भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 620, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 620

२१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

निर्भया मुदिताः सन्तु सर्वे देवगणास्तथा ।
ये स्तोष्यन्ति च मां भक्त्या स्तवेनानेन मानवाः ॥३३
भाजनं ते भविष्यन्ति धर्मश्रीयशसां सदा ।
विद्याविनयसंपन्ना नीरोगा दीर्घजीविनः ॥३४
पुत्रमित्रकलत्राढ्या भवन्तु मदनुग्रहात् ।
इति लब्धवरा देवा देवेन्द्रोऽपि महाबलः ॥३५
आमोदं परमं जग्मुस्तां विलोक्य मुहुर्मुहुः ॥३६

इस प्रकार से बहुत से बहुत लम्बी स्तुति करके इन्द्र के सहित समस्त देवगण महादेवी को बार-बार प्रणाम करके तुरन्त ही जगदम्बा के शरण में चले गये थे ।२६। फिर वह देवी परम प्रसन्न हो गयी थी और उसने इन्द्र को अपने चरणों में प्रणत देखा था। फिर समस्त देहधारियों को वरदान देने वाली देवी ने उसको वरदान देने के लिए कहा था ।३०। इन्द्र ने कहा—हे कल्याणि ! यदि आप मुझ पर सुप्रसन्न हैं तो मैं तो दैत्येन्द्र से पीड़ित हूँ । मुझे यही वरदान देवें कि मेरा दुर्धर जीवित होवे । हम लोग आपकी शरण में समागत हैं ।३१। श्री देवी ने कहा—मैं स्वयं ही दैत्य कुल में समुत्पन्न भण्ड को विनिर्जित करके धरा से लेकर तीनों लोकों को जिसमें सभी चर-अचर है तुझको दे दूँगी ।३२। फिर समस्त देवगण निर्भय और प्रसन्न होंगे और जो मनुष्य सदा ही धर्म-श्री और यश के भाजन होंगे तथा वे नीरोग-विद्या तथा विनय से सम्पन्न और दीर्घ जीवन होंगे ।३४। वे मेरे अनुग्रह से पुत्र-मित्र और कलत्र से सुसम्पन्न होंगे । इस रीति से देवगण और महान बलवान देवेन्द्र भी वर प्राप्त करने वाले होगये थे और बारम्बार उस जगदम्बा का दर्शन करके परमाधिक आनन्द को प्राप्त हो गये थे ।३५-३६।

—X—

॥ मदन कामेश्वर प्रादुर्भाव वर्णन ॥

हयग्रीव उवाच–
एतस्मिन्नेव काले तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
आजगामाथ देवेशीं द्रष्टुकामो महर्षिभिः ॥१