धारण किया है और जिस अमेया ने इस आकाश को धारण किया है जिसमें सविता समुदित होता है उस महादेवी