भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

२६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्रैव देवताश्चक्रे चक्राकारा मरुद्दिशः । आश्रित्य किल वर्तंते तदधिष्ठातृदेवताः ॥५६॥ उसी भाँति से चित्ररथ—रथकारक—तुम्बरु—नारद—यज्ञ—सोम— यज्ञेश्वर—समस्त देवगणों के सहित कमला के स्वामी भगवान् गोविन्द— जगत् चक्र के भक्षण करने वाले भीषण शूलपाणि ईशान—ब्रह्मा—अश्विनी कुमार जो कि वैद्य के विशारद थे—भगवान् धन्वन्तरि और अन्य गणों के नायक भो पुरोगामी थे ।५०-५२। इनके कटस्थलों से जो मद गिर रहा था उस पर भ्रमर झूम रहे थे । अनन्त—वासुकि—तक्षक—कर्कोट—पद्म— महापद्म—शंखपाल—गुलिक—सुबल—ये सब नागेश्वर थे जो करोड़ों नागों से समावृत होते हुए पुरोगमन कर रहे थे ।५३-५४। इस प्रकार वाले बहुत—से देवगण जाग्रत हो रहे थे । और पूर्व आदि दिशाओं से समारम्भ करके चारों ओर अपना निवास स्थल बनाये हुए थे ।५५। वहीं पर देवताओं ने मरुत् दिशा को चक्राकार कर दिया था । और उस दिशा का समाश्रवण करके वे सब अधिष्ठान देवता हो रहे थे ।५६। जृम्भिणी स्तंभिनी चैव मोहिनी तिस्र एव च । तस्यैव पर्वणः प्रांते किरिचक्रस्य भास्वतः ॥५७ कपालं च गदां बिभ्रदूर्ध्वकेशो महावपुः । पातालतलजंबालबहुलाकारकालिमा ॥५८ अट्टहासमहावज्रदीर्णब्रह्मांडमण्डलः । भिन्दन्डमरुकध्वानै रोदसीकन्दरोदरम् ॥५९ फूत्कारीत्रिपुरायुक्तं फणिपाशं करे वहन् । क्षेत्रपालः सदा भाति सेवमानः किटीश्वरीम् ॥६० तस्यैव च समीपस्थस्तस्या वाहनकेसरी । यमारुह्य प्रवृत्ते भंडासुरवधैषिणी ॥६१ प्रागुक्तमेव देवेशीवाहसिंहस्य लक्षणम् । तस्यैव पर्वणोऽधस्ताद्दण्डनाथसमत्विषः ॥६२ दंदिनीसदृशाशेषभूषणायुधमंडिताः । शम्याः क्रोडाननाश्चंद्ररेखोत्तंसितकुन्तलाः ॥६३

किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६५

जृम्भिणी—स्तम्भिनी—मोहिनी ये तीनों ही उसी पर्व के प्रान्त में जो कि भासुर किरि चक्र रथ था, विद्यमान थे ॥५७॥ अब क्षेत्र पाल के स्वरूप का वर्णन किया जाता है—क्षेत्रपाल कपाल और गदा को करों में धारण किये हुए है—इसके केश ऊपर की ओर उठे हुए हैं तथा इसका वपु महान् है। पाताल तल में जो जम्बाल है उसके समान आकार वाली इसमें कालिमया है ॥५८॥ इसका अट्टहास वज्र के ही तुल्य है जिससे पूर्ण ब्रह्मांड मंडल विदीर्ण हो जाता है। यह अपने डमरू के घोषों से रोदसी की कन्द-राओं के उदर को भेद रहा है ॥५६॥ फूत्कार (फुसकार) करने वाली त्रिपुरा से युक्त नागों के पाश को कर में वहन कर रहा था। ऐसा क्षेत्रपाल किटीश्वरी की सेवा करता हुआ सदा ही शोभित होता है ॥६०॥ उसके ही समीप में स्थित उसका वाहन केसरी था जिस पर समारोहण करके भंडासुर के वध की इच्छा वाली प्रवृत्त हुई थी ॥६१॥ देवी के वाहन सिंह का लक्षण तो पूर्व में ही कह दिया गया है। उसी पर्व के नीचे दंडनाथा के समान ही कान्ति वाली सहस्रों अन्य देवियाँ तथा देवता थे ॥६२॥ ये सभी दंडनाथा के ही तुल्य समस्त भूषणों और आयुधों से मंडित थे। ये शम्या-क्रोडानना-चन्द्ररेखा और उत्तंसित कुन्तला थीं ॥६३॥

हलं च मुसलं हस्ते घूर्णयंत्यो मुहुर्मुहुः । ललिताद्रोहिणां श्यामाद्रोहिणां स्वामिनीद्रुहाम् ॥६४॥ रक्तस्रोतोभिरुत्कूलैः पूरयंत्यः कपालकम् । निजभक्तद्रोहकृतां मन्त्रमालाविभूषणाः ॥६५॥ स्वगोष्ठीसमयाक्षेपकारिणां मुण्डमंडलैः । अखण्डरक्तविच्छेदैर्बिभ्रत्यो वक्षसि स्रजः ॥६६॥ सहस्रं देवताः प्रोक्ताः सेवमानाः किटीश्वरीम् ॥६७॥ तासां नामानि सर्वासां दंडिन्याः कुम्भसंभव । सहस्रनामाध्याये तु वक्ष्यते नाधुना पुनः ॥६८॥ अथ तासां देवतानां कोलास्यानां समीपतः । वाहनं कृष्णसारंगो दंडिन्याः समये स्थितः ॥६९॥ क्रोशाधार्द्धायतः शृंगे तदर्धायतौ मुखे । क्रोशप्रमाणपादश्च सदा चोद्धृतवालधिः ॥७०॥

२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

इसके कर में हल और मुसल था तथा ये बार-बार घूर्णन कर रही थीं जो भी ललिता देवी के द्रोही—श्यामा के द्रोही और स्वामिनी के साथ द्रोह करने वाले थे उन्हीं को घूर रहीं थीं ।६४। उमड़े हुए रक्त के स्रोतों से कपालों को भर रहीं थीं । इनके भूषण अपने भक्तों के साथ द्रोह करने वालों की मन्त्रों की मालाएं ही थे ।६५। अपनी गोष्ठी के समय पर आक्षेप करने वालों के मुख मंडलों अर्थात् मुंडों से जिनसे रक्त स्राव हो रहा है अपने उरःस्थल पर मालाएँ धारण कर रहीं थीं ।६६। ऐसे उस किटीश्वरी की सेवा करते हुए सहस्रों ही देवता बताये गये हैं ।६७। हे कुम्भ सम्भव ! दंडिनी की उनके सबके नाम सहस्र नामाध्याय में कहेंगे अतः अब फिर नहीं कहते हैं ।६८। कोलास्य उन देवताओं के समीप में ही कृष्ण सारंग वाहन दंडिनी के समय में स्थित था । यह आधे कोश तक तो आयत था शृंग में और उससे आधा आयत मुख में था और एक कोश के प्रमाण वाले पाद थे और उसकी पूँछ तो सदा ही उद्धत रहा करती थी ।६६-७०।

