संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २५७
मुसलं च हलं हालापात्रं मणिगणार्पितम् । ज्वलन्माणिक्यवलयैर्बिभ्राणाः पाणिपल्लवैः ॥७
श्री हयग्रीव जी ने कहा-किरि चक्र रथेन्द्र के पाँच वर्षों में समाश्रित जो देवता हैं उनके नामों का भी श्रवण कीजिए। हे प्राज्ञ ! जिनके श्रवण करने वालों का जय ही हुआ करता है ।१। प्रथम पर्व बिन्दु नामक है । जिसमें दंड नायिका सम्प्राप्त है। वहाँ पर वह जगत के उदंडों के समुदाय की विनाशिका है ।२। यह नाना प्रकार की ज्वालाओं से जय श्री को नर्तन कराया करती है ।३। उद्दण्ड पौत्र के निर्घात से जिसने उद्धत दानवों को निर्भिन्न कर दिया है। दंष्ट्रा से गल मृगाङ्कांगु के विभावन करने वाली विभावरी है । वर्षा कालीन मेघों के समूह के समान नील वपु वाली लता है । वह किरि चक्र रथेन्द्र की वह सदा अलंकार के समान है। पोत्रिणी पुत्रिता के अशेष विश्व के आवत्तं की कदम्बिका है ।४-५। उसी रथनाभ के द्वितीय पर्व में संश्रय लेने वाली है । दम्भिनी-मोहिनी और स्तम्भिनी-ये तीन ही हैं । विकसित दाड़िमी के समान और सभी दानवों के मदंन करने वाली हैं ।६। ये अपने कर पल्लवों द्वारा जिनमें देदीप्यमान मणियों के वलय है-मुसल-हल और हाला पात्र मणिगणों से समर्पित धारण करने वालों हैं ।७।
अतितीक्ष्णकरालाक्ष्यो ज्वालाभिर्दैत्यसैनिकान् । दहंत्य इव निःशंकं सेवन्ते सूकराननाम् ॥८ किरिचक्ररथेन्द्रस्य तृतीयं पर्व संश्रिताः । अंधिन्याद्याः पञ्च देव्यो देवीयंत्रकृतास्पदाः ॥९ कठोरेणाट्टहासेन भिदंत्यो भुवनत्रयम् । ज्वाला इव तु कल्पाग्नेरंगनावेषमाश्रिताः ॥१० भंडासुरस्य सर्वेषां सैन्यानां रुधिरप्लुतिम् । लिलिक्षमाणा जिह्वाभिर्लेलिहानाभिरुज्ज्वलाः ॥११ सेवंते सततं दंडनाथामुद्दण्डविक्रमाम् । किरिचक्ररथेन्द्रस्य चतुर्थं पर्व संश्रिताः ॥१२ ब्रह्माद्याः पञ्चमीवर्ज्या अष्टमीवर्जिता अपि ।
१५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
षडेव देव्यः षट्चक्रज्वलज्जवालाकलेवराः ॥१३ महता विक्रमौघेण पिबंत्य इव दानवान् । आज्ञया दंडनाथायास्तं प्रदेशमुपासते ॥१४
इनके नेत्र अत्यधिक तीक्ष्ण एवं कराल हैं। जिनकी ज्वालाओं से दैत्यों के सैनिकों को दग्धसी कर रही है और निःशंक होकर सूकरानना की सेना किया करती है ।८। ये किरिचक्र रथेन्द्र के तीसरे पर्व में समाश्रय लेने वाली हैं । अन्धिनी आदि पाँच देवियाँ देवी के यन्त्र में अपना आस्पद करने वाली हैं ।६। इनका इतना कठोर अट्टहास होता है जिससे ये तीनों भुवनों का भेदन किया करती हैं । अङ्गना के वेष का आश्रय ग्रहण कर कल्पाग्नि की ज्वालाओं के ही तुल्य होती हैं ।१०। भण्डासुर की समस्त सेनाओं की रुधिर के प्लावन को चाटने की इच्छा करती हुई लेलिहान ज्वालाओं की जिह्वाओं से उज्ज्वल ।११। ये सभी अतीव उद्दण्ड विक्रम वाली दण्डनाथा का निरन्तर सेवन किया करती हैं । किरिचक रथेन्द्र के चौथे पर्व में इनका संश्रय होता है ।१२। ब्राह्मी आदि पाँचवीं से रहित तथा आठवीं से रहित ये छै ही देवियां षट्चक्र की जलती हुई ज्वालाओं के कलेवर वाली हैं ।१३। महान विक्रम के समुदाय के द्वारा दानवों का पान सा करने वाली हैं । दण्डनाथा की ही आज्ञा से ये उसी प्रदेश की उपासना किया करती हैं ।१४।
तस्यैव पर्वणोऽधस्तात्त्वरिताः स्थानमाश्रिताः । यक्षिणी शंखिनी चैव लाकिनी हाकिनी तथा ॥१५ शाकिनी डाकिनी चैव तासामैक्यस्वरूपिणी । हाकिनी सप्तमीत्येताश्चंडदोर्दंडविक्रमाः ॥१६ पिबंत्य इव भूतानि पिबंत्य इव मेदिनीम् । त्वचं रक्तं तथा मांसं मेदोऽस्थि च विरोधिनाम् ॥१७ मज्जानमथ शुक्लं च पिबन्त्यो विकटाननाः । निष्ठुरैः सिंहनादैश्च पूरयंत्यो दिशो दश ॥१८ धातुनाथा इति प्रोक्ता अणिमाद्यष्टसिद्धिदाः । मोहने मारणे चैव स्तंभने ताडने तथा ॥१६
किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २५६
भक्षणे दुष्टदैत्यानामामूलं च निकृन्तने ।
पंडिताः खंडिताशेषविपदो भक्तिशालिषु ॥२०
धातुनाथा इति प्रोक्ताः सर्वधातुषु संस्थिताः ।
सप्तापि वारिधीनूनिर्मालासंचुम्बितांबरान् ॥२१
उसी पर्व के नीचे त्वरिता स्थान के समाश्रित हैं। यक्षिणी-शंखनी-लाकिन-हाकिनी ।१५। शाकिनी-डाकिनी—उनकी एकता के स्वरूप वाली हाकिनी सातवीं हैं—ये प्रचंड दोर्दण्डों के विक्रम वाली हैं।१६। ये समस्त भूतों को पान सा करती हैं तथा सम्पूर्ण मेदिनी का पान सा करती हुई हैं। त्वचा-रक्त-माँस-मेद और विरोधियों की अस्थियों को तथा मज्जा और शुक्र को विकट मुखों वाली पान सा करती हुई थीं। उनके अत्यधिक कठोर सिंहनाद थे जिनसे वे दशों दिशाओं को पूरित कर रही थीं ।१७-१८। अणिमा आदि आठों सिद्धियों को प्रदान करने वाली वे धातुनाथा कही हैं। दुष्ट दैत्यों के मोहन-मारण-स्तम्भन-ताड़न भक्षण और आमूल निकृन्तन में परम पंडित और भक्ति शालियों के विषय में समस्त विपदाओं का खंडन करने वाली थीं ।१९-२०। समस्त धातुओं में संस्थित वे धातुनाथा बतायी गयी हैं। अपनी तरङ्गों की मालाओं से अम्बर को चुम्बित करने वाले सातों सागरों में संस्थित थीं ।२१।
