संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
दण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ] [ २३७
इमौ चाक्षयबाणाढ्यौ तूणीरौ स्वर्णचित्रितौ । गृहाण दैत्यनाशाय ममानुग्रहहेतवे ॥४२
वह मन्त्रनाथा जहाँ-जहाँ पर अपने कटाक्ष को विकीर्ण किया करती है वहाँ पर शत्रु की सेना गताशंक होकर पूर्णतया पतन को प्राप्त हो जाया करती है।३६। परमेशानी ललिता की जितनी भी राज्य चर्चा होती है और उसकी शक्तियों की जो चर्चा है वह सर्वत्र विजय के प्रदान करने वाली होती है।३७। इसके अनन्तर संगीत योगिनी के कर में स्थित शुक पोत (शिशु) से सज्जित शरासन का वहन करता हुआ धनुर्वेद निकला था।३८। वह चार बाहुओं से संयुत था—तीन उसके शिर थे और उस वीर के तीन ही नेत्र थे। उसने प्रधानेशी को प्रणिपात करके यह उस भक्तिमान ने प्रार्थना की थी।३६। हे मन्त्रिनायिके ! हे देवि ! इस समय में आप भण्डासुरेन्द्र के साथ युद्ध करने के लिए प्रवृत्त हो रही हैं। अतएव मेरे द्वारा आपकी सहायता करनी चाहिए।४०। हे जगतों की जननि ! यह चित्र जीव नाम वाला को दण्ड बहुत ही अधिक महान् है। यह समस्त दानवों का निवहंण करने वाला है। इसको आप ग्रहण कीजिए।४१। ये दोनों तूणीर हैं जिनमें कभी भी वाणों का क्षय नहीं होता है और ये स्वर्ण से चित्रित हैं इनको भी आप केवल मुझ पर अनुग्रह करने के लिए ही ग्रहण कीजिए।४२।
इति प्रणम्य शिरसा धनुर्वेदेन भक्तितः । अर्पितांश्चापतूणीराञ्जग्राह प्रियकप्रिया ॥४३
चित्रजीवं महाचापमादाय च शुकप्रिया । विस्फारं जनयामास मौर्वीमुद्वाह्य भूरिशः ॥४४
संगीतयोगिनी चापध्वनिना पूरितं जगत् । नाकाल्यानां च मनोनयनानंदसंपदा ॥४५
यंत्रिणी तंत्रिणी चेति द्वे तस्याः परिचारिके । शुकं वीणां च सहसा वहन्त्यौ परिचेरतुः ॥४६
आलोलवलयक्वाणधिष्णुगुणनिस्वनम् । धारयंती घनश्यामा चकारातिमनोहरम् ॥४७
चित्रजीवशरासेन भूषिता गीतयोगिनी । कदंबिनीव रुरुचे कदम्बच्छत्रकार्मुका ॥४८
२३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराणे
कालीकटाक्षवत्तीक्ष्णो नृत्यद्भुजगभीषणः । उल्लसन्दक्षिणे पाणौ विललास शिलीमुखः ॥४६ गेयचकरथारूढां तां पश्चाच्च सिषेविरे । तद्वच्छ्यामलशोभाढ्या देव्यो बाणधनुर्धराः ॥५० सहस्राक्षौहिणीसंख्यास्तीव्रवेगा मदालसाः । आपूरयंत्य ककुभं कलैः किलिकिलारवैः ॥५१
इस प्रकार से प्रार्थना पूर्वक धनुर्वेद ने भक्ति भाव से प्रार्थना की थी और शिर टेककर प्रणाम किया था तथा चाप और तूणीर समर्पित किये थे । उनको प्रियक प्रिया ने सादर ग्रहण कर लिया था ।४३। उस शुकप्रिया ने उस महाचाप को ग्रहण कर जिसका नाम चित्रग्रीव था उसका विस्फार समुत्पन्न किया था और विपुल रूप उसकी मुर्वी का उद्वादन किया था ।४४। उस संगीत योगिनी ने चाप की ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को पूरित कर दिया था । वह देवों के मन और नयनों के आनन्द की सम्पदा थी ।४५। मन्त्रिणी और तन्त्रिणी—ये दो उसकी परिचारिकाएं थीं । वे शुक और वीणा का वहन करती हुई सहसा उसकी परिचर्या किया करती थीं ।४६। थोड़ा चञ्चल अर्थात् हिलने वाला जो वलय था उसके क्वणन से बढ़ने के स्वभाव वाला गुणों का निःस्वन था । वह घन के सदृश श्यामा उसको धारण करती हुई अति मनोहर ध्वनि कर रही थी ।४७। गीतयोगिनी चित्र जीव नामक शरासन से परम भूषित हो रही थी और कदम्ब छत्र कार्मुंक का कदम्बिनी की ही भांति शोभित हुई थी ।४८। काली के कटाक्ष के सदृश परम तीक्ष्ण नृत्य करता हुआ भुजंग भीषण दक्षिण कर में उल्लसित होता हुआ शिली-मुख विलास कर रहा था ।४६। गेय चक्र वाले रथ पर समारूढ़ उसका पीछे सेवा कर रहे थे । उसी के समान श्यामल और शोभा से समन्वित वाण और धनुष को धारण करने वाली देवियाँ थीं ।५०। ये तीव्र वेगवाली और महालसा थीं जिनकी संख्या एक सहस्र अक्षौहिणी थी । परम मधुर जो किल किल की ध्वनि थी उससे दिशा पूरित कर रहीं थीं ।५१।
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ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा ] [ २३६
ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा
अथ राजनायिका श्रिता ज्वलितांकुशा फणिसमानपाशभृत् ।
कलनिक्कणद्वलयमैक्षवं धनुर्दधती प्रदीप्तकुसुमेषुपंचका ॥१
उदयत्सहस्रमहसा सहस्रतोऽप्यतिपाटलं निजवपुः प्रभाझरम्
किरती दिशासु वदनस्य कांतिभिः सृजतीव
चन्द्रमयमभ्रमंडलम् ॥२
दशयोजनायतिमती जगत्त्रयीमभिवृण्वता
विशदमौक्तिकात्मना ।
धवलातपत्रवलयेन भासुरा शशिमंडलस्य सखितामुपेयुषा ॥३
अभिवीजिता च मणिकांतशोभिना