उदरे धवलच्छायो हुंकारेण महीयसा ।
हसन्मारुतवाहस्य हरिणस्य पराक्रमम् ॥७१
तस्यैव पर्वणो देशे वर्त्तते वाहनोत्तमम् ।
किरिचक्ररथेन्द्रस्य स्थितस्तत्रैव पर्वणि ॥७२
वर्त्तते मदिरासिंधुर्देवतारूपमास्थिता ।
माणिक्यगिरिवच्छोणं हस्ते पिशितपिण्डकम् ॥७३
दधाना घूर्णमानाक्षी हेमांभोजस्रगावृता ।
मदशक्यचा समाश्लिष्टा धृतरक्तसरोजया ॥७४
यदा यदा भंडदैत्यः संग्रामे संप्रवर्तते ।
युद्धस्वेदमनुप्राप्ताः शक्तयः स्युः पिपासिताः ॥७५
तदा तदा सुरासिंधुरात्मानं बहुधा क्षिपन् ।
रणे खेदं देवतानामंजसापाकरिष्यति ॥७६
तदप्यद्भुतमे वर्षे भविष्यति न संशयः ।
तदा श्रोष्यसि संग्रामे कथ्यमानं मया मुदा ॥७७

किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६७

महान् हुङ्कार से उसके उदर में धवल कान्ति होती थी। हंसते मारुत के वाहन हरिण का पराक्रम था ।७१। उसी पर्व के भाग में वह उत्तम वाहन रहता है जिस पर्व में किरिचक्र रथेन्द्र की स्थिति थी ।७२। वहाँ पर मदिरा का सिन्धु भी एक देवता के स्वरूप में समास्थित होकर विद्यमान था। जो माणिक्य के समान शोण था तथा उसके हाथ में मांस का एक ढेला ।७३। उसकी आँखें विशेष घूर्णित थीं सुनहरी कमल के सदृश रुधिर से समावृत थीं। रक्त सरोज धारण करने वाली के द्वारा यह की शक्ति से समाश्लिष्ट थी ।७४। जब-जब भंड दैत्य संग्राम में प्रवृत्त होता है। युद्ध के स्वेद को अनुप्राप्त शक्तियाँ पिपासित हो जाती हैं ।७५। उसी-उसी समय में सुरा का सागर बहुधा अपने आपको क्षित करता हुआ देवों के रण के खेद को तुरन्त ही दूर कर देता है ।७६। वह भी अद्भुतम वर्ष में होगा— इसमें कुछ भी संशय नहीं है। उस समय में मेरे द्वारा कहा जाने वाला संग्राम में बड़े ही आनन्द से तुम श्रवण करोगे ।७७।

तस्यैव पर्वणोऽधस्तादष्टदिक्ष्वध एव हि ।
उपर्यपि कृतावासा हेतुकाद्या दश स्मृताः ॥७८

महान्तो भैरवश्रेष्ठाः ख्याता विपुलविक्रमाः ।
उद्दीप्तायुततेजोभिर्दिवा दीपितभानवः ॥७९

कल्पांतकाले दंडिन्या आज्ञया विश्वघस्मराः ।
अत्युदग्रप्रकृतयो रददष्टौष्ठसंपुटाः ॥८०

त्रिशूलाग्रविनिर्भिन्नमहावारिदमंडलाः ।
हेतुकस्त्रिपुरारिश्च तृतीयश्चाग्निभैरवः ॥८१

यमजिह्वैकपादौ च तथा कालकरालकौ ।
भीमरूपो हाटके शस्तथैवाचलनामवान् ॥८२

एते दशैव विख्याता दशकोटिभटान्विताः ।
तस्यैव किरिचक्रस्य वर्तंते पर्वसीमनि ॥८३

एवं हि दंडनाथायाः किरिचक्रस्य देवताः ।
जृंभिण्याद्यचलेंद्रांताः प्रोक्तास्त्रैलोक्यपावनाः ॥८४

२६८ ] [ ब्रह्माण्डपुराण

उस ही पर्व के नीचे आठों दिशाओं में नीचे ही ऊपर-ऊपर आवास करने वाले हेतुक आदि दश कहे गये हैं ॥७८॥ विपुल विक्रम से समन्वित महान् भैरव ख्यात हैं, सहस्रों तेजों से ये उद्दीप्त हैं जैसे दिन में दीपित सूर्य होवें ॥७९॥ कल्प के अन्त समय में दंडिनी देवी की आज्ञा से तृप्त सम्पूर्ण विश्व के विनाशक जिनकी अत्यन्त उदग्र स्वभाव हैं और जो अपने दांतों और होठों को पीसने वाले हैं ॥८०॥ ये त्रिशूलों के अग्रभाग से महान् मेघों के मंडल को भी निर्भिन्न कर रहे हैं—एक हेतुक है, त्रिपुरारि हैं और तीसरा अग्निभैरव है ॥८१॥ यम जिह्वा और एक पाद हैं और काल के ही समान कराल हैं। भीम स्वरूप से युक्त तथा हाटकेश हैं और उसी अचल के नाम वाला है ॥८२॥ ये केवल दश ही विख्यात हैं जो कि दश करोड़ भटों से संयुत हैं। उसी किरिचक्र के पर्व की सीमा में रहा करते हैं ॥८३॥ इस रीति से उस दंडनाथा के किरिचक्र के देवता हैं। जृम्भिणी से आदि लेकर अचलेन्द्र के अन्त तक हैं—ऐसे कहे गये हैं जो त्रैलोक्य के पावन हैं ॥८४॥

तत्रत्यैर्देवताबृन्दैर्बहवस्तत्र संगरे ।
दानवा मारयिष्यंते पास्यंते रक्तवृष्टयः ॥८५॥
इत्थं बहुविधत्राणं पर्वस्थैर्देवतागणैः ।
किरिचक्रं दंडनेत्र्या रथरत्नं चचाल ह ॥८६॥
चक्रराजरथो यत्र तत्र गेयरथोत्तमः ।
यत्र गेयरथस्तत्र किरिचक्ररथोत्तमः ॥८७॥
एतद्रथत्रयं तत्र त्रैलोक्यमिव जंगमम् ।
शक्तिसेनासहस्रस्यांतश्चचार तदा शुभम् ॥८८॥
मेरुमन्दरविंध्यानां समवाय इवाभवत् ।
महाघोषः प्रवृते शक्तीनां सैन्यमंडले ।
चचाल वसुधा सर्वा तच्चक्ररवदारिता ॥८९॥
ललिता चक्रराजाख्यो रथनाथस्य कीर्तिताः ।
षट्सारथय उद्दण्डपाशग्रहणकोविदाः ॥९०॥
यत्र गेयरथस्तत्र किरिचक्ररथोत्तमम् ।
इति देवी प्रथमतस्तथा त्रिपुरभैरवी ॥९१॥

