संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह अन्त को प्राप्त हो जाता है उस देवी के लिए बार-बार नमस्कार निवेदित है ।२३। आप रजो रूपा भवा के लिए मेरा नमस्कार है तथा सात्विक संस्थिता के लिए नमस्कार है। तमोरूपहरा आपको नमस्कार है। निर्गुण स्वरूपा शिवा आपको प्रणाम है ।२४। आप इस सम्पूर्ण जगत् की एक ही माता हैं ऐसी आपको बारम्बार नमस्कार है । इस जगत् की आप ही एकमात्र पिता अर्थात् जनक हैं ऐसी आपके लिए अनेक बार नमस्कार हैं। आपका यह सम्पूर्ण स्वरूप तन्त्र है तथा आप अखिल यन्त्र रूपा हैं ऐसी आप की सेवा में अनेकशः हमारा प्रणाम निवेदित है ।२५। आप लोक गृह की प्रधान हैं ऐसी अखिल वाग् की विभूति के लिए हमारा बार-बार प्रणाम है। लक्ष्मी के लिए तथा जगत की एक तुष्टि के लिए हमारा बारम्बार नमस्कार है । हे शाम्भवि ! सर्वशक्ति आपको प्रणाम है ।२६। हे अम्ब ! आपका प्रभाव अत्युत्तम है तथा अनादि मध्यान्त हैं—अपाञ्च भौतिक है—वाणी मन से अगम्य है और अप्रतर्क्य वैभव वाला है । वह रूप तथा द्वन्द्व से रहित है एवं दृष्टिगोचर नहीं है, मैं किस प्रकार से इसका वर्णन करूँ ।२७। हे विश्वेश्वरि ! हे विश्व वन्दिते ! हे वेदों के स्वरूप वाली ! आप प्रसन्न होइये । हे मायामयि ! हे मन्त्रों के विग्रह वाली ! हे सर्वेश्वरि ! हे सर्वरूपिणि ! आप प्रसन्न होइए ।२८।
इति स्तुत्वा महादेवीं देवाः सर्वे सवासवाः ।
भूयोभूयो नमस्कृत्य शरणं जग्मुरञ्जसा ॥२९
ततः प्रसन्ना सा देवी प्रणतं वीक्ष्य वासवम् ।
वरेणाच्छन्दयामास वरदाखिलदेहिनाम् ॥३०
इन्द्र उवाच–
यदि तुष्टासि कल्याणि वरं दैत्येन्द्र पीडितः ।
दुर्धरं जीवितं देहि त्वां गताः शरणार्थिनः ॥३१
श्री देव्युवाच–
अहमेव विनिर्जित्य भंडं दैत्यकुलोद्भवम् ।
आहरात्तव तास्यामि त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥३२