संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नीलांजनाचलप्रख्यो विकटोन्नतपृष्ठभूः ॥४१ महानीलगिरिश्रेष्ठगरिष्ठस्कन्धमंडलः । प्रभूतोष्मलनिश्वासप्रसराकंपितांबुधिः ॥४२
परम प्रकृष्ट बाहुओं की प्रकांड ऊष्मा में करोड़ों दानव हृत हो रहे थे। ऐसी ये देवियां अहर्निश दण्डनाथा श्री ललिता देवी की सेवा किया करती हैं। उनकी आख्या तो परम विख्यात है। हे कुम्भज ! उसका आप श्रवण कीजिए। वार्त्ताली—वाराही—बाराह मुखी—अन्धिनी—जृम्भिणी—मोहिनी—स्तम्भिनी—ये हैं जो शत्रुओं के क्षोभ और स्तम्भन तथा उच्चाटन करने में परम समर्थ है ।३६-३८। इनकी संस्थिति पर्व के वाम भाग में निरन्तर रहा करती है। उस दंडनाथा का उप वाह्य कासर हैं जिसको धूसर आकृति हैं ।३६। यह आधे कोश के बराबर आयत है। इसके दो सींग है और एक कोश के बराबर विग्रह वाला है। इसके जो केश हैं वे खड्ग के समान कठोर हैं जिनसे इसका कलेवर ढका हुआ है ।४०। कालदंड के तुल्य उच्छंड बालों के कांड से बड़ा ही भयंकर है। यह नीले आंजन के पर्वत के समान परम विकट और उन्नत पृष्ठ भू वाला है ।४१। महानील गिरि के समान गरिष्ठ एवं श्रेष्ठ स्कन्धों के मंडल वाला है। प्रभूत ऊष्मा से युक्त निःश्वास के प्रसार से सागर को भी प्रकम्पित करने वाला है ।४२।
घर्घरध्वनिना कालमहिषं विहसन्निव । वर्त्तते खुरविक्षिप्तपुष्कलावर्तवारिदः ॥४३ तस्यैव पर्वणोऽधस्ताच्चित्रस्थानकृतालयाः । इन्द्रादयोऽनेकभेदा दिशामष्टकदेवताः ॥४४ ललितायां कार्यसिद्धिं विज्ञापयितुमागताः । इन्द्रश्चाप्सरसश्चैव स चतुष्षष्टिकोटयः ॥४५ सिद्धाअग्निश्च साध्याश्च विश्वेदेवास्तथापरे । विश्वकर्मा मयश्चैव मातरश्च बलोन्नताः ॥४६ रुद्राश्च परिचाराश्च रुद्राश्चैव पिशाचकाः । क्रन्दंति रक्षसां नाथा राक्षसा बहवस्तथा ॥४७ मित्राश्च तत्र गन्धर्वाः सदा गानविशारदाः ।