विजयादिमुख्यपरिचारिकागणैः ।
नवचन्द्रिकालहरिकांतिकंदलीचतुरेण चामरचतुष्टयेन च ॥४
शक्तर्चकराज्यपदवीमभिसूचयन्ती साम्राज्य-
चिह्नशतमंडितसैन्यदेशा ।
संगीतवाद्यरचनाभिरथामरीणां संस्तूयमानविभवा
विशदप्रकाशा ॥५
वाचामगोचरमगोचरमेव बुद्धेरीदृक्तया न
कलनीयमनन्यतुल्यम् ॥६
त्रैलोक्यगर्भपरिपूरितशक्तिचक्रसाम्राज्यसं-
पदभिमानमभिस्पृशंती ।
आबद्धभक्तिविपुलांजलिशेखराणामारादहंप्रथमिका
कृतसेवनानाम् ॥७
इसके अनन्तर वह राज नायिका वहाँ पर विराजमान थी जिसका अंकुश ज्वलित था और जो सर्प के ही तुल्य पाश को धारण करने वाली थी। मधुर क्वणन करने वाला वलय और इक्षु का धनुष धारण किये हुए थी। उसके बाण पाँच कुसुमों के थे ।१। उदित सूर्य के तेज से भी अत्यधिक
२४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पाटल उसका अपना कलेवर था जिससे प्रभा झर रही थी। वह अपने मुख की कान्तियों को दिशाओं में कीर्ण कर रही थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो वह अभ्रमण्डल को चन्द्रों से परिपूर्ण बना रही हो। २। शशि मण्डल की सखिता को प्राप्त होने वाला उसका परम धवल आतपत्र था जिसका आयतन दशयोजन था और तीनों लोकों का अभिवरण करने वाला था। उसका स्वरूप परम स्वच्छ मौक्तिक के सदृश था। ऐसे धवल छत्र से वह परमाधिक भासुर हो रही थी। ३। विजया आदि प्रमुख परिचारिकाओं के समुदाय के द्वारा चार चमरों से वह अभिवीजित हो रही थी जो चमर मणि के समान कान्त और शोभा वाले थे तथा नवीन चन्द्रिका की लहरी की कान्ति एवं चार कवालियों की कान्ति के समान थे। ४। वह अपनी शक्ति से एक ही राज्य की पदवी को अभिसूचित कर रही थी और सैकड़ों साम्राज्य के चिन्हों से उसका सैन्य देश मण्डित था। देवांगनाओं के संगीत और वाद्य रचनाओं के द्वारा उसके वैभव का संस्तवन किया जा रहा था एवं वह परम विशद प्रकाश वाली थी। ५। उसका शक्ति वैभव वाणी के तो अगोचर था ही किन्तु वह बुद्धि के भी अगोचर था। वह ऐसी है—इस तरह कथन के योग्य तथा बुद्धि में बैठने के योग्य नहीं है और उसकी तुल्यता रखने वाला कोई भी नहीं है। ६। तीनों लोकों के मध्य में परिपूरित शक्ति चक्र और साम्राज्य की सम्पदा है उसके अभिमान का अभिसस्पर्शन करती हुई थी। पंक्तियों बद्ध तथा दोनों करों को विपुल भक्तिभाव में जोड़कर मस्तकों पर लगाने वाले देवगण समीप में प्रथम पहुँचाकर सेवा करूँ—ऐसी रीति से वह सेवमाना थी। ७।
ब्रह्मेशविष्णुवृषमुख्यसुरोत्तमानां वक्त्राणि वर्षितनुतीति कटाक्षयन्ती । उद्दीप्तपुष्पशरपंचकतः समुत्थैर्ज्योतिर्मयं त्रिभुवनं सहसा दधाना ॥८
विद्युत्समद्युतिभिरप्सरसां समूहैर्विक्षिप्य- माणजयमंगललाजवर्षा । कामेश्वरीप्रभृतिभिः कमनीयभाभिः संग्रामवेषरचनासुमनोहराभिः ॥९
ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा ] [ २४१
दीप्तायुधद्युतितिरस्कृतभास्कराभिर्नित्याभिरंघ्रिसविधे समुपास्यमाना । श्रीचक्रनामतिलकं दशयोजनातितुंगध्वजोल्लिखितमेघ- कदंबमुच्चैः ॥१० तीव्राभिरावणसुशक्तिपरंपराभिर्युक्तं रथं समरकर्मणि चालयंती । प्रोद्यत्पिशंगरुचिभागमलांशुकेन वीतामनोहररुचिस्समरे व्यभासीत् ॥११ पंचाधिकैर्विंशतिनामरत्नैः प्रपंचपापप्रशमातिदक्षैः । संस्तूयमाना ललिता महद्भिः संग्राममुद्दिश्य समुच्चचाल ॥१२ अगस्त्य उवाच- वाजिवक्त्र महाबुद्धे पंचविंशतिनामभिः । ललितापरमेशान्या देहि कर्णरसायनम् ॥१३ हयग्रीव उवाच- सिंहासना श्रीललिता महाराज्ञी परांकुशा । चापिनो त्रिपुरा चैव महात्रिपुरसुन्दरी ॥१४
ब्रह्मा—विष्णु और शम्भु जिनमें प्रमुख थे ऐसे देवों के मुखों को जो बराबर स्तुति कर रहे थे अपने कृपा कटाक्ष से देख रही थी । अतीव उदीप्त कुसुमों के पाँच शरों से समुत्थित प्रकाशों से सहसा ज्योतिर्मय त्रिभुवन को धारण करने वाली है ।८। विद्युल्लता के समान कान्तिमती अप्सराओं के समुदाय के द्वारा जय और मङ्गल के लिए लाजाओं की वर्षा जिसके ऊपर हो रही थी । कामेश्वरी आदि—परम कमनीय आभा वाली और संग्राम के वेषकी रचना में सुमनोहर—दीप्त आयुधों की दीप्ति से भास्कर की आभा को तिरस्कृत कर देने वाली ऐसी नित्या परिचारिकाओं के द्वारा चरणों के समीप में भली भाँति उपास्यमाना थी । श्रीचक्र नाम वाले रथ पर विराजमान होकर समर में उसको चला रही थी । वह रथ ऐसा था जिसकी ध्वजा दश योजन से भी अधिक ऊँची थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वह आकाश को उल्लिखित कर रहीं होवें जिसमें मेघों का समुदाय
२४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