क्षणार्धेनैव निष्पातुं निष्पन्नबहुसाहसाः ।
शकटाकारदन्ताश्च भयंकरविलोचनाः ॥२२
स्वस्वामिनीद्रोहकृतां स्वकीयसमयद्रुहाम् ।
वैदिकद्रोहणादेव द्रोहिणां वीरवैरिणाम् ॥२३
यज्ञद्रोहकृतां दुष्टदैत्यानां भक्षणे समाः ।
नित्यमेव च सेवन्ते पोत्रिणीं दण्डनायिकाम् ॥२४
तस्यैव पर्वणः पार्श्वे द्वितीये दिव्यमन्दिरे ।
क्रोधिनी स्तंभिनी ख्याते वर्तेते देवते उभे ॥२५
चामरे वीजयन्त्यौ च लोलकंकणदोलंते ।
देवद्विषां चमूरक्तहालापानमहोद्धते ॥२६
सदा विघूर्णमानाक्ष्यौ सदा प्रहसितानने ।
२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अथ तस्य रथेंद्रस्य किरिचक्राश्रितस्य च ॥२७ पार्श्वद्वयकृतावासमायुधद्वंद्वमुत्तमम् । हलं च मुसलं चैव देवतारूपमास्थितम् ॥२८
इन सब समुद्रों को आधे ही क्षण में पान करने में इनका बहुत अधिक साहस निष्पन्न था। इनके दाँत शकट के समान आकार वाले थे और इनके मुख बहुत ही विकराल थे एवं परम भीषण लोचन थे। २२। ये अपनी स्वामिनी से द्रोह करने वाले और अपने समय के द्रोहियों के तथा वैदिक द्रोहण से द्रोही वीर वैरियों के एवं यज्ञों से द्रोह करने वाले परम दुष्ट दैत्यों के भक्षण करने में ये सब समान थीं। ये नित्य ही पोत्रिणी दण्ड नायिका का सेवन किया करती हैं । २३-२४। उसी पर्व के पार्श्व में द्वितीय दिव्य मन्दिर में क्रोधिनी और स्तम्भिनी प्रसिद्ध हैं और ये दो देवता वर्त्तमान रहती हैं ।२५। ये दोनों चमरों को ढुलाया करती हैं जिससे इनकी दो भुजाएं हिलती हैं जिनमें उनके कङ्कण भी हिलते रहा करते हैं। ये देवों के शत्रुओं की सेना के रक्त और हाला के पान करने में मदोद्धत हैं ।२६। इनके नेत्र दिव्य ही विधूर्णित हैं और इनके मुखों पर प्रहास रहा करता है। इसके अनन्तर रथेन्द्र के किरि के दोनों पार्श्वों में आवास करने वाला उत्तम आयुधों का द्वन्द्व-हल-मुसल देवता के रूप में समास्थित है ।२७-२८।
स्वकीयमुकुटस्थाने स्वकीयायुधविग्रहम् । आबिभ्राणं जगद्द्वेषिघसमरं विबुधैः स्मृतम् ॥२९ एतदायुधयुग्मेन ललिता दंडनायिका । खण्डयिष्यति संग्रामं विषंगं नाम दानहम् ॥३० तस्यैव पर्वणो दण्डनाथाया अग्रसीमनि । वर्त्तमानो महाभीमः सिंहो नादैर्ध्वनन्नभः ॥३१ दंष्ट्राकटकटात्कारवधिरीकृतदिङ्मुखः । चंडोच्चंड इति ख्यातश्चतुर्हस्तस्त्रिलोचनः ॥३२ शूलखड्गप्रेतपाशान्दधानो दीप्तविग्रहः । सदा संसेवते देवीं पश्यन्नेव हि पोत्रिणीम् ॥३३ किरिचक्ररथेन्द्रस्य षष्ठ पर्व समाश्रिताः ।
किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६१
वार्त्ताल्याद्या अष्ट देव्यो दिक्ष्वष्टासूपविश्रुताः ।।३४।
अष्टपर्वतनिष्पातघोरनिर्घातनिः स्वनाः ।
अष्टनागस्फुरद्भूषा अनष्टबलतेजसः ।।३५।
अपने मुकुट के स्थान में स्वकीय आयुधों के विग्रह को धारण करते हुए जगत् के नाशक का देवगणों ने स्मरण किया था ।२९। इसको आयुधों के जोड़े से दण्ड नायिका ललिता विषङ्ग नामदानह संग्राम का खण्डन कर देगी ।३०। दण्डनाथा के उसी पर्व की अग्र सीमा में वर्त्तमान महान् भीम-सिंह वर्त्तमान है जो अपनी गर्जना से नभो मण्डल को ध्वनित कर रहा था ।३१। वह अपने दांतों को कटकटा रहा था जिस कट कटाहटसे सब दिशाओं में बधिरता छा गयी थी यह चंडोच्चंड—इस नाम ने विख्यात था और यह हाथ का तथा तीन लोचनों वाला था ।३२। यह शूल-खंग-प्रेत और पाशों को धारण करने वाला तथा परम दीप्त विग्रह था । यह सदा ही पोत्रिणी की ओर ही देखता हुआ देवी की सेवा किया करता है ।३३। किरिचक्र रथेन्द्र के षष्ठ पर्व पर समाश्रय लेने वाली वार्त्ताली—आदि आठ देवियां हैं जो आठों दिशाओं मे उपविश्रुत हैं ।३४। ये आठ पर्वतों के निष्पात से परम घोर निर्घात के घोष वाली थीं । आठ नागों के स्फुरित भूषा से संयुत तथा न नष्ट होने वाले बल और तेज वाली थी ।३५।
प्रकृष्टदोषप्रकांडोष्महुतदानवकोटयः ।
सेवंते ललितां देव्यो दंडनाथामहर्निशम् ।।३६।
तासामाख्याश्च विख्याताः समाकर्णय कुम्भज ।
वार्ताली चैव वाराही सा वाराहमुखी परा ।।३७।
अंधिनी रोधिनी चैव जृंभिणी चैव मोहिनी ।
स्तंभिनीति रिपुक्षोभस्तंभनोच्चाटनक्षमाः ।।३८।
तासां च पर्वणो वामभागे सततसंस्थितिः ।
दंडनाथोपवाह्यस्तु कासरो धूसराकृतिः ।।३९।
अर्धक्रोशायतः शृंगद्वितये क्रोशविग्रहः ।
