संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६३
विश्वावसुप्रभृतयो विख्यातास्तत्पुरोगमाः ॥४८॥ तथा भूतगणाश्चान्ये वरुणो वासवः परे । विद्याधराः किन्नराश्च मारुतेश्वर एव च ॥४९॥
इसकी ध्वनि घर्घराहट कालरूपी महिष का भी उपहास सा कर रही थी । इसके खुरों के निक्षेप से पुष्कल आवर्त्त वारिद हो गये थे ॥४३॥ उसके ही पर्व के नीचे की ओर चित्रालयों में संस्थिति करने वाले इन्द्र आदि अनेक भेदों वाले दिशाओं के आठ देवता थे ॥४४॥ ये सब ललिता में कार्यों की सिद्धि के ही विज्ञापन करने के लिये वहाँ पर समागत हुए थे । इन्द्र और अप्सराएँ सब चौंसठ करोड़ थे ॥४५॥ सिद्ध-अग्नि-साध्य-विश्वे-देवा-विश्वकर्मा-भय-बलोन्नत मातृगण--रुद्र-परिचार--रुद्र--पिशाच-राक्षसों के नाम तथा बहुत राक्षस क्रन्दन करते हैं ॥४६-४७॥ वहाँ पर मित्र-गन्धर्व सदा ही गान करने में परायण थे । विश्वावसु आदि सब जो विख्यात हैं उसके आगे गमन करने वाले थे ॥४८॥ उसी भाँति से भूतगण—अन्य थे तथा वरुण और वासव—विद्याधर—किन्नरगण और मारुतेश्वर थे जो आगे-आगे गमन कर रहे थे ॥४९॥
तथा चित्ररथश्चैव रथकारककारकाः । तुंबुरुर्नारदो यक्षः सोमो यक्षेश्वरस्तथा ॥५०॥ देवैश्च भगवांस्तत्र गोविंदः कमलापतिः । ईशानश्च जगच्चक्रभक्षकः शूलभीषणः ॥५१॥ ब्रह्मा चवाश्विनीपुत्रौ वैद्यविद्याविशारदौ । धन्वन्तरिश्च भगवान्थान्थे गणनायकाः ॥५२॥ कटकाण्डगलद्दान संतर्पितमधुव्रताः । अनंतो वासुकिस्तक्षः कर्कोटः पद्म एव च ॥५३॥ महापद्मः शंखपालो गुलिकः सुबलस्तथा । एते नागेश्वराश्चैव नागकोटिभिरावृताः ॥५४॥ एवंप्रकारा बहवो देवतास्तेत्र जाग्रति । पूर्वादिदिशमारभ्य परितः कृतमंदिराः ॥५५॥