संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कामेशी चैव वज्रेशी भगमाक्षिन्यथापरा । तिस्र एताः स्मृता देव्यो भण्डे कोपसमन्विताः ॥५२ ललितासममाहात्म्या ललितासमतेजसः । एतास्तु नित्यं श्रीदेव्या अन्तरङ्गाः प्रकीर्त्तिताः ॥५३ अथानन्दमहापीठे रथमध्यमपर्वणि । परितो रचितावासाः प्रोक्ताः पञ्चदशाक्षराः ॥५४ तिथिनित्याः कालरूपा विश्वं व्याप्यैव संस्थिताः । भण्डासुरादिदैत्येषु प्रक्षुब्धभ्रुकुटीतटा ॥५५ देवीसमनिजाकारा देवीसमनिजायुधाः । जगतामुपकाराय वर्तमाना युगेयुगे ॥५६
ये चाप—बाण—पान पात्र—मातुलुंग और कृपाणिका धारण करने वाली हैं। ये तीन हैं और तीन पीठों पर इनका निलय है एवं आठ बाहुओं से संयुक्त हैं ।५०। पलक-नागपाश महाध्वनि घण्टा को धारण करने वाली हैं। ये मदिरा के पान से मत्त रहा करती है तथा अति गुप्त रहस्य वाली हैं ।५१। कामेशी-वज्रेशी-भगमालिनी—ये तीन देवियाँ कही गयी हैं जो भण्डासुर दैत्य पर अत्यधिक क्रोध से समन्वित थीं।५२। इनका माहात्म्य भी ललिता देवी के ही समान था तथा ललिता देवी के ही समान ही इनका ओज महान् था । ये देवियाँ नित्य ही श्री देवी की अन्तरंग बतायी गयी हैं ।५३। इसके अनन्तर रथ के मध्य के पर्व पर आनन्द महापीठ पर सब ओर रचित आवास वाली पञ्चदशाक्षरा कही गयी हैं ।५४। ये तिथि नित्या-कालरूपा और विश्वको व्याप्त करके ही संस्थित रहा करती हैं। भण्डासुर आदि जो भी दैत्य हैं इनको उन पर प्रक्षुब्ध भुकुटियाँ रहा करती हैं ।५५। ये सभी देवी के ही तुल्य आकार वाली हैं और श्रीदेवी के ही समान अपने आयुधों वाली हैं। ये प्रत्येक युग में जन समूहों के उपकार के ही लिए वर्त्तमान रहा करती हैं ॥५६॥
तासां नामानि मत्तस्त्वमवधारय कुम्भज । कामेशी भगमाला च नित्यक्लिन्ना तथैव च ॥५७ भेरूण्डा वह्निवासिन्यो महावज्रेश्वरी तथा ।