भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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[ २२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आविर्भावं महादेव्यास्तस्या राज्याभिषेचनम् ॥५४ यः प्रातरुत्थितो विद्वान्भक्तिश्रद्धासमन्वितः । जपेद्धनससमृद्धः स्यात्सुधासंमितवाग्भवेत् ॥५५ नाशुभं विद्यते तस्य परत्रेह च धीमतः । यशः प्राप्नोति विपुलं समानोत्तमतामपि ॥५६

ये समस्त देवगण चिरकाल से यहां पर ही निवास किये हुए हैं और ये आपकी सेवा में तत्पर हो रहे हैं । ये आपकी ही आज्ञा से अपने-अपने पुरों में जायेंगे ।५०। इनके सब पुर इस समय में शून्य और मङ्गल से रहित हो रहे हैं । ऐसी कृपा कीजिए कि ये सब समृद्ध अर्थों वाले हो जावे । इस रीति से जब नारद मुनि के द्वारा देवी को बताया गया था तो उस अखिलेश्वरी देवी ने देवों को अपने-अपने निवास स्थानों को भेज दिया था ।५१। फिर उस अम्बिका ने ब्रह्मा—श्री हरि-शम्भु-इन्द्र आदिक और दिक्पाल देवों का यथोचित पूजन करके विदा कर दिया था ।५२। फिर अपराध का त्याग करने के भी लिए सुरगण प्रेषित किए थे आदि पिता-माता-शिवा-शिव की अपने-अपने अंशों से सेवा भी करते थे ।५३। यह आख्यान आयु की वृद्धि करने वाला है—यह सभी प्रकार के मङ्गलों की कारण है—उस महादेवी का आविर्भाव का होना तथा उसके राज्यासन पर अभिषेचन का होना मङ्गल प्रद है ।५४। जो कोई पुरुष प्रातःकाल में उठकर भक्तिभाव से संयुत होकर विद्वान् श्रद्धालु बनकर इसका जाप किया करता है वह धन से समृद्ध हो जाता है और उसकी वाणी सुधा के सदृश ही परम मधुर हो जाया करती है ।५५। उस धीमान का इस लोक में और परलोक में कहीं पर भी कुछ भी अशुभ नहीं होता है । वह विपुल यश को प्राप्त किया करता है—उसका मान बढ़ता है तथा वह उत्तमता का लाभ किया करता है ।५६।

अचला श्रीर्भवेत्तस्य श्रेयश्चैव पदे पदे । कदाचिन्न भयं तस्य तेजस्वी वीर्यवान्भवेत् ॥५७ तापत्रयविहीनश्च पुरुषार्थैश्च पूर्यते । त्रिसंध्यं यो जपेन्नित्यं ध्यात्वा सिंहासनैश्वरीम् ॥५८