किरिचक्ररथदेवता प्रकाशन ] ॥ २६६

संहारभैरवश्चान्यो रक्तयोगिनिवल्लभः। सारसः पंचमश्चैव चामुण्डा च तथा परा ॥६२॥

उस संग्राम में वहाँ के देवताओं के समूहों के द्वारा बहुत से दानव मारे जायेंगे और रुधिर की वृष्टि का पान किया जायगा ॥५५॥ इस प्रकार से पर्व में स्थित देवताओं के गणों के द्वारा बहुत तरह का परित्राण होगा तथा दंड नेत्री किरिचक्र चला था। ५६। जहाँ पर चक्र राज रथ था वहाँ पर ही गेय रथोत्तम था और जहाँ जहाँ पर गेय रथोत्तम था वहाँ पर ही किरिचक्र रथोत्तम था ॥५७॥ इन प्रकार से वहाँ पर तीन रथ थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों त्रैलोक्य ही जंगम है। इसके अन्दर सहस्रों शक्ति सेनाओं का शुभ संचार उस समय में हो रहा था। ५८। ऐसा मालूम होता था मानों मेरु मन्दर और विन्ध्य पर्वतों का समवाय ही हो गया होवे। उस शक्तियों के सैन्य मंडल में उस समय में महान घोष प्रवृत्त हो गया था। उस समय में उन रथों के चक्रों की ध्वनि से सम्पूर्ण वसुधा हिल गयी थी ॥५९॥ रथवाक की चक्रराज नाम वाली ललिता ही कीर्तित की गयी है। उनमें छै सारथि थे जो उद्दण्ड पाशों के ग्रहण में बड़े कोविद थे ॥६०। जहाँ पर ही गेय रथ था वहाँ-वहाँ पर किरिचक्र उत्तम रथ था। प्रथम तो देवी थी फिर उसी भाँति त्रिपुर भैरवी थी ॥६१॥ और अन्य संहार भैरव था जो रक्त योगिनी का वल्लभ था। सारस पाँचवाँ था तथा अपरा चामुण्डा थी ॥६२॥

एतासु देवतास्तत्र रथसारथयः स्मृताः। गेयचक्ररथेन्द्रस्य सारथिस्तु हसंतिका ॥६३॥ किरिचक्ररथेन्द्रस्य स्तंभिनी सारथिः स्मृता। दशयोजनमुन्नम्रो ललितारथपुङ्गवः ॥६४॥ सप्तयोजनमुच्छ्रायो गीतचक्ररथोत्तमः। षड्योजनसमुन्नम्रो किरिचक्ररथो मुने ॥६५॥ महामुक्तातपत्रं तु दशयोजनविस्तृतम्। वर्तते ललितेशान्य रथ एव न चान्यतः ॥६६॥ तदेव शक्तिसाम्राज्यसूचकं परिकीर्तितम्। सामान्यमातपत्रं तु रथद्वंद्वोऽपि वर्तते ॥६७॥

२७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अथ सा ललितेशानी सर्वशक्तिमहेश्वरी । महासाम्राज्यपदवीमारूढा परमेश्वरी ॥६८ चचाल भंडदैत्यस्य क्षयसिद्धयभिकांक्षिणी । शब्दयंते दिशः सर्वाः कंपते च वसुन्धरा ॥६६

इनमें वहाँ पर देवता ही उन रथों के सारथि थे ऐसा बताया गया है। जो गेय रथचक्र था उसकी सारथि हसन्तिका थी ।६३। किरिचक्र रथेन्द्र की स्तम्भिनी सारथि कही है। ललिता का उत्तम श्रेष्ठ रथ दश योजन ऊँचा था ।६४। गीतचक्र ह्योत्तम सात योजन उच्छ्राय वाला था। षट् योजन ऊँचा हे मुने ! किरिचक्र रथ था ।६५। महान् मुक्ताओं से विनिर्मित आतपत्र (छत्र) दशयोजन विस्तार वाला था। ललितेशानी का रथ ही ऐसा था और अन्य का नहीं था ।६६। और वह ही शक्ति के साम्राज्य का सूचक कीर्तित किया गया है। सामान्य छत्र तो अन्य दोनों पर भी थे ।६७। वह ललिता ईशानी समस्त शक्तियों की महेश्वरी थी। वह परमेश्वरी महान् साम्राज्य की पदवी पर समारूढ़ थी ।६८। वह भंड दैत्य के क्षय की सिद्धि की अभिकांक्षा वाली वहाँ से चली थी। सभी दिशाएँ उस समय में शब्दायमान हो रही थीं और वसुधा प्रकम्पित हो रही थी ।६६।

क्षुभ्यंति सर्वभूतानि ललितेशाविनिर्गमे । देवदुन्दुभयो नेदुनिपेतुः पुष्पवृष्टयः ॥१०० विश्वावसुप्रभृतयो गन्धर्वाः सुरगायकाः । तुम्बुरुर्नारदश्चैव साक्षादेव सरस्वती ॥१०१ जयमंगलपद्यानि पठंतः पटुगीतिभिः । हर्षसंफुल्लवदनाः स्फुरत्पुलकभूषणाः । मुहुर्जययेत्येवं स्तुवाना ललितेश्वरीम् ॥१०२ हर्षेणाढ्या मदोन्मत्ताः प्रनृत्यंतः पदे पदे । सप्तर्षयो वशिष्ठाद्या ऋग्यजुः सामरूपिभिः ॥१०३ अथर्वरूपैर्मंत्रैश्च वर्धयंतो जयश्रियम् । हविषेव महावह्निशिखामत्यंतपाविनीम् ॥१०४ आशीर्वादेन महता वर्धयामासुरुत्तमाः ।

भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७१

तैः स्तूयमाना ललिता राजमाना रथोत्तमे ॥१०५ भंडासुरं विनिर्जेतुमुद्दण्डैः सह सैनिकैः ॥१०६

जिस समय ईशानी ललिता देवी का विनिर्गम हुआ था उस समय में सभी प्राणी महान क्षुब्ध हो गये थे। देवगण दुन्दुभियां बजाने लगे थे तथा पुष्पों की वर्षा कर रहे थे ॥१००। विश्वावसु प्रभृति गन्धर्वगण जो सुरों के यहाँ गायक थे—तुम्बरु और नारद तथा साक्षात् सरस्वती देवी सब विजय के मंगल पद्यों का बहुत सुन्दर गीतों में पाठ कर रहे थे। सबके हर्ष से मुख खिले हुए थे तथा रोमाञ्चों के भूषण स्फुरित हो रहे थे। सभी बारम्बार जय हो—जय हो—इस प्रकार से ललितेश्वरी का स्तवन कर रहे थे ॥१०१-१०२। सभी कदम कदम पर हर्ष से युक्त और मद से उन्मत्त हो रहे थे तथा नृत्य कर रहे थे। सप्तर्षिगण जिनमें वसिष्ठ आदि महा मुनिगण थे वे ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद और अथर्ववेद के मन्त्रों से जय श्री का वर्णन कर रहे थे। जिस तरह से हवि से महा वह्नि को शिखा अत्यन्त पाविनी होती हैं वैसे ही ये सभी उत्तम ऋषिगण महान आशीर्वाद से वर्धन कर रहे थे। उनके द्वारा इस प्रकार से स्तवन की गयी ललिता उस उत्तम रथ में विराजमान हो रही थीं। वह देवी परम उद्दण्ड सैनिकों के साथ भंडासुर पर विजय प्राप्त करने को रवाना हुई थी ॥१०३-१०६।

