संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ततः श्रीदण्डनाथायाः श्वेतच्छत्रं सहस्रशः ।
स्फुरत्ककराः प्रचलिताः शक्तयः काश्चिदाददुः ॥३६
अत्यधिक विक्रम की शोभा वाली वह महा देवी अपने चारों करों में पाश-अंकुश-नेत्र और अश्व की वल्गा को लिये हुई थीं ।२६। तरुण सूर्य के समान जाज्वल्यमान चमकती हुई काञ्ची की तरङ्ग वाली वह अपने अश्व को नचाती हुई-सी अश्व पर समारूढ़ वह वहाँ से चली थी ।३०। इसके अनन्तर श्री दण्ड स्वामिनी की जो निर्माण के पटहकी ध्वनि हो रही थी वह परम उद्दण्ड सागर के घोष के ही समान थी जो कि सम्पूर्ण जगत् को बधिर कर रही थी ।३१। बहुत सी शक्तियाँ उसके आगे चल रही थीं जो कठोर वज्रोपम बाणों के द्वारा दशों दिशाओं का विहनन कर रही थीं । उनकी भुजाएं अतीव उद्धत अश्म के समान थीं और परम उच्छ्रित कोई अद्भुत शक्तियाँ थी ।३२। कुछ शक्तियाँ उस श्री दण्ड नाथा के सेना नासीर के साथ थीं । ये परम चण्ड शक्तियाँ खड्ग को और फलक को लेकर उछाल खा रही थीं ।३३। सैकड़ों ही नेत्रों के सन्ताड़नों से उस सेना की जो सम्बाधा थी उसका क्षेत्रिणी निवारण करती हुई शक्तियाँ ऊपर की ओर चल रही थीं ।३४। इसके पश्चात् ऐसी शक्तियाँ आगे चली थी जो तुङ्ग ध्वजाओं की श्रेणी और महिष के चिन्हों वाली थीं तथा मृगों के चिह्नों को और सिंह के अङ्गों को धारण करने वाली थीं ।३५। इसके पश्चात् कुछ ऐसी शक्तियाँ थी जो श्रीदण्ड नाथा के सहस्रों छत्रों को जो श्वेत थे धारण करके चल रहीं थीं जिन छत्रों से उनके कर कमल स्फुरित हो रहे थे ।३६।
॥ दण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ॥
दण्डनाथाविनिर्याणे संख्यातीतैः सितप्रभैः ।
छत्रैर्गगनमारेजे निःसंख्यशशिमण्डितम् ॥१
अन्योन्यसक्तैर्धवलच्छत्रै रंतर्घनीभवत् ।
तिमिरं नुनुदे भूयस्तत्काण्डमणिरोचिषा ॥२
वज्रप्रभाधग्धगच्छायापूरितदिङ्मुखाः ।
तालवृन्ताः शतविधाः क्रोडमुख्या बलेऽचलन् ॥३