था ।६-१०। वह रथ परम तीव्र रावण की सुशक्तियों की परम्पराओं से समन्वित था । वह रथ उस समर में परम शोभित हो रहा था जिसमें उदित पिशंग रुचि के भागसे युक्त वस्त्रसे वह संवीत था औरपरम मनोहर कान्ति वाला था ।११। ललितादेवी मरुद्गणों के द्वारा संस्तूयमान होती हुई संग्राम करने के उद्देश्य से तेजी से चली थी । मरुद्गण उसके पच्चीस नाम रत्नों को कहकर ही उसका संस्तवन कर रहे थे जो नाम प्रपञ्चों के पापों के प्रशमन करने में परम दक्ष थे ।१२। अगस्त्य जी ने कहा—हे वाजि वक्त्र ! आप तो महती बुद्धि वाले हैं । आप उन पच्चीस ललिता परमेशानी के नामों से हमारे कानों के लिये रसपान कराइए ।१३। हयग्रीवजी ने कहा—उनके पच्चीस नाम ये हैं—सिंहासना-महाराज्ञी—परंकुशा-चापिनो-त्रिपुरा-महात्रिपुर सुन्दरी ।१४।
सुन्दरी चक्रनाथा च साम्राज्ञी चक्रिणी तथा ।
चक्रेश्वरी महादेवी कामेशी परमेश्वरी ॥१५
कामराजप्रिया कामकोटिगा चक्रवर्तिनी ।
महाविद्या शिवानंगवल्लभा सर्वपाटला ॥१६
कुलनाथाम्नायनाथा सर्वाम्नायनिवासिनी ।
शृङ्गारनायिका चेति पञ्चविंशतिनामभिः ॥१७
स्तुवन्ति ये महाभागां ललितां परमेश्वरीम् ।
ते प्राप्नुवन्ति सौभाग्यमष्टौ सिद्धीर्महद्यशः ॥१८
इत्थं प्रचंडसंरंभं चालयंती महद्बलम् ।
भंडासुरं प्रति क्रुद्धा चचाल ललितांबिका ॥१९
सुन्दरी-चक्र नाथा-साम्राज्ञी-चक्रिणी-चक्रेश्वरी-महादेवी-कामेशी—परमेश्वरी ।१५। कामराज प्रिया--कामकोटिगा—चक्र वर्तिनी-महाविद्या-शिवा-अनंग वल्लभा-सर्वपाटला-।१६। कुलनाथा—आम्नाय नाथा-सर्वाम्नाय निवासिनी और शृंगार नायिका—ये ही पच्चीस नाम हैं ।१७। जो महाभाग पुरुष इन उपर्युक्त नामों से परमेश्वरी ललिता की स्तुति किया करते हैं वे परम सौभाग्य—आठों अणिमादिक सिद्धियाँ और महान् यश को प्राप्त किया करते हैं ।१८। इस प्रकार से परम प्रचण्ड के साथ अपनी महती सेना का सञ्चालन कर रही थी और भण्डासुर के प्रति अत्यधिक क्रुद्ध होकर वह ललिताम्बिका वहाँ से रवाना हुई थी ।१६।
चक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ] [ २४३
॥ चक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ॥
अगस्त्य उवाच- चक्रराजस्थैस्य याः पर्वेणि समाश्रिताः । देवता प्रकटाभिख्यास्तासामाख्यां निवेदय ॥१ संख्याश्च तासामखिला वर्णभेदांश्च शोभनान् । आयुधानि च दिव्यानि कथयस्व हयानन ॥२
हयग्रीव उवाच- नवमं पर्व दीप्तस्य रथस्य समुपस्थिताः । दश प्रोक्ता सिद्धिदेव्यस्तासां नामानि मच्छृणु ॥३ अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा । ईशिता वशिता चैव प्राप्तिः सिद्धिश्च सप्तमी ॥४ प्राकाम्यमुक्तिसिद्धिश्च सर्वकामाभिधापरा । एता देव्यश्चतुर्वाह्वचो जपाकुसुमसंनिभाः ॥५ चिंतामणिकपालं च त्रिशूलं सिद्धिकज्जलम् । दधाना दयया पूर्णा योगिभिश्च निषेविताः ॥६ तत्र पूर्वार्द्धभागे च ब्रह्माद्या अष्ट शक्तयः । ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डा चैव सप्तमी ॥७
श्री अगस्त्य जी ने कहा—जो देवता पर्व में चक्रराज रथेन्द्र के समाश्रित थे जिनका जो नाम प्रकट था उनका आख्यान कृपाकर बतलाइए ।१। हेहयानन ! उन सब देवों की संख्या और उनके परम शोभन वर्णों के भेद तथा उनके दिव्य आयुध यह सभी वर्णन कीजिए ।२। हयग्रीव जी ने कहा—उस दीप्त रथ के नवम पर्व में समुपस्थित ये दश सिद्धि देवियाँ कही गयी हैं । उनके नाम भी आप मुझसे श्रवण कीजिए ।३। अणिमा-लघिमा-गरिमा-ईशिता-वशिता-सातवीं प्राप्ति सिद्धि होती है । आठवी प्राकाम्य सिद्धि होती है जो सर्वकांता नाम वाली होती है । ये आठों देवियां चार-
२४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चार भुजाओं वाली हैं और इनका वर्ण जपा के कुसुम के तुल्य होता है ।४-५। ये चारों करों में चिन्तामणि-कपाल-त्रिशूल और सिद्धि कज्जल धारण किये रहा करती हैं । ये दया से परिपूर्ण होती हैं और योगिजनों के द्वारा सर्वदा सेवित रहा करती हैं ।६। वहाँ पर पूर्वार्ध भाग में ब्राह्मी आदि आठ शक्तियाँ हुआ करती है । उनके नाम ये हैं—ब्राह्मी—माहेश्वरी—कौमारी— वैष्णवी—वाराही—माहेन्द्री और सातवीं चामुण्डा है ।७।
महालक्ष्मीरष्टमी च द्विभुजाः शोणविग्रहाः । कपालमुत्पलं चैव बिभ्राणा रक्तवाससः ॥८ अथ वान्यप्रकारेण केचिद्ध्यानं प्रचक्षते । ब्रह्मादिसदृशाकारा ब्रह्मादिसदृशायुधाः ॥९ ब्रह्मादीनां परं चिह्नं धारयन्त्यः प्रकीर्तिताः । तासामूर्ध्वस्थानगतां मुद्रा देव्यो महत्तराः ॥१० मुद्राविरचनायुक्तैर्हस्तैः कमलकांतिभिः । दाडिमीपुष्पसङ्काशाः पीतांबरमनोहराः ॥११ चतुर्भुजा भुजद्वन्द्वधृतचर्मकृपाणकाः । मदरक्तविलोलाक्ष्यस्तासां नामानि मच्छृणु ॥१२ सर्वसंक्षोभिणी चैव सर्वविद्राविणी तथा । सर्वाकर्षणकृन्मुद्रा तथा सर्ववशङ्करी ॥१३ सर्वोन्मादनमुद्रा च यष्टिः सर्वमहाङ्कुशा । सर्वखेचरिका मुद्रा सर्वबीजा तथापरा ॥१४
