भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 675

किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६५

जृम्भिणी—स्तम्भिनी—मोहिनी ये तीनों ही उसी पर्व के प्रान्त में जो कि भासुर किरि चक्र रथ था, विद्यमान थे ॥५७॥ अब क्षेत्र पाल के स्वरूप का वर्णन किया जाता है—क्षेत्रपाल कपाल और गदा को करों में धारण किये हुए है—इसके केश ऊपर की ओर उठे हुए हैं तथा इसका वपु महान् है। पाताल तल में जो जम्बाल है उसके समान आकार वाली इसमें कालिमया है ॥५८॥ इसका अट्टहास वज्र के ही तुल्य है जिससे पूर्ण ब्रह्मांड मंडल विदीर्ण हो जाता है। यह अपने डमरू के घोषों से रोदसी की कन्द-राओं के उदर को भेद रहा है ॥५६॥ फूत्कार (फुसकार) करने वाली त्रिपुरा से युक्त नागों के पाश को कर में वहन कर रहा था। ऐसा क्षेत्रपाल किटीश्वरी की सेवा करता हुआ सदा ही शोभित होता है ॥६०॥ उसके ही समीप में स्थित उसका वाहन केसरी था जिस पर समारोहण करके भंडासुर के वध की इच्छा वाली प्रवृत्त हुई थी ॥६१॥ देवी के वाहन सिंह का लक्षण तो पूर्व में ही कह दिया गया है। उसी पर्व के नीचे दंडनाथा के समान ही कान्ति वाली सहस्रों अन्य देवियाँ तथा देवता थे ॥६२॥ ये सभी दंडनाथा के ही तुल्य समस्त भूषणों और आयुधों से मंडित थे। ये शम्या-क्रोडानना-चन्द्ररेखा और उत्तंसित कुन्तला थीं ॥६३॥

हलं च मुसलं हस्ते घूर्णयंत्यो मुहुर्मुहुः । ललिताद्रोहिणां श्यामाद्रोहिणां स्वामिनीद्रुहाम् ॥६४॥ रक्तस्रोतोभिरुत्कूलैः पूरयंत्यः कपालकम् । निजभक्तद्रोहकृतां मन्त्रमालाविभूषणाः ॥६५॥ स्वगोष्ठीसमयाक्षेपकारिणां मुण्डमंडलैः । अखण्डरक्तविच्छेदैर्बिभ्रत्यो वक्षसि स्रजः ॥६६॥ सहस्रं देवताः प्रोक्ताः सेवमानाः किटीश्वरीम् ॥६७॥ तासां नामानि सर्वासां दंडिन्याः कुम्भसंभव । सहस्रनामाध्याये तु वक्ष्यते नाधुना पुनः ॥६८॥ अथ तासां देवतानां कोलास्यानां समीपतः । वाहनं कृष्णसारंगो दंडिन्याः समये स्थितः ॥६९॥ क्रोशाधार्द्धायतः शृंगे तदर्धायतौ मुखे । क्रोशप्रमाणपादश्च सदा चोद्धृतवालधिः ॥७०॥