संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमृत मंथन वर्णन ] [ २२३
त्वयैकयैव जेतव्यो न शक्यस्त्वपरैः सुरैः ॥४६
इस प्रकार से सब पर स्नेह एवं प्यार करने वाली वह देवी थी और अन्यत्र ऐसा कहीं भी नहीं था। उस देवी ने समस्त जनों को निरन्तर अत्यधिक अनुराग से सन्तुष्ट कर रक्खा था ॥४३॥ इस महान भूलोक में वह राज्ञी राजा हों चाहे विद्वान होवें सकल की ईप्सा रखने वाले समस्त भूतल के निवासीजनों के अभीष्ट पदार्थों का दोहन किया करती थी ॥४४॥ तीनों लोकों के एक ही महीपाल अम्बिका के सहित काम शङ्का के होने पर दश सहस्र वर्ष एक ही क्षण के समान व्यतीत हो गये थे॥४५॥ इसके अनन्तर देवर्षि नारद जी भगवान किसी समय में वहां पर समागत हुए थे और उस परमा शक्ति को प्रणाम करके उन्होंने विनय से समन्वित होकर कहा था था॥४६॥ आपतो परब्रह्म-परधाम और पवित्र हैं । हे परमेश्वरि ! आप सद-असत् भावों के कलन के स्वरूप वाली हैं ।४७। इस जगत के अभ्युदय के ही लिए आप इस व्यक्तभाव को प्राप्त हुई हैं। आप इस लोक में असज्जनों के विनाश के लिए और सज्जनों के अभ्युदय करने वाली हैं। हे कल्याणि ! आपकी जो प्रवृत्ति है वह साधु पुरुषों के रक्षण के ही लिए हैं ॥४८॥ यह एक भण्डासुर है हे देवि ! यह तीनों लोकोंको बाधा दे रहा है। यह केवल आप ही के द्वारा जीता जा सकता है ऐसी एक ही आप हैं और दूसरे सुरों के द्वारा तो यह कभी भी जीता नहीं जा सकता है ॥४६॥
त्वत्सेवकपरा देवाश्चिरकालमिहोषिताः ।
त्वदाज्ञया गमिष्यंति स्वानि स्वानि पुराणि तु ॥५०
अमंगलानि शून्यानि समृद्धार्थांनि संतवतः ।
एवं विज्ञापिता देवी नारदेनाखिलेश्वरी ।
स्वस्ववासनिवासाय प्रेषयामास चामरान् ॥५१
ब्रह्माणं च हरिं शम्भुं वानवादीन्दिशां पतीन् ।
यथार्हं पूजयित्वा तु प्रेषयामास चांबिका ॥५२
अपराधं ततस्त्यक्तुमपि संप्रेषिताः सुराः ।
स्वस्वांशैः शिवयोः सेवामादिपित्रोरकुर्वत ॥५३
एतदाख्यानमायुष्यं सर्वमंगलकारणम् ।