महालक्ष्मी आठवीं शक्ति है । इन सबकी दो-दो भुजाएं होती हैं और इनके कलेवर का वर्ण शोण होता है । ये कपाल और उत्पल करों में लिये रहा करती हैं । इनके वस्त्र रक्त वर्ण के होते हैं ।८। अथवा अन्य प्रकार से कुछ लोग इनका ध्यान कहा करते हैं । ये सब ब्रह्मा आदि के सदृश ही आयुधों वाली होती हैं ।९। ये सब ब्रह्मादिक के ही परम चिह्नों को धारण करती हुई कीर्तित की गयी हैं । उनके ऊपर स्थान में रहने वाली मुद्रा देवियां इनसे भी अधिक महान् हैं ।१०। कमल के समान कान्ति वाले मुद्रा विरचना से युक्त हाथों से युक्त होती हैं। इनका वर्ण दाडिमी के पुष्पों
चक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ] [ २४५
के सदृश होता है और ये सब पीत अम्बर धारण करके परम मनोहर होती हैं ।११। इनकी चार-चार भुजाएँ होती हैं। ये दो-दो भुजाओं में चर्म (ढाल) और कृपाण धारण किये रहा करती हैं। मद से इनके लोचन चञ्चल और रक्त हुआ करते हैं। अब उनके भी नामों का श्रवण कीजिए ।१२। सर्वसंक्षोभिणी—सर्व विद्राविणी--सर्वाकर्षणकृन्मुद्रा—सर्ववशङ्करी—सर्वोन्मादन मुद्रा यष्टिसर्व महाङ्कुशा—सर्वखेचरिका मुद्रा—तथा अपरासर्व-बीजा है ।१३-१४।
सर्वयोनिश्च नवमी तथा सर्वत्रिखंडिका ।
सिद्धिब्राह्म्यादिमुद्रास्ता एताः प्रकटशक्तयः ॥१५॥
भंडासुरस्य संहारं कर्तुं रक्तरथे स्थिताः ।
या गुप्ताख्याः पूर्वमुक्तास्तासां नामानि मच्छृणु ॥१६
कामाकर्षणिका चैव बुद्ध्याकर्षणिका कला ।
अहङ्काराकर्षिणी च शब्दाकर्षणिका कला ॥१७
स्पर्शाकर्षणिका नित्या रूपाकर्षणिका कला ।
रसाकर्षणिका नित्या गन्धाकर्षणिका कला ॥१८
चित्ताकर्षणिका नित्या धैर्याकर्षणिका कला ।
स्मृत्याकर्षणिका नित्या नामाकर्षणिका कला ॥१६
बीजाकर्षणिका नित्या चात्माकर्षणिका कला ।
अमृताकर्षणी नित्या शरीराकर्षिणी कला ॥२०
एताः षोडश शीतांशुकलारूपाश्च शक्तयः ।
अष्टमं पर्वसम्प्राप्ता गुप्ता नाम्ना प्रकीर्तिताः ॥२१
और सर्वयोनि नवमी तथा सर्वत्रिखण्डिका है । सिद्धि ब्राह्मी आदि मुद्रा ये हैं—इतनी शकट शक्तियां हैं ।१५। भण्डासुर के संहार करने के लिये वह रक्त रथ में संस्थित हुई थी । जो गुप्ता नाम वाली पूर्व में कही थीं उनके भी नामों का श्रवण अब आप मुझसे कीजिए ।१६। कामकर्षणिका और बुद्ध्या—कर्षणिका कला—अहङ्कारा कर्षिणका—शब्दाकर्षणिका कला है ।१७। स्पर्शा कर्षिणका नित्या—रूपा कर्षिणका कला । रसा कर्षिणका नित्या नित्या—गन्धाकर्षणिका कला--।१८। चित्ताकर्षणिका नित्या—धैर्या-
२४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कर्षणिका कला-स्मृत्याकर्षणिका नित्यानामाकर्षणिका कला ।१६। बीजा- कर्षणिका नित्या-आत्माकर्षणिका कला-अमृतकर्षिणी नित्या-शरीराकर्षिणी कला ।२०। ये षोडश रूप वाली शीतांशु कलारूपा शक्तियाँ हैं। अष्टम पर्व को सम्प्राप्त ये गुप्ता नामों से कीर्त्तित की गयी है ।२१।
विद्रुमद्रुमसदृशा मन्दस्मित मनोहराः ।
चतुर्भुजास्त्रिनेत्राश्च चन्द्रार्कमुकुटोज्ज्वलाः ॥२२
चापबाणौ चर्मखड्गौ दधाना दिव्यकान्तयः ।
भण्डासुरवधार्थाय प्रवृत्ताः कुम्भसम्भव ॥२३
सायंतनज्वलद्दीपप्रख्यचक्ररथस्य तु ।
सप्तमे पर्वणि कृतावासा गुप्ततराभिधाः ॥२४
अनङ्गमदनानङ्गमदनातुरया सह ।
अनङ्गलेखा चानङ्गवेगानङ्गांकुशापि च ॥२५
अनंगमालिंग्यपरा एता देव्यो जपात्विषः ।
इक्षुचापं पुष्पशरान्पुष्पकन्दुकमुत्पलम् ॥२६
बिभ्रत्योऽदभ्रविक्रान्तिशालिन्यो ललिताज्ञया ।
भण्डासुरमभिक्रुद्धाः प्रज्वलंत्य इव स्थिताः ॥२७
अथ चक्ररथेंद्रस्य षष्ठं पर्वसमाश्रिताः ।
सर्वसंक्षोभिणीमुख्याः सम्प्रदायाख्यया युताः ॥२८
हे कुम्भ सम्भव ! जो भण्डासुर के वध के लिए प्रवृत्त हुईं वे विद्रुम के द्रुम के सदृश हैं तथा मन्दस्मित से मनोहर हैं। इनकी चार भुजाएं हैं और तीन नेत्र हैं एवं चन्द्र और सूर्य इनके उज्ज्वल मुकुट हैं। चाप-वाण-चर्म और खड्ग को धारण करने वाली तथा दिव्यकान्ति से सुसम्पन्न हैं ।२२-२३। सायन्तन के जलते हुए दीप के समान चक्र रथ के सप्तम पर्व में आवास करने वाली गुप्ततरा नाम वाली हैं ।२४। अनङ्गमदनातुरा के साथ अनङ्गमदना-अनङ्ग लेखा-अनङ्ग वेगा-अनङ्गाकुंशा-अनङ्ग का आलिङ्गन में परायणा-ये देवियाँ जपा के कुसुम की कान्ति वाली हैं। ये इक्षु चाप, पुष्प वाण, पुष्पों का कन्दुक और उत्पल धारण करती हुईं-अभ्र की विक्रान्ति वाली हैं और ललिता की आज्ञा से भण्डासुर के प्रति
