संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ] [ २४७
अत्यन्त क्रोध से प्रज्वलित होती हुई' सी स्थित हैं ।२५-२७। इसके अनन्तर चक्र रथेन्द्र के षष्ठ पर्व पर समाश्रित हैं। सर्व संक्षोभिणो मुख्य हैं और सम्प्रदाय की आख्या से युत हैं ।२८।
वेणीकृतकचस्तोमाः सिंदूरतिलकोज्ज्वलाः । अतितीव्रस्वभावाश्च कालानलसमत्विषः ॥२६ वह्निबाणं वह्निचापं वह्निरूपमसिं तथा । वह्निचक्राख्यफलकं दधाना दीप्तविग्रहाः ॥३० असुरेन्द्रं प्रति क्रुद्धाः कामभस्मसमुद्भवाः । आज्ञाशक्तय एवैता ललिताया महौजसः ॥३१ सर्वसंक्षोभिणी चैव सर्वविद्राविणी तथा । सर्वाकर्षणिका शक्तिः सर्वाह्लादिनिका तथा ॥३२ सर्वसंमोहिनी शक्तिः सर्वस्तम्भनशक्तिका । सर्वजृम्भणशक्तिश्च सर्वोन्मादनशक्तिका ॥३३ सर्वार्थसाधिका शक्तिः सर्वसम्पत्तिपूरणी । सर्वमन्त्रमयी शक्तिः सर्वद्वंद्वक्षयङ्करी ॥३४ एवं तु सम्प्रदायानां नामानि कथितानि वै । अथ पञ्चमपर्वस्थाः कुलोत्तीर्णा इति स्मृताः ॥३५
वेणीकृत हैं कचों के स्तोम जिनके ऐसी—सिन्दूर के तिलक से समु- ज्ज्वल—अतीव तीव्र स्वभाव से युक्त—कमल और अनल के समान कान्ति वाली हैं ।२६। इनके कलेवर परम दीप्त हैं तथा वह्निवाण—वह्निचाप— वह्निरूप असि और वह्नि चक्रारूख्य फलक को धारण करने वाली हैं ।३०। असुरेन्द्र के प्रति क्रोध से युक्त और कामदेव की भस्म से समुत्पन्न ये सब महान् ओज वाली ललिता देवी की आज्ञा शक्तियां हैं ।३१। सर्व संक्षोभिणी सर्वविद्राविणी—सर्वाकर्षणिका शक्ति—सर्वा ह्लादिनिका—सर्व संमोहिनी शक्ति—सर्व स्तम्भन शक्ति—सर्व जृम्भण शक्ति—सर्वोन्मादन शक्ति— सर्वार्थसाधिका शक्ति—सर्व सम्पत्ति पूरणी—सर्व मन्त्रमयी शक्ति—सर्वद्वन्द्व क्षयंकरी—इस प्रकार से सम्प्रदाय के ये नाम कह दिये गये हैं ये पञ्चम पर्व में स्थित हैं और कुलोत्तीर्णा कही गयी हैं ।३२-३५।