—x—

भंडासुर अहंकार वर्णन

आकर्ण्य ललितादेव्या यात्रानिर्गमनिस्वनम् । महान्तं क्षोभमायाता भंडासुरपुरालयाः ॥१ यत्र चास्ति दुराशस्य भंडदैत्यस्य दुर्धियः । महेन्द्रपर्वतोपांते महार्णवतठे पुरम् ॥२ तत्तु शून्यकनाम्नैव विख्यातं भुवनत्रये । विषंगाग्रजदैत्यस्य सदावासः किलाभवत् ॥३ तस्मिन्नेव पुरे तस्य शतयोजनविस्तरे । वित्रैसुरसुराः सर्वे श्रीदेव्यागमसंभ्रमात् ॥४ शतयोजनविस्तीर्णं तत्सर्वं पुरमासुरम् । धूमैरिवावृतमभूदुत्पातजनितैर्मुहुः ॥५

२७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अकाल एव निर्भिन्ना भित्तयो दैत्यपत्तने । घूर्णमाना पतन्ति स्म महोल्का गगनस्थलात् ॥६ उत्पातानां प्राथमिको भूकंपः पर्यवर्तत । मही जज्वल सकला तत्र शून्यकपत्तने ॥७

श्री ललिता देवी की यात्रा के निगम के घोष का श्रवण करके भंडासुर के पुर में निवास करने वाले बड़े भारी क्षोभ को प्राप्त होगये थे ।१। जहाँ पर दुराश और दुष्ट मति वाले भंड का नगर है वह महेन्द्र पर्वत के उपान्त में और महार्णव के तट पर है ।२। वह तो शून्यक के नाम से ही तीनों भुवनों में विख्यात है। वहाँ पर विषंगाग्रज दैत्य का सदा ही आवास हुआ था ।३। सौ योजन के विस्तार वाले उसके उसी पुर में विश्रेयुर सुर सञ्च श्री देवी के आगम के संभ्रम से सौ योजन विस्तीर्ण वह सम्पूर्ण असुरों का पुर बार-बार उत्पातों से समुत्पन्न धूमों से आवृत के ही समान हो गया था ।४-५। अकाल में ही उस दैत्य के नगर में भित्तियाँ निर्भित होगयी थीं। गगन स्थल से घूर्णमान महोल्का गिरा करते थे ।६। उत्पातों का सबसे प्रथम होने वाला भूकम्प हुआ था । वहाँ पर उस शून्यक पत्तन में सम्पूर्ण भूमि ज्वलित हो गयी थी ।७।

अकाल एव हृत्कंपं भेजुर्दैत्यपुरोकसः । ध्वजाग्रवर्तिनः कंकगृध्राश्चैव बकाः खगाः ॥८ आदित्यमंडले दृष्ट्वा दृष्ट्वा चक्रं दुरुच्चकैः । क्रव्यादा बहवस्तत्र लोचनैर्नावलोकिताः ॥९ मुहुराकाशवाणीभिः परुषाभिर्बभाषिरे । सर्वतो दिक्षु दृश्यंते केतवस्तु मलीमसाः ॥१० धूमायमानाः प्रक्षोभजनका दैत्यरक्षसाम् । दैत्यस्त्रीणां च विश्रंशा अकाले भूषणस्रजः ॥११ हाहेति दूरं क्रन्दंत्यः पर्यश्रु समरोदिषुः । दर्पणानां वर्मणां च ध्वजानां खड्गसंपदाम् ॥१२ मणीनामंबराणां च मालिन्यमभवन्मुहुः । सौधेषु चन्द्रशालासु केलिवेश्मसु सर्वतः ॥१३

भंडासुर अहङ्कार वर्णन ] [ २७३

अट्टालकेषु गोष्ठेषु विपणेषु सभासु च। चतुष्किकास्वालिन्देषु प्रग्रीवेषु वलेषु च ॥१४॥

उस दैत्य के पुर में निवास करने वाले लोग अकाल में ही हृदय के कम्प से संयत होगये थे। ध्वजाओं के आगे रहने वाले कंक-गृध्र-वक और पक्षी आदित्य मंडल में देख-देखकर बड़े ऊँचे स्वर से क्रन्दन करने लगे। वहाँ पर बहुत से (क्रव्याद राक्षस) गण थे जो नेत्रों के द्वारा दिखलाई नहीं दिये गये थे ।८-६। बार-बार आकाश वाणियों के द्वारा बोलते थे और सभी ओर दिशाओं में केतु बहुत ही मलिन दिखलाई दे रहे थे ।१०। वे सब घूमा-यमान हो रहे थे और दैत्यों तथा राक्षसों के हृदयों में बड़े भारी क्षोभ को उत्पन्न करने वाले थे। और असमय में ही दैत्यों की स्त्रियों के भूषण और मालाएं भ्रष्ट होकर गिर रहे थे ।११। हा-हा-ध्वनि करके अश्रुपात करती हुई रुदन की ध्वनि में सब रो रही थीं। वहाँ पर दर्पण-वर्म-ध्वजा-खंग और सम्पदाएं एवं मणि तथा वस्त्रों में बार-बार मलिनता हो गयी थी। सौधों में-चन्द्र शालाओं में और सभी ओर केलि करने के गृहों में महान् भीषण घोष सुनाई दिया करता था ।१२-१३। अट्टालिकाओं में—गोष्ठों में—विपणों में और सभा भवनों में—चतुष्किकाओं में-अलिन्दों में-प्रग्रीवों में और वलों में सर्वत्र महान् अशुभ एव कठोर घोष सुनाई देता था ।१४।

सर्वतोभद्रवासिषु नन्द्यावर्तेषु वेश्मसु । विच्छिद्रकेषु संक्षुब्धेष्ववरोधनपालिषु । स्वस्तिकेपु च सर्वेषु गर्भाङ्गारपुटेषु च ॥१५॥

गोपुरेषु कपाटेपु वलभीनां च सीमसु । वातायनेषु कक्ष्यासु धिष्ण्येषु च खलेषु च ॥१६॥

सर्वत्र दैत्यनगरवासिमर्जनमंडलैः । अश्रूयन्त महाघोषाः परुषा भूतभाषिताः ॥१७॥

शिथिली सर्वतो जाता घोररूपा भयानका । करटैः कटुकालापैरवलोकि दिवाकरः । आराविषु करोटीनां कोट्यश्चापतन्भुवि ॥१८॥

