संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ] [ २३१
चण्डो चण्डदयस्तीव्रा भैरवाः शूलपाणयः । ज्वलत्केशपिशङ्गाभास्तडिद्भासुरदिङ्मुखाः ॥४ दहत्य इव दैत्यौघांस्तीक्ष्णैर्मार्गणवह्निभिः । प्रचेलुर्दण्डनाथायास्सेना नासीग्धाविताः ॥५ अथ पोत्रीमुखीदेवीसमानाकृतिभूषणाः । तत्समानायुधकरास्तत्समानस्ववाहनाः ॥६ तीक्ष्णदंष्ट्रविनिष्ठ्यूतवह्निधूमामितांबराः । तमालश्यामलाकाराः कपिलाः क्रूरलोचनाः ॥७
इस दण्डनाथा का जो विशेष निर्माण हुआ था उसमें संख्यातीत अर्थात् अगणित छत्र थे जिनकी श्वेत प्रभा थी। उनसे नभोमण्डल ऐसा शोभित हो रहा था मानों उसमें अगणित चन्द्रमा उदित हो गये होवें ।१। वे परम धवल छत्र एक दूसरे से परस्पर में सट से रहे थे जिनसे उनका अन्तर बहुत ही घना हो गया था। उनके समुदाय में जो मणियाँ थीं उनकी कान्ति से अन्धकार का विनाश हो गया था ।२। उस बल में वज्र की प्रभा को भी पराजित करने वाली कान्ति से समस्त दिशाओं के मुखों को पूरित करने वाले सैकड़ों ही प्रकार के क्रोड़ मुख्य ताल वृत्त चले थे ।३। उस दण्डनाथा की सेनाएं नासीर से धावित होती हुई वहाँ से चली थीं उसमें जो सैनिक थे वे चण्ड दण्ड आदिक थे तथा परम तीव्र—भैरव और हाथों में शूल लिये हुए थे। वे जलते हुए केशों के समान पिशंग आभा से समन्वित थे तथा तड़ित् के समान भासुर थे जिनसे सभी दिशाएं भी भासुर हो रही थीं। अपनी परम तीक्ष्ण बाणों की अग्नि से दैत्यों के समूहों को दग्ध कर रहीं थीं ।४-५। इसके अनन्तर बहुत-सी शक्तियां भी उसमें चलीं थीं जो पोत्री मुखों वाली थीं और उसी के समान आकृति और भूषणों से संयुत थी। उसी के समान उनके करों में आयुध थे तथा उसी के तुल्य उनके अपने वाहन भी थे ।६। उनकी बहुत तीक्ष्ण दाढ़ें थी जिनसे वे वह्नि और धूम को निकाल रहीं थी जिससे सम्पूर्ण आकाश परिवृत हो गया था। तमाल वृक्ष के समान उनका श्यामल आकार था तथा कपिल और क्रूर नेत्रों वाली थीं ।७।