भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 679, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 679

किरिचक्ररथदेवता प्रकाशन ] ॥ २६६

संहारभैरवश्चान्यो रक्तयोगिनिवल्लभः। सारसः पंचमश्चैव चामुण्डा च तथा परा ॥६२॥

उस संग्राम में वहाँ के देवताओं के समूहों के द्वारा बहुत से दानव मारे जायेंगे और रुधिर की वृष्टि का पान किया जायगा ॥५५॥ इस प्रकार से पर्व में स्थित देवताओं के गणों के द्वारा बहुत तरह का परित्राण होगा तथा दंड नेत्री किरिचक्र चला था। ५६। जहाँ पर चक्र राज रथ था वहाँ पर ही गेय रथोत्तम था और जहाँ जहाँ पर गेय रथोत्तम था वहाँ पर ही किरिचक्र रथोत्तम था ॥५७॥ इन प्रकार से वहाँ पर तीन रथ थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों त्रैलोक्य ही जंगम है। इसके अन्दर सहस्रों शक्ति सेनाओं का शुभ संचार उस समय में हो रहा था। ५८। ऐसा मालूम होता था मानों मेरु मन्दर और विन्ध्य पर्वतों का समवाय ही हो गया होवे। उस शक्तियों के सैन्य मंडल में उस समय में महान घोष प्रवृत्त हो गया था। उस समय में उन रथों के चक्रों की ध्वनि से सम्पूर्ण वसुधा हिल गयी थी ॥५९॥ रथवाक की चक्रराज नाम वाली ललिता ही कीर्तित की गयी है। उनमें छै सारथि थे जो उद्दण्ड पाशों के ग्रहण में बड़े कोविद थे ॥६०। जहाँ पर ही गेय रथ था वहाँ-वहाँ पर किरिचक्र उत्तम रथ था। प्रथम तो देवी थी फिर उसी भाँति त्रिपुर भैरवी थी ॥६१॥ और अन्य संहार भैरव था जो रक्त योगिनी का वल्लभ था। सारस पाँचवाँ था तथा अपरा चामुण्डा थी ॥६२॥

एतासु देवतास्तत्र रथसारथयः स्मृताः। गेयचक्ररथेन्द्रस्य सारथिस्तु हसंतिका ॥६३॥ किरिचक्ररथेन्द्रस्य स्तंभिनी सारथिः स्मृता। दशयोजनमुन्नम्रो ललितारथपुङ्गवः ॥६४॥ सप्तयोजनमुच्छ्रायो गीतचक्ररथोत्तमः। षड्योजनसमुन्नम्रो किरिचक्ररथो मुने ॥६५॥ महामुक्तातपत्रं तु दशयोजनविस्तृतम्। वर्तते ललितेशान्य रथ एव न चान्यतः ॥६६॥ तदेव शक्तिसाम्राज्यसूचकं परिकीर्तितम्। सामान्यमातपत्रं तु रथद्वंद्वोऽपि वर्तते ॥६७॥