भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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चक्रू रथ पर्वस्थ देवना नाम प्रकाशन ] [ २५३

वामा ज्येष्ठा च रौद्री च शांतिः श्रद्धा सरस्वती ॥७३ श्री भूशक्तिश्च लक्ष्मीश्च सृष्टिश्चैव तु मोहिनी । तथा प्रमाथिनी चाश्वासिनी वीचिस्तथैव च ॥७४ विद्युन्मालिन्यथ सुरानन्दाथो नागबुद्धिका । एतास्तु कुरविंदाभा जगत्क्षोभणलंपटाः ॥७५ महासरससन्नाहमादधानाः पदे पदे । वज्रकंटकसंछन्ना अट्टहासोज्ज्वलाः परे । वज्रदंडौ शतघ्नीं च संबिभ्राणा भुशुण्डिकाः ॥७६ अथ गीतिरथेन्द्रस्य षष्ठं पर्वं समाश्रिताः । असितांगप्रभृतयो भैरवाः शस्त्रभीषणाः ॥७७

रति-प्रीति-कीर्त्ति-शान्ति-पुष्टि-तुष्टि—ये शक्ति रक्त नेत्रों वाली हैं हैं ।७१। हे कुम्भ सम्भव ! ये कुमारियाँ कुन्त चक्रधर कही गयी हैं। पाँचवें पर्व में वामा आदिक दूसरी सोलह सम्प्राप्त हैं ।७२। गीति चक्र रथेन्द्र की हैं। उनके भी नामों का श्रवण कीजिए जिनको मैं बता रहा हूँ। वामा-ज्येष्ठा-रौद्री-शान्ति-श्रद्धा-सरस्वती-श्री-भूशक्ति-लक्ष्मी-सृष्टि-मोहिनी-प्रमाथिनी-अश्वासिनी-वीचि-विद्युन्मालिनी-सुरानन्दा-नाग बुद्धिका—ये सब कुरविन्दकी आभा वाली हैं और सम्पूर्ण जगत् के क्षोभण करने में संलग्न हैं ।७३-७५। ये पद-पद में महा सरसमन्नाह को धारण करने वाली हैं। ये वज्र कंकट से संच्छन्न हैं और अट्टहास करने से उज्ज्वल हैं। ये वज्र-दण्ड-शतघ्नी और भुशुन्डिकाओं को धारण करने वाली हैं ।७६। इसके पश्चात् गीतिरथेन्द्र के षष्ठ पर्व में समाश्रित है। असितांग प्रभृति शस्त्रों से महान भीषण भैरव हैं ।७७।

त्रिशिखं पानपात्रं च बिभ्राणा नीलवर्चसः । असितांगो रुरुश्चंडः क्रोध उन्मत्तभैरवः ॥७८ कपालीभीषणश्चैव संहारश्चाष्ट भैरवाः । अथ गीतिरथेंद्रस्य सप्तमं पर्व संश्रिताः ॥७९ मातंगी सिद्धलक्ष्मीश्च महामातंगिकापि च ।