भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सेना सहित विजय-यात्रा ] २७

(स्थूल) स्तनों में सुसंकट घन के समान कंटक वक्षः स्थल में स्थित शोभित हो रहा था ।११। उसके कर में धरी हुई कांपती हुई खड्गलता शोभायुक्त हो रही थी जो काल नाथ की परम भयंकर कुटिला भ्रुकुटी के ही समान थी ।१२। उत्पातों के बात की सम्पात वाली चलायमान पर्वतों के ही सदृश करोड़ों की संख्या वाले उत्तम कुञ्जर उस सम्पत्करी के पीछे अनुगमन करने वाले थे ।१३। इसके अनन्तर श्रीललिता देवी के श्रीपाशायुध से समुत्पन्न अतीव शीघ्र विक्रान्ति युक्त अश्व पर समारूढ़ आगे चल रही थी ।१४।

तया सह हयप्रायं सैन्यं हेषातरंगितम् ।
व्यचरत्खुरकुद्दालविदारितमहीतलम ॥१५॥
वनायुजाश्च कांबोजाः पारदाः सिंधुदेशजाः ।
टंकणाः पर्वतीयाश्च पारुसीकास्तथा परे ॥१६
अजानेया घट्टधरा दरदाः कालवंदिजाः ।
वाल्मीकयावनोद्भूता गान्धर्वाश्चाथ ये हयाः ॥१७
प्राग्देशजाताः कैराता प्रांतदेशोद्भवास्तथा ।
विनीताः साधुवोढारो वेगिनः स्थिरचेतसः ॥१८
स्वामिचित्तविशेषज्ञा महायुद्धसहिष्णवः ।
लक्षणैर्बहुभियुक्ता जितक्रोधा जितश्रमाः ॥१९
पञ्चधारासु शिक्षाढ्या विनीताश्च प्लवान्विता ॥२०
फलशुक्तिश्रिया युक्ताः श्वेतशुक्तिसमन्विताः ।
देवपद्मं देवमणि देवस्वस्तिकमेव च ॥२१

उस देवी के साथ ऐसी सेना थी जिसमें प्रायः अश्व थे जिनकी हिनहिनाहट से वह तरंगित थी । उन अश्वों के खुरों की टापों से सम्पूर्ण महीतल विदीर्ण हो रहा था । ऐसी सेना चली थी ।१५। उस सेना में विभिन्न प्रकार की जाति के अश्व विद्यमान थे । उनमें वनायुज-काम्बोज-पारद-सिन्धु देश में उत्पन्न होने वाले-टकण-पर्वतीय-पारसीक थे ।१६। अजानेय-घट्टधर-दरद-कालवन्दिज-वाल्मीक-यावनोद्भूत और गान्धर्व हय थे ।१७। उन अश्वों में कुछ प्राग्देशज थे कैरात तथा प्रान्त देशोद्भव