भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ताश्च स्फटिकसङ्काशाः परशुं पाशमेव च । गदां घण्टां मणिं चैव दधाना दीप्तिविग्रहाः ॥३६ देवद्विषामति क्रुद्धा भ्रुकुटीकुटिलाननाः । एतासामपि नामानि समाकर्णय कुम्भज ॥३७ सर्वसिद्धिप्रदा देवी सर्वसम्पत्प्रदा तथा । सर्वप्रियंकरी देवी सर्वमंगलकारिणी ॥३८ सर्वकामप्रदा देवी सर्वदुःखविमोचिनी ॥३९ सर्वमृत्युप्रशमिनी सर्वविघ्ननिवारिणी । सर्वांगसुन्दरी देवी सर्वसौभाग्यदायिनी ॥४० दशैताः कथिता देव्यो दयया पूरिताशयाः । चक्रे तुरीयपर्वस्था मुक्ताहारसमत्विषः ॥४१ निगर्भयोगिनी नाम्ना प्रथिता दश कीर्तिताः । सर्वज्ञा सर्वशक्तिश्च सर्वैश्वर्यप्रदा तथा ॥४२ सर्वज्ञानमयी देवी सर्वव्याधिविनाशिनी । सर्वाधारस्वरूपा च सर्वपापहरा तथा ॥४३

और इसके अनन्तर स्फटिक मणि के सदृश हैं और परशु-पाश—गदा-घण्टा और मणि को धारण करने वाली हैं और परम दीप्त विग्रह वाली हैं ।३६। वे सब देवों के शत्रु के प्रति अत्यन्त क्रुद्ध थीं और उनके मुख तथा भृकुटियां कुटिल हैं। हे कुम्भज ! अब उनके भी नामों का श्रवण कीजिए ।३७। सर्व सिद्धि प्रदा देवी—सर्व सम्पद प्रदा—।३७-३६। सर्व प्रियङ्करी देवी—सर्व मङ्गल कारिणी। सर्वकामप्रदा देवी—सर्व दुःख विमोचिनी—सर्व मृत्यु प्रशमनी—सर्व विघ्न निवारिणी—सर्वांग सुन्दरी देवी—सर्व सौभाग्य दायिनी है ।४०। ये दश देवियाँ बतलायी गयी हैं जिनके आशय दया से पूरित हैं। ये चक्र में चतुर्थ पर्व में संस्थित हैं और मुक्ताओं के हार के समान कान्तिमती हैं ।४१। ये दश निगर्भ योगिनी के नाम से प्रसिद्ध कही गयी हैं । सर्वज्ञा-सर्वशक्ति-सर्वैश्वर्य प्रदा हैं ।४२।