खड्गवन्निष्ठुरैर्लोमजातैः संवृतविग्रहः ।।४०।
कालदंडवदुच्चंडबालकांगभयंकरः ।
२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नीलांजनाचलप्रख्यो विकटोन्नतपृष्ठभूः ॥४१ महानीलगिरिश्रेष्ठगरिष्ठस्कन्धमंडलः । प्रभूतोष्मलनिश्वासप्रसराकंपितांबुधिः ॥४२
परम प्रकृष्ट बाहुओं की प्रकांड ऊष्मा में करोड़ों दानव हृत हो रहे थे। ऐसी ये देवियां अहर्निश दण्डनाथा श्री ललिता देवी की सेवा किया करती हैं। उनकी आख्या तो परम विख्यात है। हे कुम्भज ! उसका आप श्रवण कीजिए। वार्त्ताली—वाराही—बाराह मुखी—अन्धिनी—जृम्भिणी—मोहिनी—स्तम्भिनी—ये हैं जो शत्रुओं के क्षोभ और स्तम्भन तथा उच्चाटन करने में परम समर्थ है ।३६-३८। इनकी संस्थिति पर्व के वाम भाग में निरन्तर रहा करती है। उस दंडनाथा का उप वाह्य कासर हैं जिसको धूसर आकृति हैं ।३६। यह आधे कोश के बराबर आयत है। इसके दो सींग है और एक कोश के बराबर विग्रह वाला है। इसके जो केश हैं वे खड्ग के समान कठोर हैं जिनसे इसका कलेवर ढका हुआ है ।४०। कालदंड के तुल्य उच्छंड बालों के कांड से बड़ा ही भयंकर है। यह नीले आंजन के पर्वत के समान परम विकट और उन्नत पृष्ठ भू वाला है ।४१। महानील गिरि के समान गरिष्ठ एवं श्रेष्ठ स्कन्धों के मंडल वाला है। प्रभूत ऊष्मा से युक्त निःश्वास के प्रसार से सागर को भी प्रकम्पित करने वाला है ।४२।
घर्घरध्वनिना कालमहिषं विहसन्निव । वर्त्तते खुरविक्षिप्तपुष्कलावर्तवारिदः ॥४३ तस्यैव पर्वणोऽधस्ताच्चित्रस्थानकृतालयाः । इन्द्रादयोऽनेकभेदा दिशामष्टकदेवताः ॥४४ ललितायां कार्यसिद्धिं विज्ञापयितुमागताः । इन्द्रश्चाप्सरसश्चैव स चतुष्षष्टिकोटयः ॥४५ सिद्धाअग्निश्च साध्याश्च विश्वेदेवास्तथापरे । विश्वकर्मा मयश्चैव मातरश्च बलोन्नताः ॥४६ रुद्राश्च परिचाराश्च रुद्राश्चैव पिशाचकाः । क्रन्दंति रक्षसां नाथा राक्षसा बहवस्तथा ॥४७ मित्राश्च तत्र गन्धर्वाः सदा गानविशारदाः ।
किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६३
विश्वावसुप्रभृतयो विख्यातास्तत्पुरोगमाः ॥४८॥ तथा भूतगणाश्चान्ये वरुणो वासवः परे । विद्याधराः किन्नराश्च मारुतेश्वर एव च ॥४९॥
इसकी ध्वनि घर्घराहट कालरूपी महिष का भी उपहास सा कर रही थी । इसके खुरों के निक्षेप से पुष्कल आवर्त्त वारिद हो गये थे ॥४३॥ उसके ही पर्व के नीचे की ओर चित्रालयों में संस्थिति करने वाले इन्द्र आदि अनेक भेदों वाले दिशाओं के आठ देवता थे ॥४४॥ ये सब ललिता में कार्यों की सिद्धि के ही विज्ञापन करने के लिये वहाँ पर समागत हुए थे । इन्द्र और अप्सराएँ सब चौंसठ करोड़ थे ॥४५॥ सिद्ध-अग्नि-साध्य-विश्वे-देवा-विश्वकर्मा-भय-बलोन्नत मातृगण--रुद्र-परिचार--रुद्र--पिशाच-राक्षसों के नाम तथा बहुत राक्षस क्रन्दन करते हैं ॥४६-४७॥ वहाँ पर मित्र-गन्धर्व सदा ही गान करने में परायण थे । विश्वावसु आदि सब जो विख्यात हैं उसके आगे गमन करने वाले थे ॥४८॥ उसी भाँति से भूतगण—अन्य थे तथा वरुण और वासव—विद्याधर—किन्नरगण और मारुतेश्वर थे जो आगे-आगे गमन कर रहे थे ॥४९॥
तथा चित्ररथश्चैव रथकारककारकाः । तुंबुरुर्नारदो यक्षः सोमो यक्षेश्वरस्तथा ॥५०॥ देवैश्च भगवांस्तत्र गोविंदः कमलापतिः । ईशानश्च जगच्चक्रभक्षकः शूलभीषणः ॥५१॥ ब्रह्मा चवाश्विनीपुत्रौ वैद्यविद्याविशारदौ । धन्वन्तरिश्च भगवान्थान्थे गणनायकाः ॥५२॥ कटकाण्डगलद्दान संतर्पितमधुव्रताः । अनंतो वासुकिस्तक्षः कर्कोटः पद्म एव च ॥५३॥ महापद्मः शंखपालो गुलिकः सुबलस्तथा । एते नागेश्वराश्चैव नागकोटिभिरावृताः ॥५४॥ एवंप्रकारा बहवो देवतास्तेत्र जाग्रति । पूर्वादिदिशमारभ्य परितः कृतमंदिराः ॥५५॥
२६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तत्रैव देवताश्चक्रे चक्राकारा मरुद्दिशः । आश्रित्य किल वर्तंते तदधिष्ठातृदेवताः ॥५६॥ उसी भाँति से चित्ररथ—रथकारक—तुम्बरु—नारद—यज्ञ—सोम— यज्ञेश्वर—समस्त देवगणों के सहित कमला के स्वामी भगवान् गोविन्द— जगत् चक्र के भक्षण करने वाले भीषण शूलपाणि ईशान—ब्रह्मा—अश्विनी कुमार जो कि वैद्य के विशारद थे—भगवान् धन्वन्तरि और अन्य गणों के नायक भो पुरोगामी थे ।५०-५२। इनके कटस्थलों से जो मद गिर रहा था उस पर भ्रमर झूम रहे थे । अनन्त—वासुकि—तक्षक—कर्कोट—पद्म— महापद्म—शंखपाल—गुलिक—सुबल—ये सब नागेश्वर थे जो करोड़ों नागों से समावृत होते हुए पुरोगमन कर रहे थे ।५३-५४। इस प्रकार वाले बहुत—से देवगण जाग्रत हो रहे थे । और पूर्व आदि दिशाओं से समारम्भ करके चारों ओर अपना निवास स्थल बनाये हुए थे ।५५। वहीं पर देवताओं ने मरुत् दिशा को चक्राकार कर दिया था । और उस दिशा का समाश्रवण करके वे सब अधिष्ठान देवता हो रहे थे ।