संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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थे । ये सब अश्व बड़े ही विनीत-अच्छी तरह से वहन करने वाले-वेगगति से समन्वित और स्थिर चित्तों वाले थे ।१८। वे अश्व सभी ऐसे थे जो अपने स्वामी के मन का भाव जानने वाले थे और महान् युद्ध में परम सहिष्णु रहने वाले थे । उनमें बहुत से अच्छे-अच्छे लक्षण विद्यमान थे तथा ये सभी क्रोध को जीत लेने वाले और परमाधिक परिश्रमी थे ।१६। पञ्च धाराओं में शिक्षित—विनीत और प्लवन से संयुत थे ।२०। ये फल शुक्ति की श्री से सम्पन्न तथा श्वेत शुक्ति से समन्वित थे । उनमें देव पद्म—देव मणि और देव स्वस्तिक ये सुन्दर लक्षण विद्यमान थे ।२१।
अथ स्वस्तिकशुक्तिञ्च गड्डुरं पुष्पगंडिकाम् । एतानि शुभलक्ष्मणि जयराज्यप्रदानि च । वहंतो बातजवना वाजिनस्तां समन्वयुः ॥२२ अपराजितनामानमतितेजस्विनं चलम् । अत्यंतोत्तुंगवष्माणं कविकाविलसन्मुखम् ॥२३ पार्श्वद्वयेऽपि पतितस्फुरत्केसरमंडलम् । स्थूलबालधिविक्षेपक्षिप्यमाणपयोधरम् ॥२४ जंघाकांडसमुन्नद्धमणिकिङ्किणिभासुरम् । वादयंतमिवोच्चण्डैः खुरनिष्ठुरकुट्टनैः ॥२५ भूमंडलमहावाद्यं विजयस्य समृद्धये । घोषमाणं प्रति मुहुः संदर्शितगतिक्रमम् ॥२६ आलोलचामरव्याजाद्वहंतं पक्षती इव । भांडैर्मनोहरैर्युक्तं घर्धरीजालामंडितम् ॥२७ एषां घोषस्य कपटाद्धु कुर्वंतीमिवासुरान् । अश्वारूढा महादेवी समारूढा हयं ययौ ॥२८
इसके उपरान्त उनमें स्वस्तिक शुक्ति—गड्डुर और पुष्प गणिका—ये परम शुभ चिह्न विद्यमान थे जो जय और राज्य के प्रदान कराने वाले थे । ऐसे अश्व गण थे जो वहन करने वाले—वायु के समान वेग वाले थे । ऐसे अश्व उस देवी के पीछे गमन करने वाले थे ।२२। वह देवी एक ऐसे अश्व समारूढ़ थी जो अत्यन्त तेजस्वी था और अपराजित उसका नाम था