संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैवाहिकोत्सव वर्णन ] [ २२१
मनोहरता विद्यमान थी ।२६। उस समय में वीणा--वेणु-मृदङ्ग प्रभृति अनेक प्रकार के तौर्य वादनों से ये सेव्यमान हो रहे थे। सब सुरगण भी इनकी सेवा में समुपस्थित थे ।३०। विहार की स्वामिनी अपने ओज से शोभित करती हुई वीथी में गयी थी। वहाँ पर बड़े-बड़े धनियों के हर्म्य बने हुए थे। प्रत्येक हर्म्यों की छत पर सहस्रों अप्सरायें बैठी थीं ।३१। वहाँ पर जो पुरन्ध्रियां थीं उनके हाथों में लाजा और अक्षत थे जिनकी वे वर्षा कर रही थीं। परम मंगल अर्थों वाली गाथायें करती हुई थीं तथा वीणा-वेणु आदि की ध्वनियों से परम तोष को प्राप्त होती हुई वीथियों से अन्य वीथियों में धीरे-धीरे समागत हो रही थी ।३२। अप्सरायें जो मार्ग में आरती का विधान कर रही थीं उसका प्रति ग्रहण करके उस देवी ने विमान से अवरोहण करके सदा सभा में प्रवेश किया था ।३३। फिर देव शम्भु के ही साथ सिंहासन पर समधिष्ठित हुई थीं। वहाँ पर स्थित महा-जन समुदाय ने जो भी इच्छा की थी और मन में ही कामना की थी उस सबका ज्ञान रखने वाली महादेवी ने अपनी दृष्टि के पात के ही द्वारा उन-उन सब कामनाओं को पूरा कर दिया था ।३४। लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने उस चरित को देखकर ही उस देवी का उस समय में कामाक्षी और कामेश्वरी यह नाम रख दिया था ।३५।
ववर्षाश्चर्यमेघोऽपि पुरे तस्मिस्तदाज्ञया ।
महार्हाणि च वस्तूनि दिव्यान्त्याभरणानि च ॥३६
चिन्तामणिः कल्पवृक्षः कमला कामधेनवः ।
प्रतिवेश्म ततस्तस्थुः पुरो देव्या जयाय ते ॥३७
तां सेवैकरसाकारां विमुक्तान्यक्रियागुणाः ।
सर्वकामार्थसंयुक्ता हृष्यंतः सार्वकालिकम् ॥३८
पितामहो हरिश्चैव महादेवश्च वासवः ।
अन्ये दिशामधीशास्तु सकला देवतागणाः ॥३६
देवर्षयो नारदाद्याः सनकाद्याश्च योगिनः ।
महर्षयश्च मन्वाद्या वशिष्ठाद्यास्तपोधनाः ॥४०
गन्धर्वाप्सरसो यक्षा याश्चान्या देवजातयः ।