संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उन्मादिनीति पंचेता दीप्तकार्मुकपाणयः । तत्र पर्वण्यधस्तात्तु वर्तमाना महौजसः ॥६६ कामराजश्च कंदर्पो मन्मथो मकरध्वजः । मनोभवः पंचमः स्यादेते त्रैलोक्यमोहनाः ॥६७ कस्तूरीतिलकोल्लासिभालामुक्ताविराजिताः । कवचच्छन्नसर्वाङ्गाः पलाशप्रसवत्विषः ॥६८ पंचकामा इमे प्रोक्ता भंडासुरवधार्थिनः । जेयचक्ररथेंद्रस्य चतुर्थं पर्वसंश्रिताः ॥६९ ब्राह्मीमुख्यास्तु पूर्वोक्ताश्चंडिका त्वष्टमी परा । तत्र पर्वण्यधस्ताच्च लक्ष्मीश्चैव सरस्वती ॥७०
रति-प्रीति-मनोज्ञा हैं जिनके करों में वीणा और कार्मुक हैं। इनका वर्ण तमाल के तुल्य श्यामल है और ये दानवों के उन्मूलन करने में परम समर्थ हैं ।६४। तीसरे पर्व में संरूढ़ मनोभूबाण देवता हैं। द्राविणी-शोषणी-बंधिनी-मोहिनी हैं ।६५। उन्मादिनी ये पाँच हैं जिनके करों में दीप्त कार्मुक हैं। वहाँ पर पर्व में नीचे की ओर महान् ओज वाले वर्त्तमान हैं ।६६। कामराज-कन्दर्प-मन्मथ-मकरध्वज और मनोभव—ये पाँच हैं जो त्रैलोक्य के मोहन करने वाले हैं ।६७। ये कस्तूरी के तिलक से उल्लसित भाल वाले तथा मुक्ताओं के तुल्य शोभित हैं। इनके सभी अंग कवचों से ढके हुए हैं और ये पलाश के पुष्पों के समान कान्ति वाले हैं ।६८। ये पाँच काम बताये गये हैं जो भण्डासुर के वध के लिए ही हैं। जय चक्र रथेन्द्र के चतुर्थ पर्व में संश्रय वाले हैं ।६९। ब्राह्मी जिनमें प्रमुख है पूर्व में वर्णित चन्डिका अष्टमी परा हैं। वहाँ पर पर्व में नीचे लक्ष्मी और सरस्वती हैं ।७०।
रतिः प्रीतिः कीर्तिशांती पुष्टिस्तुष्टिश्च शक्तयः । एताश्च क्रोधरक्ताक्ष्यो दैत्यं हंतुं महाबलम् ॥७१ कुन्तचक्रधराः प्रोक्ताः कुमार्यः कुम्भसंभव । पंचमं पर्व संप्राप्ता वामाद्याः षोडशापराः ॥७२ गीति चक्ररथेंद्रस्य तासां नामानि मच्छृणु ।