भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 677

किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६७

महान् हुङ्कार से उसके उदर में धवल कान्ति होती थी। हंसते मारुत के वाहन हरिण का पराक्रम था ।७१। उसी पर्व के भाग में वह उत्तम वाहन रहता है जिस पर्व में किरिचक्र रथेन्द्र की स्थिति थी ।७२। वहाँ पर मदिरा का सिन्धु भी एक देवता के स्वरूप में समास्थित होकर विद्यमान था। जो माणिक्य के समान शोण था तथा उसके हाथ में मांस का एक ढेला ।७३। उसकी आँखें विशेष घूर्णित थीं सुनहरी कमल के सदृश रुधिर से समावृत थीं। रक्त सरोज धारण करने वाली के द्वारा यह की शक्ति से समाश्लिष्ट थी ।७४। जब-जब भंड दैत्य संग्राम में प्रवृत्त होता है। युद्ध के स्वेद को अनुप्राप्त शक्तियाँ पिपासित हो जाती हैं ।७५। उसी-उसी समय में सुरा का सागर बहुधा अपने आपको क्षित करता हुआ देवों के रण के खेद को तुरन्त ही दूर कर देता है ।७६। वह भी अद्भुतम वर्ष में होगा— इसमें कुछ भी संशय नहीं है। उस समय में मेरे द्वारा कहा जाने वाला संग्राम में बड़े ही आनन्द से तुम श्रवण करोगे ।७७।

तस्यैव पर्वणोऽधस्तादष्टदिक्ष्वध एव हि ।
उपर्यपि कृतावासा हेतुकाद्या दश स्मृताः ॥७८

महान्तो भैरवश्रेष्ठाः ख्याता विपुलविक्रमाः ।
उद्दीप्तायुततेजोभिर्दिवा दीपितभानवः ॥७९

कल्पांतकाले दंडिन्या आज्ञया विश्वघस्मराः ।
अत्युदग्रप्रकृतयो रददष्टौष्ठसंपुटाः ॥८०

त्रिशूलाग्रविनिर्भिन्नमहावारिदमंडलाः ।
हेतुकस्त्रिपुरारिश्च तृतीयश्चाग्निभैरवः ॥८१

यमजिह्वैकपादौ च तथा कालकरालकौ ।
भीमरूपो हाटके शस्तथैवाचलनामवान् ॥८२

एते दशैव विख्याता दशकोटिभटान्विताः ।
तस्यैव किरिचक्रस्य वर्तंते पर्वसीमनि ॥८३

एवं हि दंडनाथायाः किरिचक्रस्य देवताः ।
जृंभिण्याद्यचलेंद्रांताः प्रोक्तास्त्रैलोक्यपावनाः ॥८४

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