संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ] [ २३७
इमौ चाक्षयबाणाढ्यौ तूणीरौ स्वर्णचित्रितौ । गृहाण दैत्यनाशाय ममानुग्रहहेतवे ॥४२
वह मन्त्रनाथा जहाँ-जहाँ पर अपने कटाक्ष को विकीर्ण किया करती है वहाँ पर शत्रु की सेना गताशंक होकर पूर्णतया पतन को प्राप्त हो जाया करती है।३६। परमेशानी ललिता की जितनी भी राज्य चर्चा होती है और उसकी शक्तियों की जो चर्चा है वह सर्वत्र विजय के प्रदान करने वाली होती है।३७। इसके अनन्तर संगीत योगिनी के कर में स्थित शुक पोत (शिशु) से सज्जित शरासन का वहन करता हुआ धनुर्वेद निकला था।३८। वह चार बाहुओं से संयुत था—तीन उसके शिर थे और उस वीर के तीन ही नेत्र थे। उसने प्रधानेशी को प्रणिपात करके यह उस भक्तिमान ने प्रार्थना की थी।३६। हे मन्त्रिनायिके ! हे देवि ! इस समय में आप भण्डासुरेन्द्र के साथ युद्ध करने के लिए प्रवृत्त हो रही हैं। अतएव मेरे द्वारा आपकी सहायता करनी चाहिए।४०। हे जगतों की जननि ! यह चित्र जीव नाम वाला को दण्ड बहुत ही अधिक महान् है। यह समस्त दानवों का निवहंण करने वाला है। इसको आप ग्रहण कीजिए।४१। ये दोनों तूणीर हैं जिनमें कभी भी वाणों का क्षय नहीं होता है और ये स्वर्ण से चित्रित हैं इनको भी आप केवल मुझ पर अनुग्रह करने के लिए ही ग्रहण कीजिए।४२।
इति प्रणम्य शिरसा धनुर्वेदेन भक्तितः । अर्पितांश्चापतूणीराञ्जग्राह प्रियकप्रिया ॥४३
चित्रजीवं महाचापमादाय च शुकप्रिया । विस्फारं जनयामास मौर्वीमुद्वाह्य भूरिशः ॥४४
संगीतयोगिनी चापध्वनिना पूरितं जगत् । नाकाल्यानां च मनोनयनानंदसंपदा ॥४५
यंत्रिणी तंत्रिणी चेति द्वे तस्याः परिचारिके । शुकं वीणां च सहसा वहन्त्यौ परिचेरतुः ॥४६
आलोलवलयक्वाणधिष्णुगुणनिस्वनम् । धारयंती घनश्यामा चकारातिमनोहरम् ॥४७
चित्रजीवशरासेन भूषिता गीतयोगिनी । कदंबिनीव रुरुचे कदम्बच्छत्रकार्मुका ॥४८