५६। जृम्भिणी स्तंभिनी चैव मोहिनी तिस्र एव च । तस्यैव पर्वणः प्रांते किरिचक्रस्य भास्वतः ॥५७ कपालं च गदां बिभ्रदूर्ध्वकेशो महावपुः । पातालतलजंबालबहुलाकारकालिमा ॥५८ अट्टहासमहावज्रदीर्णब्रह्मांडमण्डलः । भिन्दन्डमरुकध्वानै रोदसीकन्दरोदरम् ॥५९ फूत्कारीत्रिपुरायुक्तं फणिपाशं करे वहन् । क्षेत्रपालः सदा भाति सेवमानः किटीश्वरीम् ॥६० तस्यैव च समीपस्थस्तस्या वाहनकेसरी । यमारुह्य प्रवृत्ते भंडासुरवधैषिणी ॥६१ प्रागुक्तमेव देवेशीवाहसिंहस्य लक्षणम् । तस्यैव पर्वणोऽधस्ताद्दण्डनाथसमत्विषः ॥६२ दंदिनीसदृशाशेषभूषणायुधमंडिताः । शम्याः क्रोडाननाश्चंद्ररेखोत्तंसितकुन्तलाः ॥६३
किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६५
जृम्भिणी—स्तम्भिनी—मोहिनी ये तीनों ही उसी पर्व के प्रान्त में जो कि भासुर किरि चक्र रथ था, विद्यमान थे ॥५७॥ अब क्षेत्र पाल के स्वरूप का वर्णन किया जाता है—क्षेत्रपाल कपाल और गदा को करों में धारण किये हुए है—इसके केश ऊपर की ओर उठे हुए हैं तथा इसका वपु महान् है। पाताल तल में जो जम्बाल है उसके समान आकार वाली इसमें कालिमया है ॥५८॥ इसका अट्टहास वज्र के ही तुल्य है जिससे पूर्ण ब्रह्मांड मंडल विदीर्ण हो जाता है। यह अपने डमरू के घोषों से रोदसी की कन्द-राओं के उदर को भेद रहा है ॥५६॥ फूत्कार (फुसकार) करने वाली त्रिपुरा से युक्त नागों के पाश को कर में वहन कर रहा था। ऐसा क्षेत्रपाल किटीश्वरी की सेवा करता हुआ सदा ही शोभित होता है ॥६०॥ उसके ही समीप में स्थित उसका वाहन केसरी था जिस पर समारोहण करके भंडासुर के वध की इच्छा वाली प्रवृत्त हुई थी ॥६१॥ देवी के वाहन सिंह का लक्षण तो पूर्व में ही कह दिया गया है। उसी पर्व के नीचे दंडनाथा के समान ही कान्ति वाली सहस्रों अन्य देवियाँ तथा देवता थे ॥६२॥ ये सभी दंडनाथा के ही तुल्य समस्त भूषणों और आयुधों से मंडित थे। ये शम्या-क्रोडानना-चन्द्ररेखा और उत्तंसित कुन्तला थीं ॥६३॥
हलं च मुसलं हस्ते घूर्णयंत्यो मुहुर्मुहुः । ललिताद्रोहिणां श्यामाद्रोहिणां स्वामिनीद्रुहाम् ॥६४॥ रक्तस्रोतोभिरुत्कूलैः पूरयंत्यः कपालकम् । निजभक्तद्रोहकृतां मन्त्रमालाविभूषणाः ॥६५॥ स्वगोष्ठीसमयाक्षेपकारिणां मुण्डमंडलैः । अखण्डरक्तविच्छेदैर्बिभ्रत्यो वक्षसि स्रजः ॥६६॥ सहस्रं देवताः प्रोक्ताः सेवमानाः किटीश्वरीम् ॥६७॥ तासां नामानि सर्वासां दंडिन्याः कुम्भसंभव । सहस्रनामाध्याये तु वक्ष्यते नाधुना पुनः ॥६८॥ अथ तासां देवतानां कोलास्यानां समीपतः । वाहनं कृष्णसारंगो दंडिन्याः समये स्थितः ॥६९॥ क्रोशाधार्द्धायतः शृंगे तदर्धायतौ मुखे । क्रोशप्रमाणपादश्च सदा चोद्धृतवालधिः ॥७०॥
२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इसके कर में हल और मुसल था तथा ये बार-बार घूर्णन कर रही थीं जो भी ललिता देवी के द्रोही—श्यामा के द्रोही और स्वामिनी के साथ द्रोह करने वाले थे उन्हीं को घूर रहीं थीं ।६४। उमड़े हुए रक्त के स्रोतों से कपालों को भर रहीं थीं । इनके भूषण अपने भक्तों के साथ द्रोह करने वालों की मन्त्रों की मालाएं ही थे ।६५। अपनी गोष्ठी के समय पर आक्षेप करने वालों के मुख मंडलों अर्थात् मुंडों से जिनसे रक्त स्राव हो रहा है अपने उरःस्थल पर मालाएँ धारण कर रहीं थीं ।६६। ऐसे उस किटीश्वरी की सेवा करते हुए सहस्रों ही देवता बताये गये हैं ।६७। हे कुम्भ सम्भव ! दंडिनी की उनके सबके नाम सहस्र नामाध्याय में कहेंगे अतः अब फिर नहीं कहते हैं ।६८। कोलास्य उन देवताओं के समीप में ही कृष्ण सारंग वाहन दंडिनी के समय में स्थित था । यह आधे कोश तक तो आयत था शृंग में और उससे आधा आयत मुख में था और एक कोश के प्रमाण वाले पाद थे और उसकी पूँछ तो सदा ही उद्धत रहा करती थी ।६६-७०।
उदरे धवलच्छायो हुंकारेण महीयसा ।
हसन्मारुतवाहस्य हरिणस्य पराक्रमम् ॥७१
तस्यैव पर्वणो देशे वर्त्तते वाहनोत्तमम् ।
किरिचक्ररथेन्द्रस्य स्थितस्तत्रैव पर्वणि ॥७२
वर्त्तते मदिरासिंधुर्देवतारूपमास्थिता ।
माणिक्यगिरिवच्छोणं हस्ते पिशितपिण्डकम् ॥७३
दधाना घूर्णमानाक्षी हेमांभोजस्रगावृता ।
मदशक्यचा समाश्लिष्टा धृतरक्तसरोजया ॥७४
यदा यदा भंडदैत्यः संग्रामे संप्रवर्तते ।
युद्धस्वेदमनुप्राप्ताः शक्तयः स्युः पिपासिताः ॥७५
तदा तदा सुरासिंधुरात्मानं बहुधा क्षिपन् ।
रणे खेदं देवतानामंजसापाकरिष्यति ॥७६
तदप्यद्भुतमे वर्षे भविष्यति न संशयः ।
तदा श्रोष्यसि संग्रामे कथ्यमानं मया मुदा ॥७७
किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६७