२७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अपतन्वेदिमध्येषु बिंदवः शोणितांभसाम् ।
केशौघकाश्च निष्पेतुः सर्वतो धूमधूसराः ॥१६
भौमांतरिक्ष दिव्यानामुत्पातानामिति व्रजम् ।
अवलोक्य भृशं त्रस्ताः सर्वे नगरवासिनः ।
निवेदयामासुरमी भंडाय प्रथितौजसे ॥२०
स च भंडः प्रचंडोत्थैस्तैरुत्पातकदंबकैः ।
असंजातधृतिभ्रंशो मन्त्रस्थानमुपागमत् ॥२१

सर्वतोभद्रवासों में—नन्द्यावर्त्तों—घरों में—विच्छन्दकों में और अव-
रोधन पालियों ये सर्वत्र विक्षोभ हो रहा था । स्वस्तिकों में और समस्त
गर्भागार पुरों में—गो पुरों में—कपाटों में और वलभियों की सीमाओं में-
वातायनों में—कक्ष्याओं में और खलों में-सभी जगह दैत्यों के नगर में
निवासी जनों के मण्डलों के द्वारा भूतों द्वारा कहे हुए परम कठोर महान्
घोष सुनाई दे रहे थे । १५-१७। शिथिली भूत होते हुए घोरवर्ण और भया-
नक हो गये थे तथा कटु आलाप वाले करटों के द्वारा दिवाकर देखा गया
था । आरात्रियों में करोटियों की कोटियां भूमि में गिर गई थी ।१८।
वेदियों के मध्य में शोणित मिश्रित जल की बिन्दुएं गिर रहीं थीं और
केशौधक सभी ओर धूम से धूसर होकर गिर गये थे ।१६। भूमि में होने
वाले-अन्तरिक्ष में और दिवलोक में होने वाले उत्पातों के समुदायों को
देखकर सभी नगर के निवासीजन अत्यधिक भयभीत हो गये थे । इन सभी
ने परम प्रसिद्ध ओज वाले भण्डासुर से इस दृश्यमान भीषणता के विषय में
निवेदन किया था ।२०। और वह भण्डासुर को इन परम प्रचण्ड उत्पातों के
समुदायों से भी धीरज का भ्रंश नहीं हुआ था और वह मन्त्र स्थान को
सम्प्राप्त हो गया था ।२१।

मेरोरिव वपुर्भेदं बहुरत्नविचित्रितम् ।
अध्यासामास दैत्येंद्रः सिंहासनमनुत्तमम् ॥२२
स्फुरन्मुकुटलग्नानां रत्नानां किरणैर्घनै ।
दीपयन्नखिलाशान्तानद्युतद्दानवेश्वरः ॥२३
एकयोजनविस्तारे महत्यास्थानमंडपे ।
तुंगसिंहासनस्थं तं सिषेवाते तदानुजौ ॥२४

भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७५

विशुक्रश्च विषंगश्च महाबलपराक्रमौ ।
त्रैलोक्यकंटकीभूतभुजदंडभयंकरौ ॥२५
अग्रजस्य सदैवार्ज्ञामविलंघ्य मुहुर्मुहुः ।
त्रैलोक्यविजये लब्धं वर्धयंतौ महद्यशः ॥२६
न तेन शिरसा तस्य मृद्नंतौ पादपीठिकाम् ।
कृतांजलिप्रणामौ च समुपाविशतां भुवि ॥२७
अथास्थाने स्थिते तस्मिन्नमरद्वेषिणां वरे ।
सर्वे सामंतदैत्येन्द्रास्तं द्रष्टुं समुपागताः ॥२८

वहाँ पर मेरु पर्वत के समान वपु वाले तथा बहुत से रत्नों से चित्रित अत्युत्तम सिंहासन पर दैत्येन्द्र संस्थित हो गया था।२२। वह दानवेश्वर स्फुरित मुकुटों में लगे हुए रत्नों की किरणों से सब दिशाओं को दीपित करता हुआ वहाँ पर समवस्थित हुआ था।२३। उस समय में उसके दो अनुजों के द्वारा वह सेवित हुआ था। वह आस्थान मण्डप महान् था तथा एक योजन के विस्तार से युक्त था। वहाँ पर एक बहुत ही ऊँचा सिंहासन था जिस पर यह दानवेन्द्र विराज मान हुआ था।२४। विशुक्र और विषंग ये दोनों इसके छोटे भाई बड़े ही अधिक बल और पराक्रम वाले थे और ये दोनों तीनों लोकों के लिये कण्डक के ही समान भुजदण्ड वाले तथा भयङ्कर थे।२५। ये दोनों ही अपने बड़े भाई की आज्ञा का कभी उल्लंघन नहीं किया करते थे और उन्होंने त्रैलोक्य के विजय करने में महान् यश प्राप्त किया था ।२६। उन्होंने अपने शिर को झुकाकर उसकी पाद पीठिका को प्रणाम किया था और अपने दोनों करों को जोड़कर ये भूमि में बैठ गये थे।२७। इसके अनन्तर जब वह सुरों का महान् शत्रु उस आस्थान मण्डप में समवस्थित हो गया था तो उसका दर्शन करने के लिए उस समय में समस्त सामन्त दैत्यों के साथ वहाँ पर समुपस्थित हो गये थे।२८।

तेषामेकैकसैन्यानां गणना न हि विद्यते ।
स्वं स्वं नाम समुच्चार्य प्रणेमुर्भण्डकेश्वरम् ॥२९
स च तानसुरान्सर्वानतिधीरकनीनकः ।
संभावयन्समालोकैः कियंतं चित्क्षणं स्थितः ॥३०

२७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अवोचत विशुक्रस्तमग्रजं दानवेश्वरम् ।
मथ्यमानमहासिन्धुसमानार्गलनिस्वनः ॥३१
देव त्वदीयदोर्द्दण्डविध्वस्तबलविक्रमाः ।
पापिनः पामराचारा दुरात्मानः सुराधमाः ॥३२
शरण्यमन्यतः क्वापि नाप्नुवन्तो विषादिनः ।
ज्वलज्ज्वालाकुले वह्नौ पतित्वा नाशमागताः ॥३३
तस्माद्दे वात्समुत्पन्ना काचित्स्त्री बलगर्विता ।
स्वयमेव किलाश्नांक्षुस्तां देवा वासवादयः ॥३४
तैः पुनः प्रबलोत्साहैः प्रोत्साहितपराक्रमाः ।
बहुस्त्रीपरिवाराश्च विविधायुधमण्डिताः ॥३५

