संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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था ।६-१०। वह रथ परम तीव्र रावण की सुशक्तियों की परम्पराओं से समन्वित था । वह रथ उस समर में परम शोभित हो रहा था जिसमें उदित पिशंग रुचि के भागसे युक्त वस्त्रसे वह संवीत था औरपरम मनोहर कान्ति वाला था ।११। ललितादेवी मरुद्गणों के द्वारा संस्तूयमान होती हुई संग्राम करने के उद्देश्य से तेजी से चली थी । मरुद्गण उसके पच्चीस नाम रत्नों को कहकर ही उसका संस्तवन कर रहे थे जो नाम प्रपञ्चों के पापों के प्रशमन करने में परम दक्ष थे ।१२। अगस्त्य जी ने कहा—हे वाजि वक्त्र ! आप तो महती बुद्धि वाले हैं । आप उन पच्चीस ललिता परमेशानी के नामों से हमारे कानों के लिये रसपान कराइए ।१३। हयग्रीवजी ने कहा—उनके पच्चीस नाम ये हैं—सिंहासना-महाराज्ञी—परंकुशा-चापिनो-त्रिपुरा-महात्रिपुर सुन्दरी ।१४।
सुन्दरी चक्रनाथा च साम्राज्ञी चक्रिणी तथा ।
चक्रेश्वरी महादेवी कामेशी परमेश्वरी ॥१५
कामराजप्रिया कामकोटिगा चक्रवर्तिनी ।
महाविद्या शिवानंगवल्लभा सर्वपाटला ॥१६
कुलनाथाम्नायनाथा सर्वाम्नायनिवासिनी ।
शृङ्गारनायिका चेति पञ्चविंशतिनामभिः ॥१७
स्तुवन्ति ये महाभागां ललितां परमेश्वरीम् ।
ते प्राप्नुवन्ति सौभाग्यमष्टौ सिद्धीर्महद्यशः ॥१८
इत्थं प्रचंडसंरंभं चालयंती महद्बलम् ।
भंडासुरं प्रति क्रुद्धा चचाल ललितांबिका ॥१९
सुन्दरी-चक्र नाथा-साम्राज्ञी-चक्रिणी-चक्रेश्वरी-महादेवी-कामेशी—परमेश्वरी ।१५। कामराज प्रिया--कामकोटिगा—चक्र वर्तिनी-महाविद्या-शिवा-अनंग वल्लभा-सर्वपाटला-।१६। कुलनाथा—आम्नाय नाथा-सर्वाम्नाय निवासिनी और शृंगार नायिका—ये ही पच्चीस नाम हैं ।१७। जो महाभाग पुरुष इन उपर्युक्त नामों से परमेश्वरी ललिता की स्तुति किया करते हैं वे परम सौभाग्य—आठों अणिमादिक सिद्धियाँ और महान् यश को प्राप्त किया करते हैं ।१८। इस प्रकार से परम प्रचण्ड के साथ अपनी महती सेना का सञ्चालन कर रही थी और भण्डासुर के प्रति अत्यधिक क्रुद्ध होकर वह ललिताम्बिका वहाँ से रवाना हुई थी ।१६।