भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मोहयित्वाचिरेणैव विषयानुपभोक्ष्यसे ॥२३ एवं लब्ध्वा वरं माया तं प्रणम्य जनार्दनम् । ययाचेऽप्सरसो मुख्याः साहय्यार्थं काश्चन ॥२४ तया संप्राथितो भूयः प्रेषयामास काश्चन । ताभिर्विश्वाचिमुख्याभिः सहिता सा मृगेक्षणा । प्रययौ मानसस्याग्र्यं तटमुज्ज्वलभूरुहम् ॥२५ यत्र क्रीडति दैत्येन्द्रो निजनारीभिरन्वितः । तत्र सा मृगशावाक्षी मूले चंपकशाखिनः । निवासमकरोद्रम्यं गायन्ती मधुरस्वरम् ॥२६ अथागतस्तु दैत्येन्द्रो बलिभिर्मंत्रिभिर्वृतः । श्रुत्वा तु वीणानिनादं ददर्श च वरांगनाम् ॥२७ तां दृष्ट्वा चारुसर्वांगीं विद्युल्ले खामिवापराम् । मायामये महागर्ते पतितो मदनांभिधे ॥२८

तू तो अतीव अद्भुत प्रभाव वाली है। तू अपने ही ओज से समस्त प्राणियों का मोहन किया करती है। अब तू अपनी ही इच्छा के अनुसार विचरण कर और तुमको कोई भी नहीं जान सकेगा ।२२। अब तू यहाँ से शीघ्र ही जाकर दैत्यों के नायक भण्ड के समीप में पहुँच जा। और तुरन्त ही उसको मोहित कर दे कि विषयों को उपयोग करेगा ।२३। इस प्रकार का वरदान प्राप्त करके उस माया ने जनार्दन प्रभु को प्रणाम किया था। फिर उस माया ने भगवान् से सहायता करने के लिए कुछ प्रमुख अप्सराओं के प्राप्त करने की याचना की थी ।२४। जब माया के द्वारा प्रार्थना की गयी थी तो प्रभु ने कुछ अप्सराएं भेजी थीं उन अप्सराओं में विश्वाची आदि प्रमुख थीं। उस सबके साथ वह मृगेक्षणा माया वहाँ से प्रस्थान कर गयी थी। वह मानसरोवर के उत्तम तट पर गयी थी जहाँ पर उत्तम द्रुम लगे हुए थे ।२५। वह ऐसा सुरम्य स्थल था कि वह दैत्यराज वहाँ पर अपनी नारियों से युक्त होकर विहार की क्रीड़ा किया करता था। उसी स्थल में वह मृग के शावक के समान नेत्रों वाली माया एक चम्पक वृक्ष के मूल में निवास करने लगी थी और परम सुरम्य मधुर स्वर के कुछ गाया करती