उन एक-एक की इतनी अधिक सेना थी जिसकी कोई गणना नहीं है । उनमें सबने अपने-अपने नाम का उच्चारण करके उस भण्डकेश्वर के लिये प्रणिपात किया था ।२६। उस दैत्येश्वर ने अत्यन्त धैर्ययुक्त नेत्रों से उन समस्त असुरों का समादर करते हुए कुछ क्षण तक चुप वह शान्त रहा था । फिर अग्रज दानवेश्वरों से विशुक्र बोला था - उस समय में उसका स्वर मथ्यमान सिन्धु के समान था ।३०-३१। हे देव ! आपकी भुजाओं से जिनका बल और विक्रम विध्वस्त हो गया है वे पापी, पामर आचरण वाले दुष्ट आत्मा अधम सुरगण विषाद युक्त होकर अन्य कहीं पर भी शरण को प्राप्त नहीं हुए थे । तथा जलती हुई ज्वालाओं से समाकुल वह्नि में गिर कर विनाश को प्राप्त हो गये थे ।३२-३३। उस देव से समुत्पन्न कोई स्त्री है जो अपने बल के अत्यधिक गर्व वाली है । वासव आदिक समस्त देवगण स्वयं ही उसकी शरण में गये हैं ।३४। उन्हीं के द्वारा जिन को परम प्रबल उत्साह हो रहा है उनके पराक्रम को प्रोत्साहन दिया है। उसके साथ बहुत सी स्त्रियों के परिवार भी विद्यमान हैं और वे सब अनेक प्रकार के आयुधों से भूषित हैं ।३५।

अस्माञ्जेतुं किलायांति हा कष्टं विधिवैशसम् ।
अबलानां समूहश्चेद्वलिनोऽस्मान्विजेष्यते ॥३६
तर्हि पल्लवभंगेन पाषाणस्य विदारणम् ।
ऊह्यमानमिदं हंतु परिहासाय कल्प्यते ॥३७

भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७७

विडम्बना न किमसो लज्जाकरमिदं न किम् । अस्मत्सैनिकनासीरभटेभ्योऽपि भवेद्भयम् ॥३८॥

कातरत्वं समापन्नाः शक्राद्यास्त्रिदिवोकसः । ब्रह्मादयश्च निर्विष्णविग्रहा मद्वलीयुधैः ॥३९॥

विष्णोश्च का कथैवास्ते वित्रस्तः स महेश्वरः । अन्येषामिह का वार्ता दिक्पालास्ते पलायिताः ॥४०॥

अस्माकमिषुभिस्तीक्ष्णैरदृश्यैरंगपातिभिः । सर्वत्र विद्धवर्माणो दुर्मदा विबुधाः कृताः ॥४१॥

तादृशानामपि महापराक्रमभुजोषमणाम् । अस्माकं विजयायाद्य स्त्री काचिदभिधावति ॥४२॥

वे सब हम लोगों पर विजय प्राप्त करने के लिये आ रही हैं। हां ! बड़े ही कष्ट का विषय है । यह क्या विधाता का चेष्टित है । यदि यह अब-लाओं की समुदाय हमको जीत लेगा । वृक्ष तो फिर पत्तों के अंग से पाषाण का ही विदारण हो जायगा । जब इस हेतु पर विचार किया जाता है तो परिहास सा ही होता है।३७। क्या यह विडम्बना मात्र नहीं है और क्या यह लज्जा उत्पन्न करने वाली बात नहीं है ? जो हमारे सैनिकों की सेना से भी भय को प्राप्त होते हैं । ३८ । वे शक्र आदि देवगण कातरता को प्राप्त हुए हैं। हमारी सेना की आयुध शक्ति से ब्रह्मादिक भी निर्विष्ण विग्रह वाले होते हैं ।३९। विष्णु के विषय में तो कहा ही क्या जावे साक्षात् महेश्वर भी भयभीत है । अन्यों की तो बात ही क्या है सब दिक्पाल भी भाग गये हैं। ४०। हमारे परमाधिक तीक्ष्ण बाणों से जो अदृश्य हैं और अंग में गिरने वाले हैं सभी जगह वर्मों को भेदने वाले हैं ऐसे सब देवों को दुर्मद कर दिया है ।४१। हम ऐसे हैं जिनके भुजाँ में महापराक्रम की ऊष्मा है उनके ऊपर विजय प्राप्त करने के लिए इस समय में कोई स्त्री अभिधावन कर रही हैं॥४२॥

यद्यपि स्त्री तथाप्येषा नावमान्या कदाचन । अल्पोऽपि रिपुरात्मज्ञैर्नावमान्यो जिगीषुभिः ॥४३॥

तस्मात्तदुत्सारणार्थं क्षेपीयास्तु किङ्कराः । सकचग्रहमाकृष्य सानैतव्या मदोद्धता ॥४४॥

२७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देव त्वदीय शुद्धान्तर्वर्तिनीनां मृगीदृशाम् । चिरेण चेटिकाभावं सा दुष्टा संश्रयिष्यति ॥४५

एकैकस्माद्भटादस्मात्सैन्येषु परिपंथिनः । शङ्कते खलु वित्रस्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥४६

अन्यद्देवस्य चित्तं तु प्रमाणमिति दानव । निवेद्य भण्डदैत्यस्य क्रोधं तस्य व्यवीवृधत् ॥४७

विषङ्गस्तु महासत्त्वो विचारज्ञो विचक्षणः । इदमाह महादैत्यमग्रजन्मानमुद्धतम् ॥४७

देव त्वमेव जानासि सर्वं कार्यमरिन्दम । न तु ते क्वापि वक्तव्यं नीतिवर्त्मनि वर्तते ॥४६

यद्यपि वह स्त्री है तो भी उसका अपमान कभी भी नहीं करना चाहिए। जो आत्मज्ञानी हैं उनके द्वारा छोटा भी शत्रु जीतने की इच्छा वालों के द्वारा कभी भी अपमानित नहीं होना चाहिए ।४३। इसलिए उसके उत्सारण के वास्ते किङ्कर अवश्य ही भेज देने चाहिए कि वे उस मद से उद्धता स्त्री के शिर के केशों को पकड़ कर उसे यहाँ ले आवें ।४४। हे देव ! आपके यहाँ अन्दर अवरोध में रहने वाली जो हरिण के समान नेत्रों वाली सुन्दरियाँ हैं उनकी दासी बनकर बहुत समय तक वह दुष्टा स्त्री उनकी सेवा किया करेगी ।४५। हमारे एक-एक योद्धा से ही परिपन्थी की सेनाओं में त्रैलोक्य विशेष रूप से त्रस्त होकर सम्पूर्ण चराचर शङ्कित होता है ।४६। हे दानव ! अन्य तो आपका चित्त ही प्रमाण है। ऐसा निवेदन करके उस भंडासुर का क्रोध और अधिक बढ़ा दिया था ।४७। महान् सत्व वाला जो विषंग वह विचक्षण और विचारों का ज्ञाता था। वह अपने बड़े भाई से यह बोला था जो कि उद्धत दैत्य था ।४८। हे देव ! आप तो स्वयं शत्रुओं के दमन करने वाले हैं आप स्वयं ही सब कार्य को जानते हैं। आपको किसी को भी कुछ भी नहीं बताना चाहिए क्योंकि आप नीति के मार्ग में रहा करते हैं ।४६।

