संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसेना सहित विजय-यात्रा ] [ २२६
एवं बड़ा चञ्चल था। उस अश्व का कलेवर बहुत ही ऊंचा था और उसके मुख में लगाम शोभित हो रही थी ।२३। उस अश्व के दोनों ओर केशरों का मण्डल स्फुरित हो रहा था । उसकी पूँछ बहुत ही स्थूल थी जिसके दिक्षेप से पयोधर क्षिप्यमाण हो रहे थे ।२४। जंघाओं के भाग में समुन्नद्ध मणियों की धीमी किन किनाहट की ध्वनि से भासुर था । उसके खुरों के निष्ठुर कुह्नों से जो बहुत ही तेज थे वादन सा कर रहा था ।२५। मानों ऐसा प्रतीत हो रहा था कि विजय की समृद्धि के ही लिए यह महान् वाद्य बजाया जा रहा था बार-बार गति के क्रम से छोटा करता हुआ वह संदर्शित हो रहा था ।२६। चञ्चल पूँछ जो उसकी बार-बार ऊपर की ओर उठ रही थी वह ऐसी ही प्रतीत हो रही थी मानों दोनों ओर चमर ढुलाये जा रहे हों । वह अश्व मनोहर भाण्डों से युक्त था और घर्धरी के जाल से समलंकृत था ।२७। इनकी जो महाध्वनि हो रही थी उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वह सभी असुरों को हुँकार की तर्जना दे रही थी । यह महा देवी अश्व पर समारूढ़ होकर वहां से गमन कर रही थी ।२८।
चतुर्भिर्बाहुभिः पाशमंकुशं वेत्रमेव च ।
हयवल्गां च दधती बहुविक्रमशोभिनी ॥२६
तरुणादित्यसङ्काशा ज्वलत्काञ्चीतरंगिणी ।
सञ्चचाल हयारूढा नर्तयन्तीव वाजिनम् ॥३०
अथ श्रीदण्डनाथाया निर्याणपटहध्वनिः ।
उद्दंडसिन्धुनिस्वानश्चकार बधिरं जगत् ॥३१
वज्रबाणैः कठोरैश्च भिदंत्यः ककुभो दश ।
अत्युद्धतभुजाश्मानः शक्तयः काश्चिदुच्छ्रिताः ॥३२
काश्चिच्छ्रीदंडनाथायाः सेनानासीरसङ्गताः ।
खड्गं फलमादाय पुप्लुवुश्चंडशक्तयः ॥३३
अत्यंतसैन्यसम्बाधं वेत्रसंताडनैः शतैः ।
निवारयंत्यो वेत्रिण्यो व्युच्चलंति स्म शक्तयः ॥३४
अथ तुंगध्वजश्रेणीर्महिषांको मृगांकिकाम् ।
सिंहांकांश्चैव बिभ्राणाः शक्तयो व्यचलन्पुरा ॥३५