महान् हुङ्कार से उसके उदर में धवल कान्ति होती थी। हंसते मारुत के वाहन हरिण का पराक्रम था ।७१। उसी पर्व के भाग में वह उत्तम वाहन रहता है जिस पर्व में किरिचक्र रथेन्द्र की स्थिति थी ।७२। वहाँ पर मदिरा का सिन्धु भी एक देवता के स्वरूप में समास्थित होकर विद्यमान था। जो माणिक्य के समान शोण था तथा उसके हाथ में मांस का एक ढेला ।७३। उसकी आँखें विशेष घूर्णित थीं सुनहरी कमल के सदृश रुधिर से समावृत थीं। रक्त सरोज धारण करने वाली के द्वारा यह की शक्ति से समाश्लिष्ट थी ।७४। जब-जब भंड दैत्य संग्राम में प्रवृत्त होता है। युद्ध के स्वेद को अनुप्राप्त शक्तियाँ पिपासित हो जाती हैं ।७५। उसी-उसी समय में सुरा का सागर बहुधा अपने आपको क्षित करता हुआ देवों के रण के खेद को तुरन्त ही दूर कर देता है ।७६। वह भी अद्भुतम वर्ष में होगा— इसमें कुछ भी संशय नहीं है। उस समय में मेरे द्वारा कहा जाने वाला संग्राम में बड़े ही आनन्द से तुम श्रवण करोगे ।७७।
तस्यैव पर्वणोऽधस्तादष्टदिक्ष्वध एव हि ।
उपर्यपि कृतावासा हेतुकाद्या दश स्मृताः ॥७८
महान्तो भैरवश्रेष्ठाः ख्याता विपुलविक्रमाः ।
उद्दीप्तायुततेजोभिर्दिवा दीपितभानवः ॥७९
कल्पांतकाले दंडिन्या आज्ञया विश्वघस्मराः ।
अत्युदग्रप्रकृतयो रददष्टौष्ठसंपुटाः ॥८०
त्रिशूलाग्रविनिर्भिन्नमहावारिदमंडलाः ।
हेतुकस्त्रिपुरारिश्च तृतीयश्चाग्निभैरवः ॥८१
यमजिह्वैकपादौ च तथा कालकरालकौ ।
भीमरूपो हाटके शस्तथैवाचलनामवान् ॥८२
एते दशैव विख्याता दशकोटिभटान्विताः ।
तस्यैव किरिचक्रस्य वर्तंते पर्वसीमनि ॥८३
एवं हि दंडनाथायाः किरिचक्रस्य देवताः ।
जृंभिण्याद्यचलेंद्रांताः प्रोक्तास्त्रैलोक्यपावनाः ॥८४
२६८ ] [ ब्रह्माण्डपुराण
उस ही पर्व के नीचे आठों दिशाओं में नीचे ही ऊपर-ऊपर आवास करने वाले हेतुक आदि दश कहे गये हैं ॥७८॥ विपुल विक्रम से समन्वित महान् भैरव ख्यात हैं, सहस्रों तेजों से ये उद्दीप्त हैं जैसे दिन में दीपित सूर्य होवें ॥७९॥ कल्प के अन्त समय में दंडिनी देवी की आज्ञा से तृप्त सम्पूर्ण विश्व के विनाशक जिनकी अत्यन्त उदग्र स्वभाव हैं और जो अपने दांतों और होठों को पीसने वाले हैं ॥८०॥ ये त्रिशूलों के अग्रभाग से महान् मेघों के मंडल को भी निर्भिन्न कर रहे हैं—एक हेतुक है, त्रिपुरारि हैं और तीसरा अग्निभैरव है ॥८१॥ यम जिह्वा और एक पाद हैं और काल के ही समान कराल हैं। भीम स्वरूप से युक्त तथा हाटकेश हैं और उसी अचल के नाम वाला है ॥८२॥ ये केवल दश ही विख्यात हैं जो कि दश करोड़ भटों से संयुत हैं। उसी किरिचक्र के पर्व की सीमा में रहा करते हैं ॥८३॥ इस रीति से उस दंडनाथा के किरिचक्र के देवता हैं। जृम्भिणी से आदि लेकर अचलेन्द्र के अन्त तक हैं—ऐसे कहे गये हैं जो त्रैलोक्य के पावन हैं ॥८४॥
तत्रत्यैर्देवताबृन्दैर्बहवस्तत्र संगरे ।
दानवा मारयिष्यंते पास्यंते रक्तवृष्टयः ॥८५॥
इत्थं बहुविधत्राणं पर्वस्थैर्देवतागणैः ।
किरिचक्रं दंडनेत्र्या रथरत्नं चचाल ह ॥८६॥
चक्रराजरथो यत्र तत्र गेयरथोत्तमः ।
यत्र गेयरथस्तत्र किरिचक्ररथोत्तमः ॥८७॥
एतद्रथत्रयं तत्र त्रैलोक्यमिव जंगमम् ।
शक्तिसेनासहस्रस्यांतश्चचार तदा शुभम् ॥८८॥
मेरुमन्दरविंध्यानां समवाय इवाभवत् ।
महाघोषः प्रवृते शक्तीनां सैन्यमंडले ।
चचाल वसुधा सर्वा तच्चक्ररवदारिता ॥८९॥
ललिता चक्रराजाख्यो रथनाथस्य कीर्तिताः ।
षट्सारथय उद्दण्डपाशग्रहणकोविदाः ॥९०॥
यत्र गेयरथस्तत्र किरिचक्ररथोत्तमम् ।
इति देवी प्रथमतस्तथा त्रिपुरभैरवी ॥९१॥
किरिचक्ररथदेवता प्रकाशन ] ॥ २६६
संहारभैरवश्चान्यो रक्तयोगिनिवल्लभः। सारसः पंचमश्चैव चामुण्डा च तथा परा ॥६२॥
उस संग्राम में वहाँ के देवताओं के समूहों के द्वारा बहुत से दानव मारे जायेंगे और रुधिर की वृष्टि का पान किया जायगा ॥५५॥ इस प्रकार से पर्व में स्थित देवताओं के गणों के द्वारा बहुत तरह का परित्राण होगा तथा दंड नेत्री किरिचक्र चला था। ५६। जहाँ पर चक्र राज रथ था वहाँ पर ही गेय रथोत्तम था और जहाँ जहाँ पर गेय रथोत्तम था वहाँ पर ही किरिचक्र रथोत्तम था ॥५७॥ इन प्रकार से वहाँ पर तीन रथ थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों त्रैलोक्य ही जंगम है। इसके अन्दर सहस्रों शक्ति सेनाओं का शुभ संचार उस समय में हो रहा था। ५८। ऐसा मालूम होता था मानों मेरु मन्दर और विन्ध्य पर्वतों का समवाय ही हो गया होवे। उस शक्तियों के सैन्य मंडल में उस समय में महान घोष प्रवृत्त हो गया था। उस समय में उन रथों के चक्रों की ध्वनि से सम्पूर्ण वसुधा हिल गयी थी ॥५९॥ रथवाक की चक्रराज नाम वाली ललिता ही कीर्तित की गयी है। उनमें छै सारथि थे जो उद्दण्ड पाशों के ग्रहण में बड़े कोविद थे ॥६०। जहाँ पर ही गेय रथ था वहाँ-वहाँ पर किरिचक्र उत्तम रथ था। प्रथम तो देवी थी फिर उसी भाँति त्रिपुर भैरवी थी ॥६१॥ और अन्य संहार भैरव था जो रक्त योगिनी का वल्लभ था। सारस पाँचवाँ था तथा अपरा चामुण्डा थी ॥६२॥