सर्वं विचार्य कर्तव्यं विचारः परमा गतिः । अविचारेण चेत्कर्म समूलमवकृन्तति ॥५०

भण्डासुर अहंकार वर्णन ] [ २७६

परस्य कटके चाराः प्रेषणीयाः प्रयत्नतः ।
तेषां बलाबलं ज्ञेयं जयसंसिद्धिमिच्छता ॥५१
चारचक्षुर्दृढप्रज्ञः सदाशंकितमानसः ।
अशंकिताकारवांश्च गुप्तमन्त्रः स्वमंत्रिषु ॥५२
षडुपायान्प्रयुञ्जानः सर्वत्राभ्यर्हिते पदे ।
विजयं लभते राजा जाल्मो मक्षु विनश्यति ॥५३
अविमृश्यैव यः कश्चिदारम्भः स विनाशकृत् ।
विमृश्य तु कृतं कर्म विशेषज्जयदायकम् ॥५४
तिर्यगित्यपि नारीति क्षुद्रा चेत्यपि राजभिः ।
नावज्ञा वैरिणां कार्या शक्तेः सर्वत्र सम्भवः ॥५५
स्तंभोत्पन्नेन केनापि नरतिर्यग्वपुर्भृता ।
भूतेन सर्वभूतानां हिरण्यकशिपुर्हतः ॥५६

जो कुछ भी करता है वह सब विचार करके ही करना चाहिए क्यों-कि भली भाँति विचार का करना ही परम गति है । बिना भली भाँति से विचार के जो भी कुछ किया जाता है वह मूल के सहित ही सम्पूर्ण विनष्ट हो जाया करता है ।५०। शत्रु के कटक में दूत प्रयत्न पूर्वक भेजने चाहिए । अपनी विजय की सिद्धि की इच्छा रखने वाले को चाहिए कि शत्रु के बल और अबल का पहिले ज्ञान प्राप्त कर लेवे ।५१। जो दूतों के द्वारा ही देखने वाला है—जिसकी प्रतिज्ञा सुदृढ़ है—जो सदा ही शङ्कित मन वाला है—जो अशङ्कित आकार वाला है—जो अपने मन्त्रियों में गुप्त मन्त्रणा वाला होता है । ये छे उपाय हैं इनका प्रयोग करने वाला जो सदा अभ्यर्हित पद पर स्थित रहता है वही राजा विजय का लाभ प्राप्त किया करता है । जो जाल्म होता है उसका शीघ्र विनाश हो जाया करता है ।५२-५३। कोई भी कार्य का आरम्भ बिना आगा-पीछा सोचे ही कर दिया जाया करता है वह विनाश करने वाला ही हुआ करता है । जिसका भली भाँति विचार करके पीछे जो कर्म किया गया है वह विशेष रूप से जय देने वाला ही हुआ करता है ।५४। यह तिर्यग् है—यह नारी है अथवा यह क्षुद्रा है—इन बातों से भी राजाओं को कभी भी बैरियों की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए क्योंकि शक्ति तो ऐसी विलक्षण है कि वह सभी जगह हो सकती है । देखिये, ऐतिहासिक

२८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

घटना विद्यमान है—खम्भे से समुत्पन्न नर और तिर्यंग् (पशु) का वपु धारण करने वाले समस्त प्राणियों का भूत नरसिंह ने हिरण्यकशिपु जैसे महान् बलवान् को मार डाला था ॥५५-५६॥

पुरा हि चंडिका नाम नारी मायाविजृंभिणी । निशुम्भशुंभौ महिषं व्यापादितवती रणे ॥५७ तत्प्रसंगेन बहवस्तया दैत्या विनाशिताः । अतो वदामि नावज्ञा स्त्रीमात्रं क्रियतां क्वचित् ॥५८ शक्तिरेव हि सर्वत्र कारणं विजयश्रियः । शक्तेराधारतां प्राप्तैः स्त्रीपुंलिङ्गैर्न नो भयम् ॥५९ शक्तिस्तु सर्वतो भाति संसारस्य स्वभावतः । तर्हि तस्या दुराशायाः प्रवृत्तिर्ज्ञायतां त्वया ॥६० केयं कस्मात्समुत्पन्ना किमाचारा किमाश्रया । कियद्बला किसहाया वा देव तत्प्रविचार्य्यताम् ॥६१ इत्युक्तः स विषङ्गेण को विचारो महौजसाम् । अस्मद्बले महासत्त्वा अक्षौहिण्यधिपाः शतम् ॥६२ पातुं क्षमास्ते जलधीनलं दग्धुं त्रिविष्टपम् । अरे पापसमाचार किं वृथा शङ्कसे स्त्रियः ॥६३

प्राचीन समय में भी चण्डिका नाम वाली एक नारी ही तो थी जिसने रण में निशुम्भ-शुम्भ और महिष को मार डाला था ॥५७॥ उसी के प्रसंग से उसने बहुत से दैत्यों का विनाश कर दिया था । इसी कारण से मैं यही बतलाता हूँ कि यह समझ करके केवल स्त्री ही तो है, कभी भी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए ॥५८॥ शक्ति ही सर्वत्र विजय की श्री का कारण हुआ करती है । शक्ति के आधार को प्राप्त हैं उन स्त्री और पुरुषों से हम को भय नहीं है ॥५९॥ इस संसार की स्वभाव से ही शक्ति ही सर्व ओर विभात हुआ करती है । सो उस बुरे आशय वाली की क्या प्रवृत्ति है—आप को समझ लेना चाहिए ॥६०॥ हे देव ! आपको इन सभी बातों का विचार कर लेना चाहिए कि यह कौन है—किससे यह समुत्पन्न हुई है—इसके आचार क्या हैं— इसका आश्रय क्या है—इसका बल कैसा और कितना है—इसकी सहायता

भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८१

करने वाले कौन-कौन हैं ।६६। उस विषंग छोटे भाई के द्वारा जब इस रीति से भंडासुर से कहा गया था तो उसने कहा था कि जो महान् ओज वाले हैं उनके लिए विचार का करने की क्या आवश्यकता है । हमारी सेना में महान् सत्वधारी हैं और सैकड़ों तो अक्षौहिणी सेना के अधिप हैं । वे इतने समर्थ हैं कि जलधि के जल का भी पान कर सकते हैं और स्वर्ग को भी दग्ध कर सकते हैं । अरे ! पापसमाचार ! व्यर्थ ही स्त्रियों के विषय में तू क्या ऐसी शङ्का कर रहा है ।६२-६३।

तत्सर्वं हि मया पूर्वं चारद्वारावलोकितम् ।
अग्रे समुदिता काचिल्ललितानामधारिणी ॥६४
यथार्थनामवत्येषा पुष्पवत्पेशलाकृतिः ।
न सत्त्वं न च वीर्यं वा न संग्रामेषु वा गतिः ॥६५
सा चाविचारनिवहा किंतु मायापरायणा ।
तत्सत्त्वेनाविद्यमानं स्त्रीकदम्बकमात्मनः ॥६६
उत्पादितवती किं ते न चैवं तु विचेष्टते ।
अथ वा भवदुक्तेन न्यायेनास्तु महद्बलम् ॥६७
त्रैलोक्यल्लंघिमहिमा भण्डः केन विजीयते ॥६८
इदानीमपि मद्बाहुबलसंमर्द मूर्च्छिताः ।
श्वसितुं चापि पटवो न कदाचन नाकिनः ॥६६
केचित्पातालगर्भेपु केचिदम्बुधिवारिषु ।
केचिद्दिगंतकोणेषु केचित्कुञ्जेषु भूभृताम् ॥७०

