संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इसके कर में हल और मुसल था तथा ये बार-बार घूर्णन कर रही थीं जो भी ललिता देवी के द्रोही—श्यामा के द्रोही और स्वामिनी के साथ द्रोह करने वाले थे उन्हीं को घूर रहीं थीं ।६४। उमड़े हुए रक्त के स्रोतों से कपालों को भर रहीं थीं । इनके भूषण अपने भक्तों के साथ द्रोह करने वालों की मन्त्रों की मालाएं ही थे ।६५। अपनी गोष्ठी के समय पर आक्षेप करने वालों के मुख मंडलों अर्थात् मुंडों से जिनसे रक्त स्राव हो रहा है अपने उरःस्थल पर मालाएँ धारण कर रहीं थीं ।६६। ऐसे उस किटीश्वरी की सेवा करते हुए सहस्रों ही देवता बताये गये हैं ।६७। हे कुम्भ सम्भव ! दंडिनी की उनके सबके नाम सहस्र नामाध्याय में कहेंगे अतः अब फिर नहीं कहते हैं ।६८। कोलास्य उन देवताओं के समीप में ही कृष्ण सारंग वाहन दंडिनी के समय में स्थित था । यह आधे कोश तक तो आयत था शृंग में और उससे आधा आयत मुख में था और एक कोश के प्रमाण वाले पाद थे और उसकी पूँछ तो सदा ही उद्धत रहा करती थी ।६६-७०।
उदरे धवलच्छायो हुंकारेण महीयसा ।
हसन्मारुतवाहस्य हरिणस्य पराक्रमम् ॥७१
तस्यैव पर्वणो देशे वर्त्तते वाहनोत्तमम् ।
किरिचक्ररथेन्द्रस्य स्थितस्तत्रैव पर्वणि ॥७२
वर्त्तते मदिरासिंधुर्देवतारूपमास्थिता ।
माणिक्यगिरिवच्छोणं हस्ते पिशितपिण्डकम् ॥७३
दधाना घूर्णमानाक्षी हेमांभोजस्रगावृता ।
मदशक्यचा समाश्लिष्टा धृतरक्तसरोजया ॥७४
यदा यदा भंडदैत्यः संग्रामे संप्रवर्तते ।
युद्धस्वेदमनुप्राप्ताः शक्तयः स्युः पिपासिताः ॥७५
तदा तदा सुरासिंधुरात्मानं बहुधा क्षिपन् ।
रणे खेदं देवतानामंजसापाकरिष्यति ॥७६
तदप्यद्भुतमे वर्षे भविष्यति न संशयः ।
तदा श्रोष्यसि संग्रामे कथ्यमानं मया मुदा ॥७७