भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

हुआ जो मद्दर्द्लों का घोष था उसने उससे आकाश को भी पूरित कर दिया था ।२। मृदंग-मुरज-पटह-अनुकुलीगण-सेलुका-झल्लरी-रप्चा-हुडुका-हुण्डुक घटा-आनक-पणव-गोमुख-अर्ध चन्द्रिका-तममध्य मद्दर्दल-डिण्डिम-झर्झर-बरीत-इङ्ग्यातिंग्य भेदज-उद्धक-एउ हुण्ड-निःसाण-बर्बर-हुँकार-काकतुण्ड तथा ये सब वाद्य और अन्य वाद्यों को उस समर के आरम्भ में शक्ति की सेनाओं के द्वारा आहूत किया गया था और ये सभी बजाये गये थे ।३-६। परमेशानी ललिता के अंकुशास्त्र से समुद्गता सम्पत्करी नाम की देवी अपनी शक्तियों के साथ चलित हो गयी थी ।७।

अनेककोटिमातङ्गतुरंगरथपंक्तिभिः । सेविता तरुणादित्यपाटला संपदीश्वरी ॥८ मत्तमुद्दंडसंग्रामरसिकं शैलसन्निभम् । रणकोलाहलं नाम सारुरोह मतंगजम् ॥९ तामन्वगा ययौ सेना महती घोरराविणी । लोलाभिः केतुमालाभिरुल्लिखन्ती घनाघनात् ॥१० तस्याश्च संपन्नाथायाः पीनस्तनसुसंकटः । कंटको घनसंनाहो रुरुचे वक्षसि स्थितः ॥११ कंपमाना खड्गलता व्यरुचत्तत्करे धृता । कुटिला कालनाथस्य भ्रुकुटीव भयंकरा ॥१२ उत्पातवातसंपाताच्चलिता इव पर्वताः । तामन्वगा ययुः कोटिसंख्याकाः कुञ्जरोत्तमाः ॥१३ अथ श्रीललितादेव्या श्रीपाशायुधसंभवा । अतित्वरितविक्रान्तिरश्वारूढाचलत्पुरः ॥१४

अनेकों करोड़ गज—अश्व और रथों की पंक्तियों के द्वारा सेवित सम्पदीश्वरी तरुण सूर्य के समान पाटल थी ।८। शैल के सदृश मत्त सुदण्ड संग्राम में रसिक रण कोलाहल नामक एक गज पर वह समा रूढ़ हुई थी ।९। परम घोर राग वाली बड़ी भारी सेना उसके पीछे अनुगमन करने वाली थी और परम चञ्चल केतुओं की मालाओं से वह सेना घनों को उल्लिखित करती हुई जा रही थी ।१०। उस सम्पदा की स्वामिनी का पीन