एतासु देवतास्तत्र रथसारथयः स्मृताः। गेयचक्ररथेन्द्रस्य सारथिस्तु हसंतिका ॥६३॥ किरिचक्ररथेन्द्रस्य स्तंभिनी सारथिः स्मृता। दशयोजनमुन्नम्रो ललितारथपुङ्गवः ॥६४॥ सप्तयोजनमुच्छ्रायो गीतचक्ररथोत्तमः। षड्योजनसमुन्नम्रो किरिचक्ररथो मुने ॥६५॥ महामुक्तातपत्रं तु दशयोजनविस्तृतम्। वर्तते ललितेशान्य रथ एव न चान्यतः ॥६६॥ तदेव शक्तिसाम्राज्यसूचकं परिकीर्तितम्। सामान्यमातपत्रं तु रथद्वंद्वोऽपि वर्तते ॥६७॥
२७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अथ सा ललितेशानी सर्वशक्तिमहेश्वरी । महासाम्राज्यपदवीमारूढा परमेश्वरी ॥६८ चचाल भंडदैत्यस्य क्षयसिद्धयभिकांक्षिणी । शब्दयंते दिशः सर्वाः कंपते च वसुन्धरा ॥६६
इनमें वहाँ पर देवता ही उन रथों के सारथि थे ऐसा बताया गया है। जो गेय रथचक्र था उसकी सारथि हसन्तिका थी ।६३। किरिचक्र रथेन्द्र की स्तम्भिनी सारथि कही है। ललिता का उत्तम श्रेष्ठ रथ दश योजन ऊँचा था ।६४। गीतचक्र ह्योत्तम सात योजन उच्छ्राय वाला था। षट् योजन ऊँचा हे मुने ! किरिचक्र रथ था ।६५। महान् मुक्ताओं से विनिर्मित आतपत्र (छत्र) दशयोजन विस्तार वाला था। ललितेशानी का रथ ही ऐसा था और अन्य का नहीं था ।६६। और वह ही शक्ति के साम्राज्य का सूचक कीर्तित किया गया है। सामान्य छत्र तो अन्य दोनों पर भी थे ।६७। वह ललिता ईशानी समस्त शक्तियों की महेश्वरी थी। वह परमेश्वरी महान् साम्राज्य की पदवी पर समारूढ़ थी ।६८। वह भंड दैत्य के क्षय की सिद्धि की अभिकांक्षा वाली वहाँ से चली थी। सभी दिशाएँ उस समय में शब्दायमान हो रही थीं और वसुधा प्रकम्पित हो रही थी ।६६।
क्षुभ्यंति सर्वभूतानि ललितेशाविनिर्गमे । देवदुन्दुभयो नेदुनिपेतुः पुष्पवृष्टयः ॥१०० विश्वावसुप्रभृतयो गन्धर्वाः सुरगायकाः । तुम्बुरुर्नारदश्चैव साक्षादेव सरस्वती ॥१०१ जयमंगलपद्यानि पठंतः पटुगीतिभिः । हर्षसंफुल्लवदनाः स्फुरत्पुलकभूषणाः । मुहुर्जययेत्येवं स्तुवाना ललितेश्वरीम् ॥१०२ हर्षेणाढ्या मदोन्मत्ताः प्रनृत्यंतः पदे पदे । सप्तर्षयो वशिष्ठाद्या ऋग्यजुः सामरूपिभिः ॥१०३ अथर्वरूपैर्मंत्रैश्च वर्धयंतो जयश्रियम् । हविषेव महावह्निशिखामत्यंतपाविनीम् ॥१०४ आशीर्वादेन महता वर्धयामासुरुत्तमाः ।
भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७१
तैः स्तूयमाना ललिता राजमाना रथोत्तमे ॥१०५ भंडासुरं विनिर्जेतुमुद्दण्डैः सह सैनिकैः ॥१०६
जिस समय ईशानी ललिता देवी का विनिर्गम हुआ था उस समय में सभी प्राणी महान क्षुब्ध हो गये थे। देवगण दुन्दुभियां बजाने लगे थे तथा पुष्पों की वर्षा कर रहे थे ॥१००। विश्वावसु प्रभृति गन्धर्वगण जो सुरों के यहाँ गायक थे—तुम्बरु और नारद तथा साक्षात् सरस्वती देवी सब विजय के मंगल पद्यों का बहुत सुन्दर गीतों में पाठ कर रहे थे। सबके हर्ष से मुख खिले हुए थे तथा रोमाञ्चों के भूषण स्फुरित हो रहे थे। सभी बारम्बार जय हो—जय हो—इस प्रकार से ललितेश्वरी का स्तवन कर रहे थे ॥१०१-१०२। सभी कदम कदम पर हर्ष से युक्त और मद से उन्मत्त हो रहे थे तथा नृत्य कर रहे थे। सप्तर्षिगण जिनमें वसिष्ठ आदि महा मुनिगण थे वे ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद और अथर्ववेद के मन्त्रों से जय श्री का वर्णन कर रहे थे। जिस तरह से हवि से महा वह्नि को शिखा अत्यन्त पाविनी होती हैं वैसे ही ये सभी उत्तम ऋषिगण महान आशीर्वाद से वर्धन कर रहे थे। उनके द्वारा इस प्रकार से स्तवन की गयी ललिता उस उत्तम रथ में विराजमान हो रही थीं। वह देवी परम उद्दण्ड सैनिकों के साथ भंडासुर पर विजय प्राप्त करने को रवाना हुई थी ॥१०३-१०६।
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भंडासुर अहंकार वर्णन
आकर्ण्य ललितादेव्या यात्रानिर्गमनिस्वनम् । महान्तं क्षोभमायाता भंडासुरपुरालयाः ॥१ यत्र चास्ति दुराशस्य भंडदैत्यस्य दुर्धियः । महेन्द्रपर्वतोपांते महार्णवतठे पुरम् ॥२ तत्तु शून्यकनाम्नैव विख्यातं भुवनत्रये । विषंगाग्रजदैत्यस्य सदावासः किलाभवत् ॥३ तस्मिन्नेव पुरे तस्य शतयोजनविस्तरे । वित्रैसुरसुराः सर्वे श्रीदेव्यागमसंभ्रमात् ॥४ शतयोजनविस्तीर्णं तत्सर्वं पुरमासुरम् । धूमैरिवावृतमभूदुत्पातजनितैर्मुहुः ॥५
२७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अकाल एव निर्भिन्ना भित्तयो दैत्यपत्तने । घूर्णमाना पतन्ति स्म महोल्का गगनस्थलात् ॥६ उत्पातानां प्राथमिको भूकंपः पर्यवर्तत । मही जज्वल सकला तत्र शून्यकपत्तने ॥७