चक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ] [ २४७
अत्यन्त क्रोध से प्रज्वलित होती हुई' सी स्थित हैं ।२५-२७। इसके अनन्तर चक्र रथेन्द्र के षष्ठ पर्व पर समाश्रित हैं। सर्व संक्षोभिणो मुख्य हैं और सम्प्रदाय की आख्या से युत हैं ।२८।
वेणीकृतकचस्तोमाः सिंदूरतिलकोज्ज्वलाः । अतितीव्रस्वभावाश्च कालानलसमत्विषः ॥२६ वह्निबाणं वह्निचापं वह्निरूपमसिं तथा । वह्निचक्राख्यफलकं दधाना दीप्तविग्रहाः ॥३० असुरेन्द्रं प्रति क्रुद्धाः कामभस्मसमुद्भवाः । आज्ञाशक्तय एवैता ललिताया महौजसः ॥३१ सर्वसंक्षोभिणी चैव सर्वविद्राविणी तथा । सर्वाकर्षणिका शक्तिः सर्वाह्लादिनिका तथा ॥३२ सर्वसंमोहिनी शक्तिः सर्वस्तम्भनशक्तिका । सर्वजृम्भणशक्तिश्च सर्वोन्मादनशक्तिका ॥३३ सर्वार्थसाधिका शक्तिः सर्वसम्पत्तिपूरणी । सर्वमन्त्रमयी शक्तिः सर्वद्वंद्वक्षयङ्करी ॥३४ एवं तु सम्प्रदायानां नामानि कथितानि वै । अथ पञ्चमपर्वस्थाः कुलोत्तीर्णा इति स्मृताः ॥३५
वेणीकृत हैं कचों के स्तोम जिनके ऐसी—सिन्दूर के तिलक से समु- ज्ज्वल—अतीव तीव्र स्वभाव से युक्त—कमल और अनल के समान कान्ति वाली हैं ।२६। इनके कलेवर परम दीप्त हैं तथा वह्निवाण—वह्निचाप— वह्निरूप असि और वह्नि चक्रारूख्य फलक को धारण करने वाली हैं ।३०। असुरेन्द्र के प्रति क्रोध से युक्त और कामदेव की भस्म से समुत्पन्न ये सब महान् ओज वाली ललिता देवी की आज्ञा शक्तियां हैं ।३१। सर्व संक्षोभिणी सर्वविद्राविणी—सर्वाकर्षणिका शक्ति—सर्वा ह्लादिनिका—सर्व संमोहिनी शक्ति—सर्व स्तम्भन शक्ति—सर्व जृम्भण शक्ति—सर्वोन्मादन शक्ति— सर्वार्थसाधिका शक्ति—सर्व सम्पत्ति पूरणी—सर्व मन्त्रमयी शक्ति—सर्वद्वन्द्व क्षयंकरी—इस प्रकार से सम्प्रदाय के ये नाम कह दिये गये हैं ये पञ्चम पर्व में स्थित हैं और कुलोत्तीर्णा कही गयी हैं ।३२-३५।
२४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ताश्च स्फटिकसङ्काशाः परशुं पाशमेव च । गदां घण्टां मणिं चैव दधाना दीप्तिविग्रहाः ॥३६ देवद्विषामति क्रुद्धा भ्रुकुटीकुटिलाननाः । एतासामपि नामानि समाकर्णय कुम्भज ॥३७ सर्वसिद्धिप्रदा देवी सर्वसम्पत्प्रदा तथा । सर्वप्रियंकरी देवी सर्वमंगलकारिणी ॥३८ सर्वकामप्रदा देवी सर्वदुःखविमोचिनी ॥३९ सर्वमृत्युप्रशमिनी सर्वविघ्ननिवारिणी । सर्वांगसुन्दरी देवी सर्वसौभाग्यदायिनी ॥४० दशैताः कथिता देव्यो दयया पूरिताशयाः । चक्रे तुरीयपर्वस्था मुक्ताहारसमत्विषः ॥४१ निगर्भयोगिनी नाम्ना प्रथिता दश कीर्तिताः । सर्वज्ञा सर्वशक्तिश्च सर्वैश्वर्यप्रदा तथा ॥४२ सर्वज्ञानमयी देवी सर्वव्याधिविनाशिनी । सर्वाधारस्वरूपा च सर्वपापहरा तथा ॥४३
और इसके अनन्तर स्फटिक मणि के सदृश हैं और परशु-पाश—गदा-घण्टा और मणि को धारण करने वाली हैं और परम दीप्त विग्रह वाली हैं ।३६। वे सब देवों के शत्रु के प्रति अत्यन्त क्रुद्ध थीं और उनके मुख तथा भृकुटियां कुटिल हैं। हे कुम्भज ! अब उनके भी नामों का श्रवण कीजिए ।३७। सर्व सिद्धि प्रदा देवी—सर्व सम्पद प्रदा—।३७-३६। सर्व प्रियङ्करी देवी—सर्व मङ्गल कारिणी। सर्वकामप्रदा देवी—सर्व दुःख विमोचिनी—सर्व मृत्यु प्रशमनी—सर्व विघ्न निवारिणी—सर्वांग सुन्दरी देवी—सर्व सौभाग्य दायिनी है ।४०। ये दश देवियाँ बतलायी गयी हैं जिनके आशय दया से पूरित हैं। ये चक्र में चतुर्थ पर्व में संस्थित हैं और मुक्ताओं के हार के समान कान्तिमती हैं ।४१। ये दश निगर्भ योगिनी के नाम से प्रसिद्ध कही गयी हैं । सर्वज्ञा-सर्वशक्ति-सर्वैश्वर्य प्रदा हैं ।४२।
चक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ] [ २४६
सर्वानन्दमयी देवी सर्वरक्षास्वरूपिणी ।
दशमी देवता ज्ञेया सर्वेप्सितफलप्रदा ॥४४
एताश्चतुर्भुजा ज्ञेया वज्रं शक्तिं च तोमरम् ।
चक्रं चैवाभिविभ्राणा भण्डासुरवधोद्यताः ॥४५
अथ चक्ररथेन्द्रस्य तृतीयं पर्वसंश्रिताः ।
रहस्ययोगिनी नाम्ना प्रख्याता वागधीश्वराः ॥४६
रक्ताशोकप्रसूनाभा वाणकार्मुकपाणयः ।
कवचच्छन्नसर्वांग्यो वीणापुस्तकशोभिताः ॥४७
वशिनी चैव कामेशी भोगिनी विमला तथा ।
अरुणा च जविन्याख्या सर्वेशी कौलिनी तथा ॥४८
अष्टावेताः स्मृता देव्यो दैत्यसंहारहेतवः ।
अथ चक्ररथेन्द्रस्य द्वितीयं पर्वसंश्रिताः ॥४६
