भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६८ ] [ ब्रह्माण्डपुराण

उस ही पर्व के नीचे आठों दिशाओं में नीचे ही ऊपर-ऊपर आवास करने वाले हेतुक आदि दश कहे गये हैं ॥७८॥ विपुल विक्रम से समन्वित महान् भैरव ख्यात हैं, सहस्रों तेजों से ये उद्दीप्त हैं जैसे दिन में दीपित सूर्य होवें ॥७९॥ कल्प के अन्त समय में दंडिनी देवी की आज्ञा से तृप्त सम्पूर्ण विश्व के विनाशक जिनकी अत्यन्त उदग्र स्वभाव हैं और जो अपने दांतों और होठों को पीसने वाले हैं ॥८०॥ ये त्रिशूलों के अग्रभाग से महान् मेघों के मंडल को भी निर्भिन्न कर रहे हैं—एक हेतुक है, त्रिपुरारि हैं और तीसरा अग्निभैरव है ॥८१॥ यम जिह्वा और एक पाद हैं और काल के ही समान कराल हैं। भीम स्वरूप से युक्त तथा हाटकेश हैं और उसी अचल के नाम वाला है ॥८२॥ ये केवल दश ही विख्यात हैं जो कि दश करोड़ भटों से संयुत हैं। उसी किरिचक्र के पर्व की सीमा में रहा करते हैं ॥८३॥ इस रीति से उस दंडनाथा के किरिचक्र के देवता हैं। जृम्भिणी से आदि लेकर अचलेन्द्र के अन्त तक हैं—ऐसे कहे गये हैं जो त्रैलोक्य के पावन हैं ॥८४॥

तत्रत्यैर्देवताबृन्दैर्बहवस्तत्र संगरे ।
दानवा मारयिष्यंते पास्यंते रक्तवृष्टयः ॥८५॥
इत्थं बहुविधत्राणं पर्वस्थैर्देवतागणैः ।
किरिचक्रं दंडनेत्र्या रथरत्नं चचाल ह ॥८६॥
चक्रराजरथो यत्र तत्र गेयरथोत्तमः ।
यत्र गेयरथस्तत्र किरिचक्ररथोत्तमः ॥८७॥
एतद्रथत्रयं तत्र त्रैलोक्यमिव जंगमम् ।
शक्तिसेनासहस्रस्यांतश्चचार तदा शुभम् ॥८८॥
मेरुमन्दरविंध्यानां समवाय इवाभवत् ।
महाघोषः प्रवृते शक्तीनां सैन्यमंडले ।
चचाल वसुधा सर्वा तच्चक्ररवदारिता ॥८९॥
ललिता चक्रराजाख्यो रथनाथस्य कीर्तिताः ।
षट्सारथय उद्दण्डपाशग्रहणकोविदाः ॥९०॥
यत्र गेयरथस्तत्र किरिचक्ररथोत्तमम् ।
इति देवी प्रथमतस्तथा त्रिपुरभैरवी ॥९१॥