यह सब तो मैंने पहिले ही दूतों के द्वारा देख लिया है । इसके आगे कोई ललिता नाम वाली स्त्री समुदित हुई है ।६४। यह यथार्थ नाम वाली है अर्थात् जो भी इसके नाम का अर्थ होता है वैसी ही है । पुष्प के समान तो इसका परम कोमल शरीर है । न तो उसमें कोई सत्व है और न वीर्य-पराक्रम ही । संग्रामों में ऐसी स्त्री की क्या गति हो सकती है ।६५। और वह तो अविचारों का समुदाय ही है किन्तु माया फैलाने में अवश्य ही वह परायणा है । उसके सत्त्व से ही उसका अपना स्त्रियों का समुदाय अविद्य-मान है ।६६। उनसे उसने क्या उत्पादन किया है और न इस प्रकार से

२८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विशेष चेष्टा ही करती है । अथवा आपके द्वारा कथित न्याय से महान् भी उसका बल होवे तो रहे ।६७। तीनों लोकों के द्वारा जिसकी महिमा का उल्लंघन नहीं होता है ऐसा यह भण्डासुर किसके द्वारा जीता जा सकता है अर्थात् इसको कोई भी पराजित नहीं कर सकता है ।६८। इस समय में भी देवगण मेरे बाहुबल के संमर्दन से मूच्छित किसी समय में भी श्वास लेने में भी समर्थ नहीं हैं ।६६। उनमें से कुछ तो पाताल के गर्भो में जा छिपे हैं और कुछ समुद्र के जलों में छिपे हुए हैं । कुछ दिशाओं के अन्त में कोणों में छिप रहे हैं तथा कुछ कुञ्जों में जाकर छिपाये हैं जो कि पर्वतों में है ।७०।

विलीना भृशवित्रस्तास्त्यक्तदारसुतश्रियः । भ्रष्टाधिकाराः पशवश्छन्नवेषाश्चरंति ते ॥७१

एतादृशं न जानाति मम बाहुपराक्रमम् । अबला न चिरोत्पन्ना तेनैषा दर्पमश्नुते ॥७२

न जानन्ति स्त्रियो मूढा वृथा कल्पितसाहसाः । विनाशमनुधावन्ति कार्याकार्यविमोहिताः ॥७३

अथ वा तां पुरस्कृत्य यद्यागच्छन्ति नाकिनः । यथा महोरगाः सिद्धाः साध्या वा युद्धदुर्मदाः ॥७४

ब्रह्मा वा पद्मनाभो वा रुद्रो वापि सुराधिपः । अन्ये वा हारितां नाथास्तान्संपेष्टु महं पटुः ॥७५

अथ वा मम सेनासु सेनान्यो रणदुर्मदाः । पक्वकर्करिकापेषमवपेक्ष्यंति वैरिणः ॥७६

कुटिलाक्षः कुरंडश्च करंकः कालवाशितः । वज्रदंतो वज्रमुखो वज्रलोमा बलाहकः ॥७७

ये सभी अपने दारा-पुत्र और श्री का त्याग करके अत्यधिक डरे हुए विलीन हो रहे हैं जिनके सब अधिकार भ्रष्ट हो गये हैं । एक पशु के समान ही अपना वेष छिपाये सब इधर-उधर विचरण कर रहे हैं ।७१। इस प्रकार के मेरा जो बाहुओं का पराक्रम है उसको वह नहीं जानती है कारण यही है कि एक तो वह स्त्री है दूसरे अभी-अभी उत्पन्न हुई है । इसी से वह इतना दर्प करती है ।७२। स्त्रियां तो स्वभाव से ही मूढ़ हुआ करती हैं ।

भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८३

इनका तो जो भी कुछ साहस होता है वह वृथा ही कल्पित हुआ करता है । ये कार्य और अकार्य में मोहित ही हुआ करती हैं तथा ये विनाश की ओर अनुधावन किया करती हैं ।७३। अथवा ऐसा भी हो कि उस स्त्री को आगे करके ये देवगण यदि पीछे से आते हैं तो कोई भी क्यों न होवें—चाहे वे महोरग हों—साध्य हों या दुर्मंद सिद्ध भी होंवें । ब्रह्मा तथा पद्मनाभ और रुद्र भी क्यों न हों । या सुराधिप इन्द्र भी होवे और दिक्पाल होवें उन सबको पीस देने में मैं एक ही परम समर्थ हूँ । मुझे इन सबका कुछ भी भय नहीं है ।७५। अथवा मेरी सेनाओं में जो भी सेनानी हैं वे बड़े रण दुर्मंद हैं । वे तो बैरियों को पक्वकर्करिका के समान पीस देने की अवेक्षा ही कर रहे हैं ।७६। उन सेनानियों के कुछ प्रथित नाम मैं बतलाता हूँ—कुटिलाक्ष—कुरण्ड—कटंक—कालवाशित—वज्रदन्द—वज्रमुख—वज्रलोमा—बलाहक हैं ।७७।

सूचीमुखः फलमुखो विकटो विकटाननः ।
करालाक्षः कर्कटको मदनो दीर्घजिह्वकः ॥७८
हुंबको हलमुल्लुंचः कर्कशः कल्किवाहनः ।
पुल्कसः पुण्ड्रकेतुश्च चण्डबाहुश्च कुक्कुरः ॥७९
जंबुकाक्षो जृभणश्च तीक्ष्णशृंगस्त्रिकंटक ।
चतुर्गुंप्तश्चतुर्बाहुश्चकाराक्षश्चतुः शिराः ॥८०
वज्रघोषश्चोर्ध्वकेशो महामायो महाहनुः ।
मखशत्रुर्मखारस्कन्दी सिंहघोषः शिरालकः ॥८१
अंधकः सिंधुनेत्रश्च कूपकः कूपलोचनः ।
गुहाक्षो गंडगल्लश्च चण्डधर्मो यमांतकः ॥८२
लङ्घनः पट्टसेनश्च पुरजित्पूर्वमारकः ।
स्वर्गशत्रुः स्वर्गबलो दुर्गाख्यः स्वर्गकण्टकः ॥८३
अतिमायो बृहन्माय उपमाय उलूकजित् ।
पुरुषेणो विषेणश्च कुन्तिषेणः परूषकः ॥८४

सूचीमुख—फलमुख—विकट—विकटानन—करालाक्ष--कर्कटक-मदन—दीर्घजिह्वक—हुम्बक-—हलमुल्लुंच—कर्कश—कल्कि—वाहन—पुल्कश—