संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराणे
कालीकटाक्षवत्तीक्ष्णो नृत्यद्भुजगभीषणः । उल्लसन्दक्षिणे पाणौ विललास शिलीमुखः ॥४६ गेयचकरथारूढां तां पश्चाच्च सिषेविरे । तद्वच्छ्यामलशोभाढ्या देव्यो बाणधनुर्धराः ॥५० सहस्राक्षौहिणीसंख्यास्तीव्रवेगा मदालसाः । आपूरयंत्य ककुभं कलैः किलिकिलारवैः ॥५१
इस प्रकार से प्रार्थना पूर्वक धनुर्वेद ने भक्ति भाव से प्रार्थना की थी और शिर टेककर प्रणाम किया था तथा चाप और तूणीर समर्पित किये थे । उनको प्रियक प्रिया ने सादर ग्रहण कर लिया था ।४३। उस शुकप्रिया ने उस महाचाप को ग्रहण कर जिसका नाम चित्रग्रीव था उसका विस्फार समुत्पन्न किया था और विपुल रूप उसकी मुर्वी का उद्वादन किया था ।४४। उस संगीत योगिनी ने चाप की ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को पूरित कर दिया था । वह देवों के मन और नयनों के आनन्द की सम्पदा थी ।४५। मन्त्रिणी और तन्त्रिणी—ये दो उसकी परिचारिकाएं थीं । वे शुक और वीणा का वहन करती हुई सहसा उसकी परिचर्या किया करती थीं ।४६। थोड़ा चञ्चल अर्थात् हिलने वाला जो वलय था उसके क्वणन से बढ़ने के स्वभाव वाला गुणों का निःस्वन था । वह घन के सदृश श्यामा उसको धारण करती हुई अति मनोहर ध्वनि कर रही थी ।४७। गीतयोगिनी चित्र जीव नामक शरासन से परम भूषित हो रही थी और कदम्ब छत्र कार्मुंक का कदम्बिनी की ही भांति शोभित हुई थी ।४८। काली के कटाक्ष के सदृश परम तीक्ष्ण नृत्य करता हुआ भुजंग भीषण दक्षिण कर में उल्लसित होता हुआ शिली-मुख विलास कर रहा था ।४६। गेय चक्र वाले रथ पर समारूढ़ उसका पीछे सेवा कर रहे थे । उसी के समान श्यामल और शोभा से समन्वित वाण और धनुष को धारण करने वाली देवियाँ थीं ।५०। ये तीव्र वेगवाली और महालसा थीं जिनकी संख्या एक सहस्र अक्षौहिणी थी । परम मधुर जो किल किल की ध्वनि थी उससे दिशा पूरित कर रहीं थीं ।५१।
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