भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 659

चक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ] [ २४६

सर्वानन्दमयी देवी सर्वरक्षास्वरूपिणी ।
दशमी देवता ज्ञेया सर्वेप्सितफलप्रदा ॥४४
एताश्चतुर्भुजा ज्ञेया वज्रं शक्तिं च तोमरम् ।
चक्रं चैवाभिविभ्राणा भण्डासुरवधोद्यताः ॥४५
अथ चक्ररथेन्द्रस्य तृतीयं पर्वसंश्रिताः ।
रहस्ययोगिनी नाम्ना प्रख्याता वागधीश्वराः ॥४६
रक्ताशोकप्रसूनाभा वाणकार्मुकपाणयः ।
कवचच्छन्नसर्वांग्यो वीणापुस्तकशोभिताः ॥४७
वशिनी चैव कामेशी भोगिनी विमला तथा ।
अरुणा च जविन्याख्या सर्वेशी कौलिनी तथा ॥४८
अष्टावेताः स्मृता देव्यो दैत्यसंहारहेतवः ।
अथ चक्ररथेन्द्रस्य द्वितीयं पर्वसंश्रिताः ॥४६

सर्वज्ञान से परिपूर्ण देवी—सर्व व्याधि विनाशिनी—सर्वाधार स्व-रूपा—सर्व पाप हरा है ।४३। सर्वानन्दमयी देवी—सर्व रक्षा स्वरूपिणी—और इनमें जो दशमी देवी है वह सर्वेप्सित फल प्रदा जानने के योग्य हैं ।४४। इनकी चार-चार भुजाएँ हैं ये वज्र—शक्ति—तोमर और चक्र को धारण करने वाली हैं तथा ये सभी उसी भण्डासुर के वध करने के लिए समुद्यत हैं ।४५। ये सब चक्र रथेन्द्र के तीसरे पर्व में संश्रय करने वाली हैं। ये वागधीश्वरा रहस्य योगिनी के नाम से प्रख्यात हैं ।४६। इनकी आभा रक्ताशोक के प्रसून के तुल्य है और इनके करों में धनुष बाण रहा करते हैं। इनके सम्पूर्ण अंग कवचों से संच्छन्न रहते हैं तथा ये वीणा और प्रस्तकों के धारण करने वाली है ।४७। वशिनी—कामेशी—भोगिनी—विमला—अरुणा—जाविनी—सर्वेशी—कौलिनी—ये आठ देवियां असुर के संहार की हेतु कही गयी हैं और चक्ररथेन्द्र के द्वितीय पर्व में समाश्रित हैं ।४८-४६।

चापबाणौ पानपात्रं मातुलुंगं कृपाणिकाम् ।
तिस्रस्त्रिपीठनलिया अष्टबाहुसमन्विताः ॥५०
पलकं नागपाशं च घंटां चैव महाध्वनिम् ।
बिभ्राणा मदिरामत्ता अतिगुप्तरहस्यकाः ॥५१

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