संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तत्रैव देवताश्चक्रे चक्राकारा मरुद्दिशः । आश्रित्य किल वर्तंते तदधिष्ठातृदेवताः ॥५६॥ उसी भाँति से चित्ररथ—रथकारक—तुम्बरु—नारद—यज्ञ—सोम— यज्ञेश्वर—समस्त देवगणों के सहित कमला के स्वामी भगवान् गोविन्द— जगत् चक्र के भक्षण करने वाले भीषण शूलपाणि ईशान—ब्रह्मा—अश्विनी कुमार जो कि वैद्य के विशारद थे—भगवान् धन्वन्तरि और अन्य गणों के नायक भो पुरोगामी थे ।५०-५२। इनके कटस्थलों से जो मद गिर रहा था उस पर भ्रमर झूम रहे थे । अनन्त—वासुकि—तक्षक—कर्कोट—पद्म— महापद्म—शंखपाल—गुलिक—सुबल—ये सब नागेश्वर थे जो करोड़ों नागों से समावृत होते हुए पुरोगमन कर रहे थे ।५३-५४। इस प्रकार वाले बहुत—से देवगण जाग्रत हो रहे थे । और पूर्व आदि दिशाओं से समारम्भ करके चारों ओर अपना निवास स्थल बनाये हुए थे ।५५। वहीं पर देवताओं ने मरुत् दिशा को चक्राकार कर दिया था । और उस दिशा का समाश्रवण करके वे सब अधिष्ठान देवता हो रहे थे ।५६। जृम्भिणी स्तंभिनी चैव मोहिनी तिस्र एव च । तस्यैव पर्वणः प्रांते किरिचक्रस्य भास्वतः ॥५७ कपालं च गदां बिभ्रदूर्ध्वकेशो महावपुः । पातालतलजंबालबहुलाकारकालिमा ॥५८ अट्टहासमहावज्रदीर्णब्रह्मांडमण्डलः । भिन्दन्डमरुकध्वानै रोदसीकन्दरोदरम् ॥५९ फूत्कारीत्रिपुरायुक्तं फणिपाशं करे वहन् । क्षेत्रपालः सदा भाति सेवमानः किटीश्वरीम् ॥६० तस्यैव च समीपस्थस्तस्या वाहनकेसरी । यमारुह्य प्रवृत्ते भंडासुरवधैषिणी ॥६१ प्रागुक्तमेव देवेशीवाहसिंहस्य लक्षणम् । तस्यैव पर्वणोऽधस्ताद्दण्डनाथसमत्विषः ॥६२ दंदिनीसदृशाशेषभूषणायुधमंडिताः । शम्याः क्रोडाननाश्चंद्ररेखोत्तंसितकुन्तलाः ॥६३