सर्वज्ञान से परिपूर्ण देवी—सर्व व्याधि विनाशिनी—सर्वाधार स्व-रूपा—सर्व पाप हरा है ।४३। सर्वानन्दमयी देवी—सर्व रक्षा स्वरूपिणी—और इनमें जो दशमी देवी है वह सर्वेप्सित फल प्रदा जानने के योग्य हैं ।४४। इनकी चार-चार भुजाएँ हैं ये वज्र—शक्ति—तोमर और चक्र को धारण करने वाली हैं तथा ये सभी उसी भण्डासुर के वध करने के लिए समुद्यत हैं ।४५। ये सब चक्र रथेन्द्र के तीसरे पर्व में संश्रय करने वाली हैं। ये वागधीश्वरा रहस्य योगिनी के नाम से प्रख्यात हैं ।४६। इनकी आभा रक्ताशोक के प्रसून के तुल्य है और इनके करों में धनुष बाण रहा करते हैं। इनके सम्पूर्ण अंग कवचों से संच्छन्न रहते हैं तथा ये वीणा और प्रस्तकों के धारण करने वाली है ।४७। वशिनी—कामेशी—भोगिनी—विमला—अरुणा—जाविनी—सर्वेशी—कौलिनी—ये आठ देवियां असुर के संहार की हेतु कही गयी हैं और चक्ररथेन्द्र के द्वितीय पर्व में समाश्रित हैं ।४८-४६।
चापबाणौ पानपात्रं मातुलुंगं कृपाणिकाम् ।
तिस्रस्त्रिपीठनलिया अष्टबाहुसमन्विताः ॥५०
पलकं नागपाशं च घंटां चैव महाध्वनिम् ।
बिभ्राणा मदिरामत्ता अतिगुप्तरहस्यकाः ॥५१
२५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कामेशी चैव वज्रेशी भगमाक्षिन्यथापरा । तिस्र एताः स्मृता देव्यो भण्डे कोपसमन्विताः ॥५२ ललितासममाहात्म्या ललितासमतेजसः । एतास्तु नित्यं श्रीदेव्या अन्तरङ्गाः प्रकीर्त्तिताः ॥५३ अथानन्दमहापीठे रथमध्यमपर्वणि । परितो रचितावासाः प्रोक्ताः पञ्चदशाक्षराः ॥५४ तिथिनित्याः कालरूपा विश्वं व्याप्यैव संस्थिताः । भण्डासुरादिदैत्येषु प्रक्षुब्धभ्रुकुटीतटा ॥५५ देवीसमनिजाकारा देवीसमनिजायुधाः । जगतामुपकाराय वर्तमाना युगेयुगे ॥५६
ये चाप—बाण—पान पात्र—मातुलुंग और कृपाणिका धारण करने वाली हैं। ये तीन हैं और तीन पीठों पर इनका निलय है एवं आठ बाहुओं से संयुक्त हैं ।५०। पलक-नागपाश महाध्वनि घण्टा को धारण करने वाली हैं। ये मदिरा के पान से मत्त रहा करती है तथा अति गुप्त रहस्य वाली हैं ।५१। कामेशी-वज्रेशी-भगमालिनी—ये तीन देवियाँ कही गयी हैं जो भण्डासुर दैत्य पर अत्यधिक क्रोध से समन्वित थीं।५२। इनका माहात्म्य भी ललिता देवी के ही समान था तथा ललिता देवी के ही समान ही इनका ओज महान् था । ये देवियाँ नित्य ही श्री देवी की अन्तरंग बतायी गयी हैं ।५३। इसके अनन्तर रथ के मध्य के पर्व पर आनन्द महापीठ पर सब ओर रचित आवास वाली पञ्चदशाक्षरा कही गयी हैं ।५४। ये तिथि नित्या-कालरूपा और विश्वको व्याप्त करके ही संस्थित रहा करती हैं। भण्डासुर आदि जो भी दैत्य हैं इनको उन पर प्रक्षुब्ध भुकुटियाँ रहा करती हैं ।५५। ये सभी देवी के ही तुल्य आकार वाली हैं और श्रीदेवी के ही समान अपने आयुधों वाली हैं। ये प्रत्येक युग में जन समूहों के उपकार के ही लिए वर्त्तमान रहा करती हैं ॥५६॥
तासां नामानि मत्तस्त्वमवधारय कुम्भज । कामेशी भगमाला च नित्यक्लिन्ना तथैव च ॥५७ भेरूण्डा वह्निवासिन्यो महावज्रेश्वरी तथा ।
चक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ] । २५१
द्रुती च त्वरिता देवी नवमी कुलसुन्दरी ॥५८
नित्या नीलपताका च विजया सर्वमंगला ।
ज्वालामालिनिकाचित्रे दश पंच च कीर्तिताः ॥५९
एताभिः सहिता देवी सदा सेवकबुद्धिभिः ।
दुष्टं भंडासुरं जेतुं निर्ययौ परमेश्वरी ॥६०
मन्त्रिनाथा महाचक्रे गीति चक्रे रथोत्तमे ।
सप्तपर्वाणि चोक्तानि तत्र देव्याश्च ताः शृणु ॥६१
गेयचक्ररथे पर्वमध्यपीठनिकेतना ।
संगीतयोगिनी प्रोक्ता श्रीदेव्या अतिवल्लभा ॥६२
तदेव प्रथमं पर्व मन्त्रिण्यास्तु निवासभूः ।
अथ द्वितीयपर्वस्था गेयचक्रे रथोत्तमे ॥६३
हे कुम्भज ! अब उनके शुभ नाम भी मुझ से आप अवधारित कर लीजिए । कामेशी-भगमाला-नित्य क्लिन्ना ।५७। भेरुण्डा-वह्निनवासिनी-महावज्रेश्वरी-द्रुती-त्वरिता-देवी नवमी कुल सुन्दरी है ।५८। नित्या-नीलपताका-विजया-सर्वमंगला-ज्वालामालिका-चित्रा-ये पन्द्रह कही गयी हैं ।५९। ये सदा ही सेवा की ही बुद्धिवाली रहती है और इनको ही साथ में रखकर वह परमेश्वरी भण्डासुर पर विजय प्राप्त करने के लिए वहाँ से निर्गत हुई थी ।६०। महाचक्र में मन्त्रि नाथा और रथोत्तम चक्र में गीति थी । ये वहाँ पर सात पर्व हैं जो आपको बतला दिए गए हैं। वहाँ पर जो श्री देवी की हैं उनका भी श्रवण करिए ।६१। गेय चक्र रथ में पर्व के मध्य में पीठ और निकेतन वाली संगीत योगिनी कही गयी है जो श्री देवी की अत्यधिक वल्लभा (प्रिया) है ।६२। वह ही प्रथम पर्व है जो मन्त्रिणी की निवास की भूमि है । इसके उपरान्त गेयचक्र रथोत्तम में द्वितीय पर्व में स्थित ये हैं-।६३।
रतिः प्रीतिर्मनोजा च वीणाकार्मुकपाणयः ।
तमालश्यामलाकारा दानवोन्मूलनक्षमाः ॥६४
