संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसेना सहित विजय यात्रा ] [ ३३
षण्मासान्महतीं लक्ष्मीं प्राप्नुयाज्जापकोत्तमः ॥५६
उसकी श्री चञ्चल होते हुए भी अचल हो जाती है और उसको पद-पद पर श्रेय होता है। उसको भय तो किसी भी समय में होता ही नहीं है और बहुत तेजस्वी तथा वीर्य वाला हो जाता है।५७। उसको तीनों प्रकार के ताप नहीं रहा करते हैं। आध्यात्मिक-आधिभौतिक और आधिदैविक—ये तीन ताप होते हैं और वह पुरुष पुरुषार्थों से परिपूरित होता या करता है। तीनों समयों में (प्रातः-मध्याह्न-सायम्) जो नित्य ही इसका जाप किया करता है और सिंहासननेश्वरी का ध्यान करता है वह उत्तम जापक छै मास में ही महती लक्ष्मी को प्राप्त कर लेता है।५८-५६।
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सेना सहित विजय यात्रा
अथ सा जगतां माता ललिता परमेश्वरी ।
त्रैलोक्यकंटकं भंडं दैत्यं जेतुं विनिर्ययौ ॥१
चकार मर्दलाकारानंभोराशींस्तु सप्त ते ।
प्रभूतमद्दैलध्वानैः पूरयामासुरं बरम् ॥२
मृदंगमुरजाश्चैव पटहोऽन्तुकुलीगणाः ।
सेलुकाझल्लरीरांधाहुण्डकाहुण्डकाघटाः ॥३
आनकाः पणवाश्चैव गोमुखाश्चार्धचंद्रिकाः ।
यवमध्या मुष्टिमध्या मद्दैलांड्डिमा अपि ॥४
झर्झराश्च वरीताश्च इंग्यालिग्यप्रभेदजाः ।
उड्डं काश्चैतुहंडाश्च निःसाणा बर्बराः परे ॥५
हुंकारा काकतुण्डाश्च वाद्यभेदास्तथापरे ।
दध्वनुः शक्तिसेनाभिराहताः समरोद्यमे ॥६
ललितापरमेशान्या अंकुशास्त्रात्समुद्गता ।
संपत्करी नाम देवी चचाल सह शक्तिभिः ॥७
इसके अनन्तर वह जगतों की माता परमेश्वरी ललिता तीनों लोकों के कण्टक भण्ड दैत्य को जीतने के लिए वहाँ से विर्गत हुई थी ।१। बढ़ा