संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दिवि भूम्यंतरिक्षेषु ससंबाधं वसन्ति ये ॥४१ ते सर्वे चाप्यसंबाधं निवसंति स्म तत्पुरे ॥४२
उसकी आज्ञा से उस पुर में आश्चर्य मेघ ने भी वर्षा की थी और उस वर्षा में बहुत अधिक मूल्यवान वस्तुयें तथा परम दिव्य आभरण बरसे थे ।३६। चिन्तामणि-कल्प वृक्ष-कमला और कामधेनु ये सब प्रति गृह में देवी के नगर में उसकी जय के लिए उपस्थित हो गये थे ।३७। सभी उसकी सेवा में ही तत्पर थे और उसकी सेवा का रस ही उनका सबका आकार था तथा अन्य क्रियाओं के गुणों का परित्याग कर दिया था । ये सभी समस्त कामों के अर्थ से संयुक्त थे तथा सर्व काल में प्रसन्न ही रहा करते थे ।३८। पितामह-श्रीहरि-महादेव-महेन्द्र—अन्य दिशाओं के स्वामी—सब देवगण-नारद आदि महर्षि—वसिष्ठ आदि तपस्वीगण-गन्धर्व—अप्सरायें—यक्ष और जो भी अन्य देवों की जातियां हैं जो भी दिव लोक भूमि और अन्तरिक्ष में बाधा-सहित निवास किया करते थे ।३६-४१। वे सभी उसके पुर में बिना ही किसी बाधा के निवास किया करते थे ।४२।
एवं सद्वत्सला देवी नान्यत्रैत्यखिलाञ्जनात् । तोषयामास सततमनुरागेण भूयसा ॥४३ राज्ञो महति भूर्लोके विदुषः सकलेप्सिताम् । राज्ञी दुदोहाभीष्टानि सर्वभूतलवासिनाम् ॥४४ त्रिलोकैकमहीपाले सांबिके कामशङ्करे । दशवर्षसहस्राणि ययुः क्षण इवापरः ॥४५ ततः कदाचिदागत्य नारदो भगवानृषिः । प्रणम्य परमां शक्तिं प्रोवाच विनयान्वितः ॥४६ परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमेश्वरि । सदसद्भावसंकल्पविकल्पकलनात्मिका ॥४७ जगदभ्युदयार्थाय व्यक्तभावमुपागता । असज्जनविनाशार्था सज्जनाभ्युदयार्थिनी । प्रवृत्तिस्तव कल्याणि साधूनां रक्षणाय हि ॥४८ अयं भण्डोऽसुरो देवि बाधते जगतां त्रयम् ।