संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा ] [ २४१
दीप्तायुधद्युतितिरस्कृतभास्कराभिर्नित्याभिरंघ्रिसविधे समुपास्यमाना । श्रीचक्रनामतिलकं दशयोजनातितुंगध्वजोल्लिखितमेघ- कदंबमुच्चैः ॥१० तीव्राभिरावणसुशक्तिपरंपराभिर्युक्तं रथं समरकर्मणि चालयंती । प्रोद्यत्पिशंगरुचिभागमलांशुकेन वीतामनोहररुचिस्समरे व्यभासीत् ॥११ पंचाधिकैर्विंशतिनामरत्नैः प्रपंचपापप्रशमातिदक्षैः । संस्तूयमाना ललिता महद्भिः संग्राममुद्दिश्य समुच्चचाल ॥१२ अगस्त्य उवाच- वाजिवक्त्र महाबुद्धे पंचविंशतिनामभिः । ललितापरमेशान्या देहि कर्णरसायनम् ॥१३ हयग्रीव उवाच- सिंहासना श्रीललिता महाराज्ञी परांकुशा । चापिनो त्रिपुरा चैव महात्रिपुरसुन्दरी ॥१४
ब्रह्मा—विष्णु और शम्भु जिनमें प्रमुख थे ऐसे देवों के मुखों को जो बराबर स्तुति कर रहे थे अपने कृपा कटाक्ष से देख रही थी । अतीव उदीप्त कुसुमों के पाँच शरों से समुत्थित प्रकाशों से सहसा ज्योतिर्मय त्रिभुवन को धारण करने वाली है ।८। विद्युल्लता के समान कान्तिमती अप्सराओं के समुदाय के द्वारा जय और मङ्गल के लिए लाजाओं की वर्षा जिसके ऊपर हो रही थी । कामेश्वरी आदि—परम कमनीय आभा वाली और संग्राम के वेषकी रचना में सुमनोहर—दीप्त आयुधों की दीप्ति से भास्कर की आभा को तिरस्कृत कर देने वाली ऐसी नित्या परिचारिकाओं के द्वारा चरणों के समीप में भली भाँति उपास्यमाना थी । श्रीचक्र नाम वाले रथ पर विराजमान होकर समर में उसको चला रही थी । वह रथ ऐसा था जिसकी ध्वजा दश योजन से भी अधिक ऊँची थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वह आकाश को उल्लिखित कर रहीं होवें जिसमें मेघों का समुदाय