तृतीयपर्वसंरूढा मनोभूवाणदेवता ।
द्राविणी शोषिणी चैव बंधिनी मोहिनी तथा ॥६५
२५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उन्मादिनीति पंचेता दीप्तकार्मुकपाणयः । तत्र पर्वण्यधस्तात्तु वर्तमाना महौजसः ॥६६ कामराजश्च कंदर्पो मन्मथो मकरध्वजः । मनोभवः पंचमः स्यादेते त्रैलोक्यमोहनाः ॥६७ कस्तूरीतिलकोल्लासिभालामुक्ताविराजिताः । कवचच्छन्नसर्वाङ्गाः पलाशप्रसवत्विषः ॥६८ पंचकामा इमे प्रोक्ता भंडासुरवधार्थिनः । जेयचक्ररथेंद्रस्य चतुर्थं पर्वसंश्रिताः ॥६९ ब्राह्मीमुख्यास्तु पूर्वोक्ताश्चंडिका त्वष्टमी परा । तत्र पर्वण्यधस्ताच्च लक्ष्मीश्चैव सरस्वती ॥७०
रति-प्रीति-मनोज्ञा हैं जिनके करों में वीणा और कार्मुक हैं। इनका वर्ण तमाल के तुल्य श्यामल है और ये दानवों के उन्मूलन करने में परम समर्थ हैं ।६४। तीसरे पर्व में संरूढ़ मनोभूबाण देवता हैं। द्राविणी-शोषणी-बंधिनी-मोहिनी हैं ।६५। उन्मादिनी ये पाँच हैं जिनके करों में दीप्त कार्मुक हैं। वहाँ पर पर्व में नीचे की ओर महान् ओज वाले वर्त्तमान हैं ।६६। कामराज-कन्दर्प-मन्मथ-मकरध्वज और मनोभव—ये पाँच हैं जो त्रैलोक्य के मोहन करने वाले हैं ।६७। ये कस्तूरी के तिलक से उल्लसित भाल वाले तथा मुक्ताओं के तुल्य शोभित हैं। इनके सभी अंग कवचों से ढके हुए हैं और ये पलाश के पुष्पों के समान कान्ति वाले हैं ।६८। ये पाँच काम बताये गये हैं जो भण्डासुर के वध के लिए ही हैं। जय चक्र रथेन्द्र के चतुर्थ पर्व में संश्रय वाले हैं ।६९। ब्राह्मी जिनमें प्रमुख है पूर्व में वर्णित चन्डिका अष्टमी परा हैं। वहाँ पर पर्व में नीचे लक्ष्मी और सरस्वती हैं ।७०।
रतिः प्रीतिः कीर्तिशांती पुष्टिस्तुष्टिश्च शक्तयः । एताश्च क्रोधरक्ताक्ष्यो दैत्यं हंतुं महाबलम् ॥७१ कुन्तचक्रधराः प्रोक्ताः कुमार्यः कुम्भसंभव । पंचमं पर्व संप्राप्ता वामाद्याः षोडशापराः ॥७२ गीति चक्ररथेंद्रस्य तासां नामानि मच्छृणु ।
चक्रू रथ पर्वस्थ देवना नाम प्रकाशन ] [ २५३
वामा ज्येष्ठा च रौद्री च शांतिः श्रद्धा सरस्वती ॥७३ श्री भूशक्तिश्च लक्ष्मीश्च सृष्टिश्चैव तु मोहिनी । तथा प्रमाथिनी चाश्वासिनी वीचिस्तथैव च ॥७४ विद्युन्मालिन्यथ सुरानन्दाथो नागबुद्धिका । एतास्तु कुरविंदाभा जगत्क्षोभणलंपटाः ॥७५ महासरससन्नाहमादधानाः पदे पदे । वज्रकंटकसंछन्ना अट्टहासोज्ज्वलाः परे । वज्रदंडौ शतघ्नीं च संबिभ्राणा भुशुण्डिकाः ॥७६ अथ गीतिरथेन्द्रस्य षष्ठं पर्वं समाश्रिताः । असितांगप्रभृतयो भैरवाः शस्त्रभीषणाः ॥७७
रति-प्रीति-कीर्त्ति-शान्ति-पुष्टि-तुष्टि—ये शक्ति रक्त नेत्रों वाली हैं हैं ।७१। हे कुम्भ सम्भव ! ये कुमारियाँ कुन्त चक्रधर कही गयी हैं। पाँचवें पर्व में वामा आदिक दूसरी सोलह सम्प्राप्त हैं ।७२। गीति चक्र रथेन्द्र की हैं। उनके भी नामों का श्रवण कीजिए जिनको मैं बता रहा हूँ। वामा-ज्येष्ठा-रौद्री-शान्ति-श्रद्धा-सरस्वती-श्री-भूशक्ति-लक्ष्मी-सृष्टि-मोहिनी-प्रमाथिनी-अश्वासिनी-वीचि-विद्युन्मालिनी-सुरानन्दा-नाग बुद्धिका—ये सब कुरविन्दकी आभा वाली हैं और सम्पूर्ण जगत् के क्षोभण करने में संलग्न हैं ।७३-७५। ये पद-पद में महा सरसमन्नाह को धारण करने वाली हैं। ये वज्र कंकट से संच्छन्न हैं और अट्टहास करने से उज्ज्वल हैं। ये वज्र-दण्ड-शतघ्नी और भुशुन्डिकाओं को धारण करने वाली हैं ।७६। इसके पश्चात् गीतिरथेन्द्र के षष्ठ पर्व में समाश्रित है। असितांग प्रभृति शस्त्रों से महान भीषण भैरव हैं ।७७।
त्रिशिखं पानपात्रं च बिभ्राणा नीलवर्चसः । असितांगो रुरुश्चंडः क्रोध उन्मत्तभैरवः ॥७८ कपालीभीषणश्चैव संहारश्चाष्ट भैरवाः । अथ गीतिरथेंद्रस्य सप्तमं पर्व संश्रिताः ॥७९ मातंगी सिद्धलक्ष्मीश्च महामातंगिकापि च ।
२५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
महती सिद्धलक्ष्मीश्च शोणा बाणधनुर्धराः ॥८० तस्यैव पर्वणोऽधस्ताद्गणपः क्षेत्रपस्तथा । दुर्गा वा बटुकश्चैव सर्वे ते शस्त्रपाणयः ॥८१ तत्रैव पर्वणोऽधस्ताल्लक्ष्मीश्चैव सरस्वती । शंखः पद्मो निधिश्चैव ते सर्वे शस्त्रपाणयः ॥८२ लोकद्विषं प्रति क्रुद्धा भंडं चंडपराक्रमम् । शक्रादयश्च विष्ण्वंतां दश दिक् चक्र नायकाः ॥८३ शक्तिरूपास्तत्र पर्वण्यधस्तात्कृतसंश्रयाः । वज्रं शक्ति कालदंडमसि पाशं ध्वज तथा ॥८४
