संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अपतन्वेदिमध्येषु बिंदवः शोणितांभसाम् ।
केशौघकाश्च निष्पेतुः सर्वतो धूमधूसराः ॥१६
भौमांतरिक्ष दिव्यानामुत्पातानामिति व्रजम् ।
अवलोक्य भृशं त्रस्ताः सर्वे नगरवासिनः ।
निवेदयामासुरमी भंडाय प्रथितौजसे ॥२०
स च भंडः प्रचंडोत्थैस्तैरुत्पातकदंबकैः ।
असंजातधृतिभ्रंशो मन्त्रस्थानमुपागमत् ॥२१
सर्वतोभद्रवासों में—नन्द्यावर्त्तों—घरों में—विच्छन्दकों में और अव-
रोधन पालियों ये सर्वत्र विक्षोभ हो रहा था । स्वस्तिकों में और समस्त
गर्भागार पुरों में—गो पुरों में—कपाटों में और वलभियों की सीमाओं में-
वातायनों में—कक्ष्याओं में और खलों में-सभी जगह दैत्यों के नगर में
निवासी जनों के मण्डलों के द्वारा भूतों द्वारा कहे हुए परम कठोर महान्
घोष सुनाई दे रहे थे । १५-१७। शिथिली भूत होते हुए घोरवर्ण और भया-
नक हो गये थे तथा कटु आलाप वाले करटों के द्वारा दिवाकर देखा गया
था । आरात्रियों में करोटियों की कोटियां भूमि में गिर गई थी ।१८।
वेदियों के मध्य में शोणित मिश्रित जल की बिन्दुएं गिर रहीं थीं और
केशौधक सभी ओर धूम से धूसर होकर गिर गये थे ।१६। भूमि में होने
वाले-अन्तरिक्ष में और दिवलोक में होने वाले उत्पातों के समुदायों को
देखकर सभी नगर के निवासीजन अत्यधिक भयभीत हो गये थे । इन सभी
ने परम प्रसिद्ध ओज वाले भण्डासुर से इस दृश्यमान भीषणता के विषय में
निवेदन किया था ।२०। और वह भण्डासुर को इन परम प्रचण्ड उत्पातों के
समुदायों से भी धीरज का भ्रंश नहीं हुआ था और वह मन्त्र स्थान को
सम्प्राप्त हो गया था ।२१।
मेरोरिव वपुर्भेदं बहुरत्नविचित्रितम् ।
अध्यासामास दैत्येंद्रः सिंहासनमनुत्तमम् ॥२२
स्फुरन्मुकुटलग्नानां रत्नानां किरणैर्घनै ।
दीपयन्नखिलाशान्तानद्युतद्दानवेश्वरः ॥२३
एकयोजनविस्तारे महत्यास्थानमंडपे ।
तुंगसिंहासनस्थं तं सिषेवाते तदानुजौ ॥२४