श्री ललिता देवी की यात्रा के निगम के घोष का श्रवण करके भंडासुर के पुर में निवास करने वाले बड़े भारी क्षोभ को प्राप्त होगये थे ।१। जहाँ पर दुराश और दुष्ट मति वाले भंड का नगर है वह महेन्द्र पर्वत के उपान्त में और महार्णव के तट पर है ।२। वह तो शून्यक के नाम से ही तीनों भुवनों में विख्यात है। वहाँ पर विषंगाग्रज दैत्य का सदा ही आवास हुआ था ।३। सौ योजन के विस्तार वाले उसके उसी पुर में विश्रेयुर सुर सञ्च श्री देवी के आगम के संभ्रम से सौ योजन विस्तीर्ण वह सम्पूर्ण असुरों का पुर बार-बार उत्पातों से समुत्पन्न धूमों से आवृत के ही समान हो गया था ।४-५। अकाल में ही उस दैत्य के नगर में भित्तियाँ निर्भित होगयी थीं। गगन स्थल से घूर्णमान महोल्का गिरा करते थे ।६। उत्पातों का सबसे प्रथम होने वाला भूकम्प हुआ था । वहाँ पर उस शून्यक पत्तन में सम्पूर्ण भूमि ज्वलित हो गयी थी ।७।
अकाल एव हृत्कंपं भेजुर्दैत्यपुरोकसः । ध्वजाग्रवर्तिनः कंकगृध्राश्चैव बकाः खगाः ॥८ आदित्यमंडले दृष्ट्वा दृष्ट्वा चक्रं दुरुच्चकैः । क्रव्यादा बहवस्तत्र लोचनैर्नावलोकिताः ॥९ मुहुराकाशवाणीभिः परुषाभिर्बभाषिरे । सर्वतो दिक्षु दृश्यंते केतवस्तु मलीमसाः ॥१० धूमायमानाः प्रक्षोभजनका दैत्यरक्षसाम् । दैत्यस्त्रीणां च विश्रंशा अकाले भूषणस्रजः ॥११ हाहेति दूरं क्रन्दंत्यः पर्यश्रु समरोदिषुः । दर्पणानां वर्मणां च ध्वजानां खड्गसंपदाम् ॥१२ मणीनामंबराणां च मालिन्यमभवन्मुहुः । सौधेषु चन्द्रशालासु केलिवेश्मसु सर्वतः ॥१३
भंडासुर अहङ्कार वर्णन ] [ २७३
अट्टालकेषु गोष्ठेषु विपणेषु सभासु च। चतुष्किकास्वालिन्देषु प्रग्रीवेषु वलेषु च ॥१४॥
उस दैत्य के पुर में निवास करने वाले लोग अकाल में ही हृदय के कम्प से संयत होगये थे। ध्वजाओं के आगे रहने वाले कंक-गृध्र-वक और पक्षी आदित्य मंडल में देख-देखकर बड़े ऊँचे स्वर से क्रन्दन करने लगे। वहाँ पर बहुत से (क्रव्याद राक्षस) गण थे जो नेत्रों के द्वारा दिखलाई नहीं दिये गये थे ।८-६। बार-बार आकाश वाणियों के द्वारा बोलते थे और सभी ओर दिशाओं में केतु बहुत ही मलिन दिखलाई दे रहे थे ।१०। वे सब घूमा-यमान हो रहे थे और दैत्यों तथा राक्षसों के हृदयों में बड़े भारी क्षोभ को उत्पन्न करने वाले थे। और असमय में ही दैत्यों की स्त्रियों के भूषण और मालाएं भ्रष्ट होकर गिर रहे थे ।११। हा-हा-ध्वनि करके अश्रुपात करती हुई रुदन की ध्वनि में सब रो रही थीं। वहाँ पर दर्पण-वर्म-ध्वजा-खंग और सम्पदाएं एवं मणि तथा वस्त्रों में बार-बार मलिनता हो गयी थी। सौधों में-चन्द्र शालाओं में और सभी ओर केलि करने के गृहों में महान् भीषण घोष सुनाई दिया करता था ।१२-१३। अट्टालिकाओं में—गोष्ठों में—विपणों में और सभा भवनों में—चतुष्किकाओं में-अलिन्दों में-प्रग्रीवों में और वलों में सर्वत्र महान् अशुभ एव कठोर घोष सुनाई देता था ।१४।
सर्वतोभद्रवासिषु नन्द्यावर्तेषु वेश्मसु । विच्छिद्रकेषु संक्षुब्धेष्ववरोधनपालिषु । स्वस्तिकेपु च सर्वेषु गर्भाङ्गारपुटेषु च ॥१५॥
गोपुरेषु कपाटेपु वलभीनां च सीमसु । वातायनेषु कक्ष्यासु धिष्ण्येषु च खलेषु च ॥१६॥
सर्वत्र दैत्यनगरवासिमर्जनमंडलैः । अश्रूयन्त महाघोषाः परुषा भूतभाषिताः ॥१७॥
शिथिली सर्वतो जाता घोररूपा भयानका । करटैः कटुकालापैरवलोकि दिवाकरः । आराविषु करोटीनां कोट्यश्चापतन्भुवि ॥१८॥
२७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अपतन्वेदिमध्येषु बिंदवः शोणितांभसाम् ।
केशौघकाश्च निष्पेतुः सर्वतो धूमधूसराः ॥१६
भौमांतरिक्ष दिव्यानामुत्पातानामिति व्रजम् ।
अवलोक्य भृशं त्रस्ताः सर्वे नगरवासिनः ।
निवेदयामासुरमी भंडाय प्रथितौजसे ॥२०
स च भंडः प्रचंडोत्थैस्तैरुत्पातकदंबकैः ।
असंजातधृतिभ्रंशो मन्त्रस्थानमुपागमत् ॥२१
सर्वतोभद्रवासों में—नन्द्यावर्त्तों—घरों में—विच्छन्दकों में और अव-
रोधन पालियों ये सर्वत्र विक्षोभ हो रहा था । स्वस्तिकों में और समस्त
गर्भागार पुरों में—गो पुरों में—कपाटों में और वलभियों की सीमाओं में-
वातायनों में—कक्ष्याओं में और खलों में-सभी जगह दैत्यों के नगर में
निवासी जनों के मण्डलों के द्वारा भूतों द्वारा कहे हुए परम कठोर महान्
घोष सुनाई दे रहे थे । १५-१७। शिथिली भूत होते हुए घोरवर्ण और भया-
नक हो गये थे तथा कटु आलाप वाले करटों के द्वारा दिवाकर देखा गया
था । आरात्रियों में करोटियों की कोटियां भूमि में गिर गई थी ।१८।
वेदियों के मध्य में शोणित मिश्रित जल की बिन्दुएं गिर रहीं थीं और