त्रिशिख-पानपात्र को धारण करने वाले तथा नील वर्चस है । असिताङ्ग-रुरु-चण्ड-क्रोध-उन्मत्त भैरव-कपाली-भीषण और संहार-ये आठ भैरव हैं और गीति रथेन्द्र के सप्तम पर्व में संशय वाले हैं ।७८-७६। मातंगी सिद्ध लक्ष्मी-महामातंगिका-महती-सिद्ध लक्ष्मी-भूषोणा-बाणधनुर्धरा-है ।८०। उसी पर्व के नीचे गणप तथा क्षेत्रप हैं—दुर्गा अम्बा और वटुक हैं । ये सब करों में शस्त्र धारण करने वाले हैं ।८१। वहाँ पर ही पर्व के नीचे लक्ष्मी और सरस्वती हैं । शंख-पद्म-निधि हैं । ये सब प्राणियों में शस्त्र वाले हैं ।८२। ये सब लोकों के शत्रु चण्ड पराक्रम वाले भण्ड के प्रति क्रुद्ध हैं । शक्र से आदि लेकर विष्णु भगवान् के अन्त पर्यन्त दश दिशाओं के चक्रनायक हैं ।८३। वहाँ पर्व के नीचे शक्ति रूप वाले संश्रय लेने वाले हैं । ये वज्र-शक्ति-कालदंड-असि-पाशध्वज के धारण करने वाले हैं ।८४।
गदां त्रिशूलं दंभास्त्रं वज्रं च दधतस्त्वमी । सेवंते मंत्रिनाथां तां नित्यं भक्तिसमन्विताः ॥८५ भंडासुराङ्गदुर्गाढान्निहंतुं विश्वकंटकान् । मन्त्रिनाथाश्रयद्वारा ललिताज्ञापनोत्सुकाः ॥८६ गीतिचक्ररथोपांते दिक्पालाः संश्रयं ददुः । सर्वेषां चैव देवानां मन्त्रिणी द्वारतः कृतः ॥८७ विज्ञापना महादेव्याः कार्यसिद्धि प्रयच्छति ।
चक्ररथ वर्णंस्व देवता नाम प्रकाशन ] [ २५५
राज्ञो विज्ञापना चेति प्रधानद्वारतः कृता ।।८८
यथा खलु फलप्राप्तिः सेवाकानां हि जायते ।
अन्यथा कथमेतेषां सामर्थ्यं ज्वलितौजसः ।।८६
अपधृष्यप्रभावायाः श्रीदेव्या उपसर्पणे ।
सा हि संगीतविद्येति श्रीदेव्याः अतिवल्लभा ।।६०
नातिलंघति च क्वापि तदुक्तं कार्यसिद्धिषु ।
श्रीदेव्याः शक्तिसाम्राज्ये सर्वकर्माणि मन्त्रिणी ।।६१
य गदा-त्रिशूल-दभास्त्र और वज्र को धारण किए हैं । ये सब उस मन्त्रिनाथा का भक्तिभाव से संयुत होते हुए नित्य ही सेवन किया करते हैं ।८५। दुर्दुं रूढ़—विश्व के कंटक भंडासुरों का निहनन करने के वास्ते मन्त्रि नाथा के आश्रय के द्वारा ललिता आज्ञापन के उत्सुक रहा करते हैं ।८६। गीति चक्ररथ के उपान्त में दिक्पालों ने इनको संश्रय दिया था । समस्त देवों की मन्त्रिणी द्वार से की गयी थी ।८७। विज्ञापना यह महादेवी के कार्य की सिद्धि किया करती है । राज्ञी और विज्ञापना ये दो प्रधान द्वार पर की गयी हैं ।८८। जैसी भी फल की प्राप्ति होती है । अन्यथा इनकी क्या सामर्थ्य है । जो ज्वलित ओज वाली और अप्रधृष्य प्रभाव वाली श्री देवी के समीप में सर्पण किया जा सके । वह निश्चय ही संगीत विद्या है जो श्री देवी की अतिवल्लभा है ।८६-६०। कार्यों की सिद्धियों में कहीं पर भी उसके कथित का अतिलंघन नहीं करती हैं । श्रीदेवी के शक्ति के साम्राज्य में वह मन्त्रिणी ही सब कर्मों को किया करती है ।६१।
अकर्त्तु मन्यथा कत्तुं कत्तुं चैव प्रगल्भते ।
तस्मात्सर्वेऽपि दिक्पालाः श्रीदेव्या जय कांक्षिणः ।
तस्याः प्रधानभूतायाः सेवामेव वितन्वते ।।६२
इति श्रीललितादेव्याश्चक्रराजरथोत्तमे ।
पर्वस्थितानां देवीनां नामानि कथितान्यलम् ।।६३
भंडासुरस्य संहारे तस्या दिव्यायुधान्यपि ।
प्रोक्तानि गेयचक्रस्य पर्वदेव्याश्च कीर्तिताः ।।६४
२५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इमानि सर्वदेवीनां नामान्याकर्णयंति ये ।
सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते स्युर्विजयिनो नराः ॥६५
जो भी कुछ करने का अथवा नहीं करने का है उस सभी को करने में प्रगल्भ होती हैं । कारण से सभी दिक्पाल श्री देवीकी ही जय की कांक्षा वाले रहा करते हैं । प्रधानभूता उसकी ही सेवा का विस्तार किया करते हैं ।६२। यह श्री ललिता देवी के चक्रराज रथोत्तम में पर्वों में संस्थित देवियों के नाम वर्णित कर दिए गए हैं।६३। भंडासुर के संहार में उसके परम दिव्य आयुधों का भी वर्णन कर दिया है। गेय चक्र और पवभी देवी के वर्णित किए गए हैं। इन समस्त देवियों के नामों का जो भी कोई श्रवण किया करते हैं वे नर समस्त पापों से छुटकारा पाकर विजयी हो जाते हैं ।६४-६५
किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन
हयग्रीव उवाच-
किरिचक्र रथेन्द्रस्य पंचपर्वसमाश्रिताः ।
देवताश्च शृणु प्राज्ञ नाम यच्छृण्वतां जयः ॥१
प्रथमं पर्वविद्धाख्यं संप्राप्ता दंडनायिका ।
सा तत्र जगदुद्दण्डकण्टकव्रातघस्मरी ॥२
नानाविधाभिर्ज्वालाभिर्नर्तयंती जयश्रियम् ॥३
उद्दण्डपोत्रि निर्घांतनिर्भिन्नोद्धतदानवाः ।
दंष्ट्राबालमृगांकांशुविभावनविभावरी ॥४
प्रावृषेण्यपयोवाहव्यूहनीलवपुर्लता ।
किरिचक्ररथेंद्रस्य सालंकारायते सदा ।
पोत्रिणी पुत्रिताशेषविश्वावर्तकदंबिका ॥५
तस्यैव रथनाभस्य द्वितीयं पर्व संश्रिताः ।
जृंभिनी मोहिनी चैव स्तंभिनी तिस्र एव हि ।
उत्फुल्लदाडिमीप्रख्यं सर्वदानवमर्दनाः ॥६