केशौधक सभी ओर धूम से धूसर होकर गिर गये थे ।१६। भूमि में होने
वाले-अन्तरिक्ष में और दिवलोक में होने वाले उत्पातों के समुदायों को
देखकर सभी नगर के निवासीजन अत्यधिक भयभीत हो गये थे । इन सभी
ने परम प्रसिद्ध ओज वाले भण्डासुर से इस दृश्यमान भीषणता के विषय में
निवेदन किया था ।२०। और वह भण्डासुर को इन परम प्रचण्ड उत्पातों के
समुदायों से भी धीरज का भ्रंश नहीं हुआ था और वह मन्त्र स्थान को
सम्प्राप्त हो गया था ।२१।
मेरोरिव वपुर्भेदं बहुरत्नविचित्रितम् ।
अध्यासामास दैत्येंद्रः सिंहासनमनुत्तमम् ॥२२
स्फुरन्मुकुटलग्नानां रत्नानां किरणैर्घनै ।
दीपयन्नखिलाशान्तानद्युतद्दानवेश्वरः ॥२३
एकयोजनविस्तारे महत्यास्थानमंडपे ।
तुंगसिंहासनस्थं तं सिषेवाते तदानुजौ ॥२४
भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७५
विशुक्रश्च विषंगश्च महाबलपराक्रमौ ।
त्रैलोक्यकंटकीभूतभुजदंडभयंकरौ ॥२५
अग्रजस्य सदैवार्ज्ञामविलंघ्य मुहुर्मुहुः ।
त्रैलोक्यविजये लब्धं वर्धयंतौ महद्यशः ॥२६
न तेन शिरसा तस्य मृद्नंतौ पादपीठिकाम् ।
कृतांजलिप्रणामौ च समुपाविशतां भुवि ॥२७
अथास्थाने स्थिते तस्मिन्नमरद्वेषिणां वरे ।
सर्वे सामंतदैत्येन्द्रास्तं द्रष्टुं समुपागताः ॥२८
वहाँ पर मेरु पर्वत के समान वपु वाले तथा बहुत से रत्नों से चित्रित अत्युत्तम सिंहासन पर दैत्येन्द्र संस्थित हो गया था।२२। वह दानवेश्वर स्फुरित मुकुटों में लगे हुए रत्नों की किरणों से सब दिशाओं को दीपित करता हुआ वहाँ पर समवस्थित हुआ था।२३। उस समय में उसके दो अनुजों के द्वारा वह सेवित हुआ था। वह आस्थान मण्डप महान् था तथा एक योजन के विस्तार से युक्त था। वहाँ पर एक बहुत ही ऊँचा सिंहासन था जिस पर यह दानवेन्द्र विराज मान हुआ था।२४। विशुक्र और विषंग ये दोनों इसके छोटे भाई बड़े ही अधिक बल और पराक्रम वाले थे और ये दोनों तीनों लोकों के लिये कण्डक के ही समान भुजदण्ड वाले तथा भयङ्कर थे।२५। ये दोनों ही अपने बड़े भाई की आज्ञा का कभी उल्लंघन नहीं किया करते थे और उन्होंने त्रैलोक्य के विजय करने में महान् यश प्राप्त किया था ।२६। उन्होंने अपने शिर को झुकाकर उसकी पाद पीठिका को प्रणाम किया था और अपने दोनों करों को जोड़कर ये भूमि में बैठ गये थे।२७। इसके अनन्तर जब वह सुरों का महान् शत्रु उस आस्थान मण्डप में समवस्थित हो गया था तो उसका दर्शन करने के लिए उस समय में समस्त सामन्त दैत्यों के साथ वहाँ पर समुपस्थित हो गये थे।२८।
तेषामेकैकसैन्यानां गणना न हि विद्यते ।
स्वं स्वं नाम समुच्चार्य प्रणेमुर्भण्डकेश्वरम् ॥२९
स च तानसुरान्सर्वानतिधीरकनीनकः ।
संभावयन्समालोकैः कियंतं चित्क्षणं स्थितः ॥३०
२७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अवोचत विशुक्रस्तमग्रजं दानवेश्वरम् ।
मथ्यमानमहासिन्धुसमानार्गलनिस्वनः ॥३१
देव त्वदीयदोर्द्दण्डविध्वस्तबलविक्रमाः ।
पापिनः पामराचारा दुरात्मानः सुराधमाः ॥३२
शरण्यमन्यतः क्वापि नाप्नुवन्तो विषादिनः ।
ज्वलज्ज्वालाकुले वह्नौ पतित्वा नाशमागताः ॥३३
तस्माद्दे वात्समुत्पन्ना काचित्स्त्री बलगर्विता ।
स्वयमेव किलाश्नांक्षुस्तां देवा वासवादयः ॥३४
तैः पुनः प्रबलोत्साहैः प्रोत्साहितपराक्रमाः ।
बहुस्त्रीपरिवाराश्च विविधायुधमण्डिताः ॥३५
उन एक-एक की इतनी अधिक सेना थी जिसकी कोई गणना नहीं है । उनमें सबने अपने-अपने नाम का उच्चारण करके उस भण्डकेश्वर के लिये प्रणिपात किया था ।२६। उस दैत्येश्वर ने अत्यन्त धैर्ययुक्त नेत्रों से उन समस्त असुरों का समादर करते हुए कुछ क्षण तक चुप वह शान्त रहा था । फिर अग्रज दानवेश्वरों से विशुक्र बोला था - उस समय में उसका स्वर मथ्यमान सिन्धु के समान था ।३०-३१। हे देव ! आपकी भुजाओं से जिनका बल और विक्रम विध्वस्त हो गया है वे पापी, पामर आचरण वाले दुष्ट आत्मा अधम सुरगण विषाद युक्त होकर अन्य कहीं पर भी शरण को प्राप्त नहीं हुए थे । तथा जलती हुई ज्वालाओं से समाकुल वह्नि में गिर कर विनाश को प्राप्त हो गये थे ।३२-३३। उस देव से समुत्पन्न कोई स्त्री है जो अपने बल के अत्यधिक गर्व वाली है । वासव आदिक समस्त देवगण स्वयं ही उसकी शरण में गये हैं ।३४। उन्हीं के द्वारा जिन को परम प्रबल उत्साह हो रहा है उनके पराक्रम को प्रोत्साहन दिया है। उसके साथ बहुत सी स्त्रियों के परिवार भी विद्यमान हैं और वे सब अनेक प्रकार के आयुधों से भूषित हैं ।३५।
अस्माञ्जेतुं किलायांति हा कष्टं विधिवैशसम् ।
अबलानां समूहश्चेद्वलिनोऽस्मान्विजेष्यते ॥३६
तर्हि पल्लवभंगेन पाषाणस्य विदारणम् ।
ऊह्यमानमिदं हंतु परिहासाय कल्प्यते ॥३७